SANATANI
Maharshi Patanjali · Yoga · 195 verses
Pada 4
Kaivalya Pada
, इन्द्रियों और होनेपर जो पहलेकी अपेक्षा (अलौकिक) हो जाता है, उसको कहते हैं। ये पाँच होती हैं। उनके इस प्रकार हैं— (1) होनेवाली —जब प्राणी मरकर एक दूसरी जाता है, तब उसके प्रारब्धानुसार , इन्द्रियों और होकर, उनमें हो जाता है (योग० 1। 19)। जैसे—मनुष्ययोनिसे देवादि प्राप्ति होनेसे , इन्द्रियों और आ जाती है, इसे ‘जन्मजा’ कहते हैं। कपिल, वेदव्यास, शुकदेव आदि कई प्रकारकी होनेवाली इतिहास और पुराणोंमें देखा जाता है। इसी तरह होनेवाली दूसरे प्रकारकी भी समझ लेना चाहिये। (2) ओषधिसे होनेवाली —मनुष्य जब किसी ओषधिके सेवनसे अपने कल्प कर लेता है तब उससे भी हो जाता है। इसे ‘ओषधिजा’ कहते हैं। ओषधि (भौतिक )-द्वारा किसी नेत्र आदि इन्द्रियोंमें अद्भुत भी इसीमें आ जाता है। ओषधिसे केवल मनुष्यके ही आदिका होता हो, ऐसी बात नहीं है; वृक्ष, लता और पशु-पक्षी आदिमें भी आ सकती है तथा विभिन्न भौतिक विकास हो सकता है। (3) मन्त्रसे होनेवाली —जब मनुष्य प्राप्त करनेके लिये किसी मन्त्रका विधिवत् करता है, तब उससे भी , इन्द्रियों और हो जाता है, इसे ‘मन्त्रजा’ कहते हैं (योग० 2। 44)। इनका और तन्त्रशास्त्रोंमें विस्तारपूर्वक है। (4) तपसे होनेवाली —जब मनुष्य शास्त्रोक्त तपका विधिवत् करता है, अथवा अपने पालन करनेके लिये भारी-से-भारी कष्ट सहर्ष सहन करता है, परंतु त्याग नहीं करता, तब उस तपश्चर्यासे उसके , इन्द्रियों और समस्त मल भस्म हो जाते हैं और उनमें हो जाता है, इसे ‘तपजा’ कहते हैं (योग० 2। 43)। इतिहासग्रन्थोंमें इसका बहुत जगह है। भरद्वाज और विश्वामित्र आदि अनेक ऋषियोंने तपसे प्राप्त प्रयोग करके भी दिखाया है। (5) होनेवाली —, और जो , इन्द्रियों और होता है इसे ‘समाधिजा’ कहते हैं। इसका तीसरे विस्तारपूर्वक स्वयं किया ही है। उपर्युक्त प्राप्तिमें जो , इन्द्रियों और एक प्रकारसे दूसरे प्रकारमें बदल जाना है, यही परिणामान्तर है, अत: इसीको ‘जाति-अन्तर-परिणाम’ कहते हैं
‘जात्यन्तरपरिणाम’ किस प्रकार कैसे होता है, यह बतलाते हैं—
-अन्तर-परिणामरूप लिये अर्थात् उन-उन प्रकट होनेके लिये जिन-जिन अर्थात् जिन-जिन उपादान कारणरूप तत्त्वोंकी आवश्यकता है, उनकी पूर्तिसे , इन्द्रियों और एक दूसरी होता है
यहाँ यह प्रश्न उठता है कि , ओषधि आदि - पूर्णता कैसे कर देते हैं; क्या वे प्रयोजक (चलानेवाले) हैं? इसपर कहते हैं—
पहले बतलाये हुए जो , ओषधि आदि हैं, वे एक स्थानसे दूसरे स्थानमें ले जानेवाले नहीं हैं, उनका काम तो केवल रुकावटको दूर कर देनामात्र है, उसके बाद पूर्ति तो अपने-आप हो जाती है। जैसे किसान एक खेतसे दूसरे खेतमें जल ले जाता है तो केवल उसकी रुकावटको ही दूर करता है, उस जलको चलानेका काम वह नहीं करता, रुकावट दूर होनेसे जल अपने-आप एक खेतसे दूसरे खेतमें चला जाता है, उसी प्रकार पहले बतलाये हुए आदि निमित्तोंद्वारा जब रुकावट दूर हो जाती है, तब , इन्द्रियाँ और —इन सबमें लिये जिन-जिन वस्तुओंकी आवश्यकता होती है, उन-उनकी पूर्ति अपने-आप हो जाती है। रुकावट दूर होनेपर कमीको पूर्ण कर देना है
