SANATANI
Maharshi Patanjali · Yoga · 195 verses
Pada 2
Sadhana Pada
(1) तप—अपने वर्ण, आश्रम, परिस्थिति और अनुसार स्वधर्मका पालन करना और उसके पालनमें जो शारीरिक या मानसिक अधिक-से-अधिक कष्ट प्राप्त हो, उसे सहर्ष सहन करना—इसका नाम ‘तप’ है। व्रत, उपवास आदि भी इसीमें आ जाते हैं। निष्कामभावसे इस तपका पालन करनेसे मनुष्यका अन्त:करण अनायास ही हो जाता है, यह गीतोक्त कर्मयोगका ही अंग है। (2) स्वाध्याय—जिनसे अपने -अकर्तव्यका बोध हो सके, ऐसे , , महापुरुषोंके लेख आदिका पठन-पाठन और भगवान्के ॐ कार आदि किसी नामका या गायत्रीका और किसी भी इष्टदेवताके मन्त्रका जप करना ‘स्वाध्याय’ है। इसके सिवा अपने जीवनके अध्ययनका नाम भी स्वाध्याय है। अत: प्राप्त विवेकके द्वारा अपने खोजकर निकालते रहना चाहिये। (3) -प्रणिधान— शरणापन्न हो जानेका नाम ‘ईश्वर-प्रणिधान’ है। उसके नाम, , लीला, धाम, और प्रभाव आदिका श्रवण, कीर्तन और मनन करना, समस्त भगवान्के समर्पण कर देना, अपनेको भगवान्के हाथका यन्त्र बनाकर जिस प्रकार वह नचावे, वैसे ही नाचना, उसकी आज्ञाका पालन करना, उसीमें अनन्य प्रेम करना—ये सभी -प्रणिधानके अंग हैं। यद्यपि तप, स्वाध्याय और -प्रणिधान—ये तीनों ही यम, आदि अंगोंमें अन्तर्गत आ जाते हैं तथापि इन तीनों विशेष महत्त्व और इनकी सुगमता दिखलानेके लिये पहले क्रियायोगके नामसे इनका अलग किया गया है
उपर्युक्त क्रियायोगका फल बतलाते हैं—
उपर्युक्त क्रियायोग अविद्यादि क्षीण करनेवाला और करनेवाला है अर्थात् इसके अविद्यादि होकर उसको -अवस्थातक प्राप्ति हो सकती है
दूसरे क्रियायोगका फल समाधिसिद्धि और बतलाया गया, उनमेंसे और फलका तो पहले हो चुका है, परंतु कितने हैं, उनके नाम क्या हैं, वे किस-किस रहते हैं, उनका कैसे होता है और उनका क्यों करना चाहिये—इन सब बातोंका नहीं हुआ। अत: प्रसंगानुसार इस प्रकरणका करते हैं—
ये अविद्यादि पाँचों ही जीवमात्रको संसारचक्रमें घुमानेवाले महादु:खदायक हैं। इस इनका नाम ‘क्लेश’ रखा है। कितने ही टीकाकारोंका तो कहना है कि ये पाँचों ही पाँच प्रकारका विपर्ययज्ञान है। कुछ इनमेंसे केवल और विपर्ययवृत्तिकी ही करते हैं; किंतु ये दोनों ही बातें युक्तिसंगत नहीं मालूम होतीं; क्योंकि प्रमाणवृत्तिमें विपर्ययवृत्तिका है, पर अविद्यादि पाँचों वहाँ भी रहते हैं। ऋतम्भरा लेश भी नहीं स्वीकार किया जा सकता, परंतु जिस अविद्यारूप और संयोगका माना गया है, वह तो वहाँ भी रहता ही है, अन्यथा संयोगके हेयका होकर उसी - प्राप्ति हो जानी चाहिये थी। इसके सिवा एक बात और भी है। इस ग्रन्थमें - प्राप्त अशुक्ल और अकृष्ण अर्थात् पुण्य-पापके रहित माने गये हैं (योग० 4। 7), इससे यह होता है कि जीवन्मुक्त योगीद्वारा भी अवश्य किये जाते हैं। तब यह भी मानना पड़ेगा कि व्युत्थान- जब वह करता है तो विपर्ययवृत्तिका भी स्वाभाविक होता है; क्योंकि पाँचों ही हैं और व्युत्थान- रहता है, यह स्वीकार करना ही पड़ेगा। किंतु जीवन्मुक्त भी रहती है, यह नहीं माना जा सकता, क्योंकि यदि है तो वह जीवन्मुक्त ही कैसा; इसी तरह और भी बहुत-से हैं (देखिये योग० 1। 8 की टीका), जिनसे और माननेमें सिद्धान्तकी हानि होती है। अत: विद्वान् सज्जनोंको इसपर करना चाहिये