उपादान स्मिता है, अत: यानी बनाये हुए सब केवल ही उत्पन्न होते हैं
जैसे अपने भिन्न-भिन्न इन्द्रियोंको भिन्न-भिन्न कामोंमें नियुक्त करनेवाला एक रहता है, उसी प्रकार उन बनाये हुए भिन्न-भिन्न कामोंमें नियुक्त करनेवाला संचालक एक ही होता है, जो कि स्वाभाविक है*
पहले बतलाये हुए पाँच प्रकारके चित्तोंमेंसे समाधिद्वारा हुए विशेषताका करते हैं—
, ओषधि, मन्त्र, तप और —इन पाँच , इन्द्रिय और होता है—यह बात पहले कही गयी। उन पाँच प्रकारसे उत्कर्षताको प्राप्त हुए चित्तोंमेंसे जो उत्पन्न होता है अर्थात् समाधिद्वारा शक्तिवाला होता है, वह कर्मसंस्कारोंसे रहित होता है, अत: वही हो सकता है, दूसरे , औषध आदिके द्वारा शक्तियुक्त रहते हैं, इस वे नहीं हो सकते
अब कर्माशयशून्य विलक्षणताका प्रतिपादन करते हैं—
शुक्लकर्म उन कहते हैं, जिनका फल सुखभोग होता है और कृष्णकर्म उनको कहते हैं, जो नरक आदि दु:खोंके हैं अर्थात् पुण्यकर्मोंका नाम शुक्लकर्म है और पापकर्मोंका नाम कृष्णकर्म है, किसी प्रकारका भी देनेवाले नहीं होते, क्योंकि उसका कर्मसंस्कारोंसे शून्य होता है यह बात पहले कह चुके हैं, इसलिये उन अशुक्ल और अकृष्ण कहते हैं। सिवा मनुष्योंके तीन प्रकारके होते हैं—(1) शुक्ल अर्थात् पुण्यकर्म, (2) कृष्ण अर्थात् पापकर्म और (3) शुक्लकृष्ण अर्थात् पुण्य और पाप मिले हुए
अब मनुष्योंके उन तीन प्रकारके किस प्रकार होता है, यह बतलाते हैं—
- द्वारा जिनका नहीं हुआ है, उन मनुष्योंके संस्काररूपसे अन्त:करणमें संगृहीत (इकट्ठे हुए) रहते हैं, अत: उन कर्मोंमेंसे जो जिस समय फलभोग करानेके लिये तैयार होता है, उस समय उस जैसा फल होनेवाला है, वैसी ही उत्पन्न होती है, अन्य फलभोगकी नहीं
कर्मसंस्कार तो अनेक अनन्त होते हैं, उनमें , और -जन्मान्तरका अन्तर पड़ जाता है, इस अनुरूप फलभोगकी कैसे उत्पन्न होती हैं, इसपर कहते हैं—
कोई किसी एक किया गया है और कोई किसी दूसरे किया गया है, यह उन व्यवधान है। इसी तरह भिन्न-भिन्न और भी व्यवधान होता है। इस प्रकार , और व्यवधान होते हुए भी जिस फल प्राप्त होनेवाला है; उसके अनुसार भोगवासना उत्पन्न होनेमें कोई अड़चन नहीं पड़ती, क्योंकि और —ये दोनों एक ही हैं। जिस कर्मफलका उत्पादक आ जाता है, वैसी ही प्रकट हो जाती है। यदि किसीको उसके पूर्वजन्मके फल भोगनेके लिये गौकी मिलनेवाली है, तो उसने गौकी जब कभी पायी है, उसकी प्रकट हो जायगी। यह कि चाहे उस बाद दूसरे कितने ही बीत चुके हों, कितना ही समय बीत चुका हो और वह किसी भी हुआ हो, उसकी स्फुरित हो जायगी। और होनेके जो फल मिलता है, उसके अनुकूल भोगवासना यानी पैदा हो जाती है
यहाँतक शंका होती है कि जब वासनाओंके अनुसार ही होता है और अनुसार होती है, तब सबसे पहले देनेवाली कहाँसे आयी? इसपर कहते हैं—
प्रत्येक प्राणीको जीवनकी इच्छा नित्य बनी रहती है, मृत्युका भय तुरंत जन्मे हुए क्षुद्र-से-क्षुद्र भी देखा जाता है, इससे पूर्वजन्मकी होती है। उस भी मरणभयकी व्याप्ति होनेसे -जन्मान्तरकी परम्परा हो जाती है। अतएव वासनाओंका अनादित्व भी अपने-आप हो जाता है
इस प्रकार यदि हैं, तब तो इनका भी नहीं होता होगा, फिर सूक्ति कैसे होगी? इसपर कहते हैं—
वासनाओंका अविद्यादि और उनके रहते हुए होनेवाले हैं। इनका फल पुनर्जन्म, और है। आश्रय है और शब्दादि आलम्बन हैं। इनके सम्बन्धसे ही संगृहीत हो रही हैं। जब योगसाधनोंसे इनका हो जाता है अर्थात् जब विवेकज्ञानसे हो जाता है (योग० 4। 30) तब फल देनेकी नहीं रहती, अपने हो जाता है (योग० 4। 34)। उपर्युक्त न रहनेसे विषयोंके साथ सम्बन्ध नहीं होता। इस प्रकार , फल, आश्रय और आलम्बन—इन चारोंका होनेसे वासनाओंका अपने-आप हो जाता है, अत: पुनर्जन्म नहीं होता
यदि सत् वस्तुका कभी होता ही नहीं तब वासनाओंका और उनके आदिका होना कैसे सम्भव है। इसपर कहते हैं—
वस्तुका वास्तवमें कभी नहीं होता, वस्तुके और आदि कुछ रहते हैं, कुछ और कुछ । इससे यह नहीं समझना चाहिये कि जो हैं, उन्हींकी है दूसरोंकी नहीं, क्योंकि उनका स्वरूपसे नहीं होता है। और - वे अपने रहते हैं, व्यक्त नहीं रहते। यह अपने हो जाना ही उनका या है (योग० 3। 13)। उन वासनादिके साथ सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, अत: वे पुनर्जन्ममें नहीं बन सकते
असली स्वरूप क्या है? सो बतलाते हैं—
वे जिस समय हैं, उस समय भी अपने कारणरूप भिन्न नहीं हैं तथा जिस समय और —इन दोनों प्रकारकी हैं, तब भी गुणस्वरूप ही हैं; क्योंकि उन धर्मरूप समस्त भिन्न-भिन्न वस्तुओंमें ()- सदैव अनुगत रहते हैं, उनका कभी नहीं होता, अत: वास्तवमें किसी भी वस्तुकी नहीं है। गुणस्वरूपसे वह सदैव है, परन्तु परिणामशील होनेके उसमें निरन्तर होता रहता है
यदि होनेसे वास्तवमें सब कुछ गुणस्वरूप ही है तो फिर भिन्न-भिन्न स्वभाववाले तीनों एक-एक वस्तुकी उत्पत्ति कैसे हो जाती है, हरेकसे अलग-अलग वस्तुएँ होनी चाहिये थीं? इसपर कहते हैं—
परन्तु भिन्न स्वभाववाले जब एक होता है, सब मिल-जुलकर जब किसी एक वस्तुके होते हैं, तब वैसा होनेमें कोई विरोध नहीं है। भिन्न-भिन्न वस्तुओंके एक एक वस्तुका प्रकट होना देखनेमें भी आता है। जैसे और जल मिलकर सूर्य और चन्द्रमाकी रश्मियोंके सम्बन्धसे वृक्षके हो जाते हैं और उसमें फिर नाना , नाना आकार और नाना व्यक्तित्वका हो जाता है परन्तु वस्तुत: वे अपने धर्मियोंसे सर्वथा अभिन्न हैं, उसी प्रकार सब वस्तुएँ गुणस्वरूप ही हैं, उनसे भिन्न नहीं हैं
जो लोग यह मानते हैं कि कोई वस्तु नहीं है बलसे ही दृश्यरूपमें प्रतीत होने लग जाता है, उनकी मान्यता गलत है; क्योंकि—