अब बतलाते हुए यह बात कहते हैं कि इन सबका मूल अविद्यारूप है—
(1) प्रसुप्त— रहते हुए भी जिस समय जो अपना नहीं करता, उस समय उसे प्रसुप्त कहा जाता है। प्रलयकाल और सुषुप्तिमें चारों ही प्रसुप्त- रहती है। (2) तनु— जो करनेकी है, उसका जब साधनोंद्वारा हृस कर दिया जाता है; तब वे हीन शक्तिवाले ‘तनु’ कहलाते हैं। देखनेमें भी आता है कि ये -द्वेषादि मनुष्योंकी भाँति अपना आधिपत्य नहीं जमा सकते अर्थात् मनुष्योंकी अपेक्षा उनका प्रभाव बहुत कम पड़ता है। (3) विच्छिन्न—जब कोई उदार होता है, उस समय दूसरा दब जाता है, वह उसकी ‘विच्छिन्नावस्था’ है, जैसे उदार- दब जाता है और उदार- दबा रहता है। (4) उदार—जिस समय जो अपना कर रहा हो उस समय वही ‘उदार’ कहलाता है। उपर्युक्त पाँच क्लेशोंमेंसे अस्मितादि चार ही प्रसुप्तादि चार अवस्थाभेद बतलाये गये हैं, नहीं; क्योंकि वह अन्य चारोंका है, उसके सबका सदाके लिये समूल हो जाता है
अब स्वरूप बतलाते हैं—
इस लोक और परलोकके समस्त और आयतन यह मनुष्यशरीर भी अनित्य है, इस बातको प्रत्यक्षादि प्रमाणोंद्वारा समझकर भी जिसके प्रभावसे मनुष्य उनमें नित्यत्वबुद्धि करके -द्वेषादि कर लेता है, यह अनित्यमें नित्यकी अनुभूतिरूप है। इसी प्रकार हाड़, मांस, मज्जा आदि अपवित्र धातुओंके समुदायरूप अपने और स्त्री आदिके प्रत्यक्षादि प्रमाणोंद्वारा अपवित्र समझते हुए भी जिसके मनुष्य अपने पवित्रताका अभिमान करता है और स्त्री-पुत्र आदिके प्यार करता है, यह अपवित्रमें पवित्रकी अनुभूतिरूप है। वैसे ही प्रत्यक्षादि प्रमाणोंद्वारा करनेपर सभी दु:खरूप हैं— यह बात विचारशील समझमें आ जाती है (योग० 2। 15)। इसपर भी मनुष्य उन सुखदायक समझकर उनके भोगनेमें प्रवृत्त हुआ रहता है, यही दु:खमें अनुभूतिरूप है। यद्यपि यह बात थोड़ा-सा करते ही समझमें आ जाती है कि जड नहीं है तथापि मनुष्य इसीको अपना स्वरूप माने रहता है, इससे सर्वथा और है—इस बातका नहीं कर सकता, इसका नाम अनात्मामें आत्मभावका अनुभूतिरूप है। , और - वस्तुस्थितिका सामान्य हो जानेपर विपर्ययवृत्ति नहीं रहती, तो भी नहीं होता; इससे यह होता है कि विपर्ययवृत्तिका नाम नहीं है
अब स्वरूप बतलाते हैं—
दृक्- अर्थात् — और - अर्थात् —ये दोनों सर्वथा भिन्न और हैं। है और जड है। इनकी हो ही नहीं सकती। तथापि दोनोंकी -सी हो रही है (योग० 2। 24)। इसीको और संयोग कहते हैं। यही और स्वरूपकी उपलब्धिका माना गया है (योग० 2। 23)। इस संयोगके रहते हुए भी और भिन्न-भिन्न स्वरूप द्वारा और - द्वारा समझमें तो आता है; परंतु जबतक निर्बीज-समाधिद्वारा सर्वथा नहीं कर दिया जाता, तबतक संयोगका नहीं होता है। इस इनके स्वरूपका नहीं होता (योग० 3। 35)। अत: चाहिये कि तत्परतासे उत्साहपूर्वक योगसाधनमें लगकर शीघ्र ही नाशद्वारा संयोगरूप नामक कर दे और - प्राप्त कर ले