एक ही वस्तुमें मनुष्योंके अलग-अलग होती हैं अर्थात् अनेक वह एक ही वस्तु विभिन्न प्रकारसे बनती है, यह है। इस परिस्थितिमें यदि वस्तु किसी एक कल्पनामात्र मानी जाय तो वह अनेक नहीं बन सकती। अत: सबको उसका स्वरूप नहीं दीखना चाहिये था, परंतु ऐसा नहीं होता, वह सबको ही दीखती है। इसके सिवा यदि उसको अनेक कल्पना मानी जाय, तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि वह वस्तु भिन्न-भिन्न अनेक बनती हुई देखी जाती है। इस परिस्थितिमें वह कौन-से अनेक कल्पना मानी जायगी? अतएव वस्तुकी और उसे करनेवाले अनेकता होनेके दोनों अलग-अलग हैं—यह मान्यता ही समीचीन है
पुन: पूर्वपक्षका खण्डन करनेके लिये दूसरा कहते हैं—
इसके सिवा वस्तु किसी एक अधीन नहीं है, इसलिये भी कल्पनामात्र नहीं है, क्योंकि यदि कल्पनामात्र मानी जाय तो जब वह उसको करना (देखना) छोड़ दे, उस समय वह नहीं रहनी चाहिये। परंतु ऐसा नहीं होता, वस्तु वैसी-की-वैसी ही रहती है। इससे यह होता है कि दीखनेवाली वस्तु किसी एक अधीन नहीं है तथा वस्तु भिन्न है और वह सच्ची है
यदि बाहरकी वस्तु अपनी स्वतन्त्र रखती है तो वह कभी दीखती है और कभी नहीं दीखती, इसमें क्या है इसपर कहते हैं—
इन्द्रियोंकी समीपतासे जिस परछाईं पड़ती है, उसी वस्तुको जान सकता है, अन्य वस्तुको नहीं। उसे वस्तुका प्राप्त करनेमें उसके उपराग (परछाईं—)-की अपेक्षा है। अत: जब जिस वस्तुका उसमें पड़ता है, यानी इन्द्रियोंके द्वारा जब जिस वस्तुका सम्बन्ध होता है, उस समय वह वस्तु उसके ज्ञात है और जिस समय वह उसकी नहीं बनती अर्थात् उपरंजित नहीं होती, उस समय अज्ञात है
इस प्रकार वस्तुओंसे भिन्न करके अब भी भिन्न करते हैं—
तो परिणामी है, इस वह बाहरकी वस्तुओंको सदा नहीं देख सकता। जब जिस वस्तुका उसके साथ सम्बन्ध होता है, तभी उसे देखता है। किंतु उस स्वामी जो है वह अपरिणामी है। इस वह सदैव देखता रहता है। जिस समय जो उत्पन्न होती है और जो होती है, वे सभी उसे विदित रहती हैं
जिस प्रकार वस्तुका प्रकाशक है, उसी प्रकार अपना भी है। फिर भिन्न दूसरेको माननेकी क्या आवश्यकता है। इसपर कहते हैं—
है, इसलिये जड है। वह यानी अपने-आपको जाननेवाला—प्रकाशस्वरूप नहीं है, उसमें जो चेतनता दिखलायी देती है, जिसके वह किसी अंशमें कहा जाता है, वह चेतना उसमें पड़नेसे है। जब बाह्य वस्तुएँ और —इन दोनोंका पड़ता है, उस समय तद्रूप-सा हुआ रहता है (योग० 1। 4) और -सा प्रतीत होने लगता है; परंतु वास्तवमें जैसे इन्द्रियाँ और शब्द आदि होनेके नहीं हैं, उसी प्रकार भी होनेके नहीं है
माननेमें दूसरा दिखाते हैं—
बाहरके पड़ता है, तब उस प्रतिबिम्बसहित होना युक्तियुक्त है; क्योंकि वह अपरिणामी है। परंतु अपने स्वरूपको और स्वरूपको एक साथ ही नहीं जान सकता; क्योंकि परिणामशील होनेके उसे एक ही दो नहीं हो सकते। अत: यही समझना चाहिये कि नहीं है। काम केवल बाह्य स्वरूपको अपने स्वामी सामने रख देना है; फिर उसे जाननेका काम तो है