अब नामक स्वरूप बतलाते हैं—
प्रकृतिस्थ जब कभी जिस किसी अनुकूल प्रतीति हुई है या होती है, उसमें और उसके उसकी आसक्ति (प्रीति) हो जाती है, उसीको ‘राग’ कहते हैं। अत: इस नामक प्रतीतिके साथ-साथ रहनेवाला कहा गया है
अब नामक स्वरूप बतलाते हैं—
मनुष्यको जब कभी जिस किसी प्रतिकूल दु:खकी प्रतीति हुई है या होती है, उसमें और उसके उसका हो जाता है; अत: यह द्वेषरूप दु:खकी प्रतीतिके पीछे यानी साथ-साथ रहनेवाला है
अब नामक स्वरूप बतलाते हैं—
यह मरणभयरूप सभी प्राणियोंमें स्वाभाविक है; अत: कोई भी यह नहीं चाहता कि मैं न रहूँ, सभी अपनी विद्यमानता चाहते हैं। एक छोटे-से-छोटा कीट भी डरकर अपनी रक्षाका उपाय करता है। (इससे पूर्वजन्मकी होती है; क्योंकि यदि -दु:ख पहले किया हुआ नहीं होता तो उसका भय कैसे होता?) यह मरणभय अन्त:करणमें इतना गहरा बैठा हुआ है कि मूर्खके जैसा ही विवेकशीलपर भी इसका प्रभाव पड़ता है, इसीलिये इसका नाम ‘अभिनिवेश’ अर्थात् ‘अत्यन्त गहराईमें प्रविष्ट’ रखा गया है
इन पाँच प्रकारके तनु अर्थात् बना देनेका उपाय—‘क्रियायोग’ पहले बतला चुके। ‘क्रियायोग’ के द्वारा किये हुए किस उपायसे करना चाहिये, यह बात अगले बतलाते हैं।
क्रियायोग या ध्यानयोगद्वारा किये हुए निर्बीज- द्वारा उसके करके करना चाहिये; क्योंकि क्रियायोग या ध्यानद्वारा क्षीण कर दिये जानेपर भी जो लेशमात्र शेष रह जाते हैं, उनका और संयोगका होनेपर ही होता है, उसके पहले सर्वथा नहीं होता, यह है
अब क्षीण करनेका क्रियायोगसे अतिरिक्त दूसरा बतलाते हैं—
उन जो हैं, उनका यदि पूर्वोक्त क्रियायोगके द्वारा करके उन नहीं बना दिया गया हो तो पहले द्वारा उनकी करके उनको बना लेना चाहिये, तभी निर्बीज- सुगमतासे हो सकेगी। उसके बाद निर्बीज- सर्वथा अपने-आप हो जायगा
उपर्युक्त किस प्रकार महान् दु:खोंके हैं; इस बातको स्पष्ट करनेके लिये अलग प्रकरण किया जाता है—
जड़ उपर्युक्त पाँचों ही हैं। अविद्यादि न रहनेपर किये हुए कर्माशय नहीं बनता, बल्कि वैसे -द्वेषरहित निष्काम तो पूर्वसंचित कर्माशयका भी करनेवाले होते हैं (गीता 4। 23)। यही क्लेशमूलक कर्माशय जिस प्रकार इस दु:ख देता है, उस प्रकार होनेवाले भी दु:खदायक है। अत: इसकी जड़ काट डालनी चाहिये अर्थात् पूर्वोक्त सर्वथा कर देना चाहिये
उस कर्माशयका फल कबतक मिलता रहता है और वह क्या है, इसको स्पष्ट करते हैं—
जबतक क्लेशरूप जड़ रहती है, तबतक इस -समुदायरूप कर्माशयका विपाक यानी —बार-बार अच्छी-बुरी होना, वहाँपर निश्चित आयुतक जीते रहकर फिर -दु:खको भोगना और जीवनावस्थामें जो विवेकदृष्टिसे सभी दु:खरूप हैं, ऐसे सम्बन्ध होना—ऐसे तीन प्रकारका होता रहता है