होता है और वह उस विषयसहित दूसरे देखा जाता है। इस प्रकार और एक साथ हो जाता है। यह मान लिया जाय तो क्या हानि है। इसपर कहते हैं—
इस प्रकार एक दूसरे मान लेनेसे एक तो अनवस्था आता है, दूसरे संकर हो जानेका आता है; क्योंकि एक तो किसी जाना, दूसरेने उस विषयसहित जाना, इसी प्रकार दूसरेको तीसरेने, तीसरेको चौथेने इस तरह चलते रहनेपर तो एक वस्तुका भी कभी समाप्त नहीं होगा, यह अनवस्था आयेगा और उन अनेक एक साथ होनेपर यह निर्णय नहीं हो सकेगा कि कौन-से क्या स्वरूप है, मिश्रण हो जायगा, सो यह किसीके बात नहीं है, सब कोई ऐसा ही करते हैं कि अमुक मैंने जाना था। ऐसा कोई नहीं कहता कि अमुक , उसके , फिर उसके ज्ञानसहित , फिर उसके भी ज्ञानसहित मैंने जाना था—इत्यादि। अत: भिन्न मानना ही युक्तिसंगत है
भी नहीं है और दूसरे भी नहीं है तो फिर यह बतलाना चाहिये कि कौन है, क्योंकि तो और है, वह किसीका और भोक्ता कैसे हो सकता है। इसपर कहते हैं—
, अपरिणामी, क्रियाशून्य और है, इसमें कोई संदेह नहीं; परंतु विकारशील नाना प्रकारके हुए सम्बन्धमें जब वह आकारवाला-सा हो जाता है (योग० 1। 4), उस समय उसे वृत्तियोंसहित होता है। अत: उसे अपनी और ज्ञाता और भोक्ता कहा जाता है। वास्तवमें तो न ज्ञाता ही है और न भोक्ता ही, वह तो सर्वथा , और चेतनमात्र है (योग० 2। 20)। यह है कि उपरागसे उपरंजित हुई केवल अनुकरण करनेवाला-सा होनेके ही ज्ञाता कहा जाता है
ऐसा किस होता है? यह बतलाते हैं—
यह जब रँगा हुआ; अपने स्वरूपके सहित () बनकर उससे सम्बन्धित होता है, तब और —इन दोनोंके रंगमें रँग जाता है अर्थात् उन दोनोंका इसमें पड़नेके यह दोनोंका आकार धारण कर लेता है और इसका निजी भी रहता ही है, इस यह ही सब अर्थवाला हो जाता है यानी रूपवाला, रूपवाला और अपने रूपवाला—इस प्रकार सर्वरूपवाला हो जाता है। इसे इस प्रकार समझना चाहिये— (1) चित्ततत्त्व या बुद्धितत्त्व जो कुछ कहिये—यह तीनों पहला और सात्त्विक है। यह क्रियाशील, परिणामी और जड है किंतु सात्त्विक होनेके स्फटिकमणिकी भाँति उज्ज्वल है; यह अपना है। (2) इसके सामने जिस समय जैसा बाह्य आता है अर्थात् जिस सम्बन्ध होता है, उसके रंगमें रँगा हुआ यह हो जाता है, इसलिये प्रतीत होता है। (3) साथ सम्बन्ध होनेके वह रंगमें रँगा हुआ रहता है, इसलिये यह हुआ प्रतीत होने लगता है। वास्तवमें उसमें प्रतिबिम्बित होनेवाले विषयोंसे और सर्वथा भिन्न है तो भी भ्रान्तिसे उनके प्रतीत होने लग जाता है। अतएव कई दर्शनकार तो ही — मानकर कहने लगते हैं कि भिन्न और कोई नहीं है और दूसरे यह कहते हैं कि अतिरिक्त ये दीखनेवाले गौ, घट आदि और उसके कारणरूप पंचभूत आदि भी कुछ नहीं हैं, ही सब होकर दिखलायी देता है। परंतु यह द्वारा अपने स्वरूपमें हो जानेपर नष्ट हो जाता है
अब भिन्न दृढ़ करनेके लिये दूसरा बतलाते हैं—
जो वस्तु बहुत मिल-जुलकर समर्थ होती है; वह संहत्यकारी कहलाती है—जैसे मकान, भोजन आदि। ऐसी वस्तु अपनेसे भिन्न किसी दूसरेके लिये ही हुआ करती है, अपने लिये नहीं; अत: यह परार्थ कहलाती है। यह भी सत्त्व, रज और तम—इन तीनों मिश्रणसे उत्पन्न है तथा बाह्य और इन्द्रियोंके संयोगसे उनसे मिल-जुलकर करनेमें समर्थ होता है; अत: यह अपने लिये नहीं है, लिये है तथा उसीके और सम्पादन करनेके लिये यह नाना वासनाओंसे चित्रित है। यह है कि यद्यपि ही सब बाह्य चित्र पड़ते हैं और वह अगणित वासनाओंसे रँगा हुआ है तो भी वह स्वयं- और नहीं है; क्योंकि वह बाह्य और इन्द्रिय आदिसे मिल-जुलकर काम करनेवाला है, अत: दूसरेके लिये है
यहाँतक और —इन दोनोंकी भिन्नताका युक्तियोंद्वारा प्रतिपादन किया; किन्तु तो स्वरूप सामान्यभावसे ही समझमें आता है, उसके स्वरूपका विशेष तो समाधिद्वारा ही हो सकता है। अत: होनेवाले विवेकज्ञानद्वारा जब आत्मस्वरूपका कर लेता है, तब उसकी क्या पहचान है? यह बतलाते हैं—
अपने स्वरूपको जाननेके लिये जो इस प्रकारके संकल्प होते हैं कि मैं कौन हूँ, कैसा हूँ—इत्यादि, इसका नाम आत्मभावभावना अर्थात् आत्मज्ञानके चिन्तन है। यह जबतक मनुष्यको स्वरूपका नहीं होता, तबतक ऊँचे से-ऊँचे भी रहती है। परंतु जिसने विवेकज्ञानद्वारा इस भलीभाँति समझ लिया है कि और आदिसे भिन्न है, जिसे अपने स्वरूपका संशयरहित हो गया है, उसकी उपर्युक्त आत्मभावभावना सर्वथा मिट जाती है। यही उसकी पहचान है
उस समय उस कैसी रहती है? यह बतलाते हैं—
- मनुष्योंका निमग्न और -परायण अर्थात् विषयोंके अभिमुख रहता है। परंतु जब विवेकज्ञानका उदय हो जाता है, उस समय नि:सार संसारके विषयोंकी ओर नहीं जाता, उनसे सर्वथा हो जाता है और उस विवेकज्ञानमें निरन्तर बहता है तथा अभिमुख हो जाता है यानी अपने होना कर देता है; क्योंकि अपने हो जाना और -स्वरूपमें प्रतिष्ठित हो जाना—यही है (योग० 4। 34)
यदि विवेकज्ञानमें झुका हुआ रहता है तथा अपने होने लगता है तो फिर व्युत्थान- उसकी दूसरी कैसी होती होंगी? इसपर कहते हैं—
विवेकज्ञानमें निमग्न हुए व्युत्थान-अवस्थाओंके समय जो अन्य वस्तुओंकी प्रतीतिका व्यवहार देखनेमें आता है, वह दग्ध-बीजके सदृश पूर्वसंस्कारोंसे देखनेमें आता है
उन सर्वथा कब और कैसे होता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
दग्ध हुए बीजके सदृश जो हैं, उनका जैसे प्रतिप्रसवसे अर्थात् लयसे बतलाया है (योग० 2। 10), उसी प्रकार इनका भी समझ लेना चाहिये। जबतक किसी भी परिस्थितिमें है, तबतक सर्वथा नहीं होता; उनका तो अपने होनेपर उसके साथ ही होता है, परंतु भूने हुए बीजके सदृश ज्ञानरूप जलाये हुए रहकर भी पुनर्जन्मके नहीं बन सकते। अत: उनके होनेवाला नये उत्पादक नहीं है (योग० 4। 6)
विवेकज्ञान प्राप्त होनेके बाद क्या होता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