वे , और भोगरूप किस प्रकारके होते हैं, यह बतलाते हैं—
जो पुण्यकर्मका है, वह सुखदायक होता है और जो पापकर्मका है, वह दु:खदायक होता है। इसी प्रकार जितना समय शुभकर्मका है, उतना समय सुखदायक होता है और जितना पापकर्मका है, उतना दु:खदायक होता है। वैसे ही जो-जो अर्थात् मनुष्योंके, अन्य प्राणियोंके और एवं परिस्थिति आदिके संयोग-वियोग पुण्यकर्मके होते हैं, वे हर्षप्रद होते हैं और जो पापकर्मके होते हैं, वे शोकप्रद होते हैं
यहाँ यह शंका हो सकती है कि यदि यही बात है तब तो जिसका केवल दु:खप्रद फल (, और ) हैं ऐसे कर्माशयका ही उसके मूलसहित करना उचित है। उसके साथ सुखप्रद कर्माशयका करनेकी बात क्यों कही? इसपर कहते हैं—
(1) परिणामदु:ख—जो ‘कर्मविपाक’ भोगकालमें दृष्टिसे सुखप्रद प्रतीत होता है, उसका भी (नतीजा) दु:ख ही है। जैसे स्त्रीप्रसंगके समय मनुष्यको भासता है; परंतु उसका बल, वीर्य, तेज, आदिका हृस देखनेमें आता है, ऐसे ही दूसरे भी समझ लेना चाहिये।10 भोगते-भोगते मनुष्य थक जाता है, उन्हें भोगनेकी उसमें नहीं रहती, परंतु तृष्णा बनी रहती है, इससे वह भोगरूप भी दु:ख ही है। यह अन्तमें होनेवाला दु:ख भी -दु:खकी ही गणनामें है। इन्द्रियों और सम्बन्धसे जब मनुष्यको किसी भी प्रकारके प्रतीति होती है, तब उसमें —आसक्ति अवश्य हो जाती है। इसलिये वह रागरूप मिला हुआ है। आसक्तिवश मनुष्य उस प्राप्तिके साधनरूप अच्छे-बुरे भी करेगा ही। भोग्यवस्तुओंकी प्राप्तिमें असमर्थ होनेसे या आनेपर होना भी अवश्यम्भावी है। इसके सिवा, प्राणियोंकी बिना भी नहीं होती। अत: , और हिंसादिका अवश्य ही दु:ख है। यह भी -दु:खता है। (2) तापदु:ख—सभी प्रकारके भोगरूप विनाशशील हैं; उनसे वियोग होना निश्चित है, अत: भोगकालमें उनके विनाशकी सम्भावनासे भयके तापदु:ख बना रहता है। इसी तरह मनुष्यको जो सुखकारक प्राप्त होते हैं वे सातिशय ही होते हैं, अर्थात् उसे जो कुछ प्राप्त है, उससे बढ़कर दूसरोंको भी प्राप्त है यह देखकर वह जलता रहता है। यह भी तापदु:ख है तथा अपूर्णतासे भी भोगकालमें संताप बना रहता है, यह भी तापदु:ख है। (3) संस्कारदु:ख—जिन-जिन मनुष्यको होता है, उस उसके हृदयमें जम जाते हैं। जब उन -सामग्रियोंसे उसका वियोग हो जाता है, तब वे पहलेके सुखभोगकी स्मृतिद्वारा महान् दु:खके हो जाते हैं। देखनेमें भी आता है कि जब किसी मनुष्यकी स्त्री, पुत्र, धन, मकान आदि भोगसामग्री नष्ट हो जाती है, तब वह उनको याद कर-करके रोता रहता है कि मेरी स्त्री मुझे अमुक-अमुक प्रकारसे देती थी, मेरे पास इतना धन था, मैं अपने धनसे स्वयं भोगता था और लोगोंको पहुँचाता था, आज मेरी यह दशा है कि मैं भिखारी होकर लोगोंसे सहायता माँगता फिरता हूँ—इत्यादि। इसके सिवा, वे -, भोगासक्तिकी वृद्धिमें होनेसे जन्मान्तरमें भी दु:खके हैं। (4) गुणवृत्तिविरोध— नाम गुणवृत्ति