जब विवेकज्ञान उदय होता है, तब अत्यन्त स्वच्छता आ जाती है, अत: उसमें आ जाती है, उस समय सर्वज्ञ हो जाता है (योग० 3। 49)। ऐसी प्राप्त होनेपर भी जो उस उपभोग नहीं करता, सर्वज्ञतारूप ऐश्वर्यमें आसक्त नहीं होता, उससे सर्वथा हो जाता है, तब उसके विवेकज्ञानमें किसी प्रकारका अन्तराय () नहीं पड़ सकता, वह निरन्तर उदित (प्रकाशमान) रहता है, इसलिये, तत्काल ही उस धर्ममेघ प्राप्त हो जाती है
उस धर्ममेघ क्या होता है, इसपर कहते हैं—
प्रकारसे जब धर्ममेघ हो जाती है, तब उस अविद्यादि पाँचों तथा शुक्ल, कृष्ण और मिश्रित—ऐसे तीनों प्रकारके कर्मसंस्कार समूल नष्ट हो जाते हैं। अत: वह जीवन्मुक्त कहलाता है
उस समय क्या स्वरूप होता है? यह बतलाते हैं—
विवेकज्ञानकी प्राप्तिके पहले सीमाबद्ध करनेवाले जितने भी आदि परदे रहते हैं एवं उसमें जितना भी -संस्काररूपमें संग्रह किया हुआ मल रहता है, वे सब-के-सब उपर्युक्त धर्ममेघ नष्ट हो जाते हैं। इस अनन्त—सीमारहित हो जाता है, तब दुनियाके जितने भी ज्ञेय हैं, वे ऐसे अल्प हो आते हैं, जिस प्रकार जुगनू (खद्योत), उस समय उस और मुक्त कोई भी तत्त्व अज्ञात नहीं रह सकता
यहाँ यह प्रश्न उठता है कि तीनों परिणामशील हैं; अत: उनका अवश्यम्भावी है, फिर वे लिये पुनर्जन्म देनेवाले क्यों नहीं होते, इसपर कहते हैं—
जब धर्ममेघ प्राप्ति हो जाती है, तब उसके लिये कोई शेष नहीं रहता, उनका काम जो और देना है; पूरा हो जाता है, इस उनका जो निरन्तर होते रहनारूप परिणामक्रम है वह उस लिये समाप्त हो जाता है। अत: वे भावी निर्माण नहीं कर सकते
प्रसंगवश स्वरूप बतलाते हैं—
कोई भी वस्तु जब किसी एक दूसरे बदलती है या एक रहती हुई भी पुरानी होती चली जाती है, तब वह उसका किसी एक दिनमें, एक घड़ीमें या एक पलमें नहीं हो जाता; उसमें होता रहता है, परंतु जाननेमें नहीं आता। उस वस्तुका दूसरा पूर्ण होनेसे यह अनुमानद्वारा जाना जाता है कि यह एक साथ नहीं बदली है, बदलती रही है (योग० 3। 15 और 52 की टीकामें भी आया है)। इस प्रकार अन्तमें होनेसे उसे यहाँ ‘परिणामापरान्तनिर्ग्राह्य’ कहा है और प्रत्येक इसका सम्बन्ध है। एक बाद दूसरा , उसके बाद तीसरा —इस तरह प्रवाहमें जो पूर्वापरका ज्ञापक (जाननेमें ) है, उसीको ‘क्रम’ कहते हैं। अत: इसको क्षणप्रतियोगी कहा गया है। क्षणप्रतियोगीका शब्दार्थ यह भी कहा जा सकता है कि जो प्रतियोगी यानी विभाजक (विभाग करनेवाला) है, वह है
पहले बत्तीसवें परिणामक्रमकी समाप्तिको नाम दिया गया है। स्वरूपका प्रतिपादन करके इस समाप्ति करते हैं—
और सम्पादन करनेके लिये है। इसी कामको पूरा करनेके लिये वे , अहंकार, तन्मात्रा, मन, इन्द्रियों और शब्दादि विषयोंके आकारमें होते हैं। जिस लिये ये भुगताकर () सम्पादन कर देते हैं, उसके लिये उनका कोई शेष नहीं रहता, तब वे अपने पूरा कर चुकनेवाले और कारणरूपमें विभक्त हुए प्रतिलोमपरिणामको प्राप्त होकर अपने हो जाते हैं, यही अर्थात् अलग हो जाना है और उन साथ जो अनादिसिद्ध अविद्याकृत संयोग था, उसका हो जानेपर अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित हो जाना, यह अर्थात् सर्वथा अलग हो जाना है (योग० 2। 25)