है, परस्पर अत्यन्त विरोध है। जैसे सत्त्वगुणका , और है, तो तमोगुणका अन्धकार, और दु:ख है। इस प्रकार इनके कार्योंमें विरोध होनेके दुविधा बनी रहती है; -भोगकालमें भी शान्ति नहीं मिलती; क्योंकि तीनों एक साथ रहनेवाले हैं। अनुभवकालमें सत्त्वगुणकी प्रधानता रहते हुए भी रजोगुण और तमोगुणका नहीं हो जाता, अत: उस समय भी दु:ख और शोक रहते हैं; इसलिये भी वह दु:ख ही है। जैसे ध्यानकालमें और सत्संग करते समय सत्त्वगुणकी प्रधानता रहती है, अत: सात्त्विक होता है, परंतु वहाँ भी स्फुरणा और तन्द्रा उस कर देते हैं ऐसे ही अन्य कामोंमें भी समझ लेना चाहिये। उपर्युक्त परिणामदु:ख, तापदु:ख और संस्कारदु:ख तथा गुणवृत्तियोंके विरोधसे होनेवाले दु:खको विचारद्वारा विवेकी समझता है। इस उसकी दृष्टिमें सभी ‘कर्मविपाक’ दु:खरूप ही हैं अर्थात् मनुष्यसमुदाय जिन सुखरूप समझता है, विवेकीके लिये वे भी दु:ख ही हैं11
उपर्युक्त यह हो गया है कि , और भोगरूप सभी कर्मविपाक दु:खरूप हैं; इसलिये उनका मूलसहित उच्छेद करना मनुष्यका है। अत: अब उनको त्याज्य ( करनेयोग्य) बतलाकर उनसे पानेका उपाय बतलाते हुए अगला प्रकरण करते हैं—
पहले जो अनेक दु:ख भोगे जा चुके, वे तो अपने-आप समाप्त हो गये, उनके कोई नहीं करना है तथा जो हैं वे भी देकर दूसरे अपने-आप हो जायँगे, उनके लिये भी उपायकी आवश्यकता नहीं है। परन्तु जो दु:ख अभीतक प्राप्त नहीं हुए हैं, होनेवाले हैं, उनका उपायद्वारा अवश्य- है; इसलिये उन्हींको ‘हेय’ बतलाया गया है
जिसका करना हो, उसके मूल जाननेकी आवश्यकता है; क्योंकि मूल ही उसका हो सकता है; नहीं तो वह पुन: उत्पन्न हो सकता है। अत: ‘हेय’ का () बतलाते हैं।
ऊपर जो करनेयोग्य आनेवाले दु:ख बतलाये गये हैं, उनका मूल और अर्थात् और संयोग यानी जड- ग्रन्थि है। अत: इस संयोगका कर देनेसे मनुष्य सर्वथा दु:खोंसे निवृत्त हो सकता है
पूर्व , और उनका संयोग—इन तीनके नाम आये हैं, उनमेंसे पहले , स्वरूप और बतलाते हैं—
सत्त्व, रज और तम—ये तीनों और इनका जो कुछ भी देखने, सुनने और समझनेमें आता है, वह सब-का-सब अन्तर्गत है। सत्त्वगुणका मुख्य है, रजोगुणका मुख्य (हलचल) है और तमोगुणका मुख्य अर्थात् जडता और सुषुप्ति आदि है। इन तीनों साम्यावस्थाको ही प्रधान या कहते हैं। यह सांख्यका मत है। अत: सब अवस्थाओंमें अनुगत तीनों जो , और स्थितिरूप है, वही है। पाँच , पाँच तन्मात्रा, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ एवं मन, और अहंकार—ये सब (तेईस तत्त्व) होनेसे उसके स्वरूप हैं। भोगासक्त अपना स्वरूप दिखलाकर करना और चाहनेवाले स्वरूप दिखलाकर करना है। उसका निज स्वरूप दिखा देनेके बाद इसका कोई नहीं रहता, उस लिये यह अस्त () हो जाता है (2। 22)
अपने ग्रन्थकी परिभाषामें करते हैं—
(1) विशेष—, जल, , और —ये पाँच तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और एक मन—इस प्रकार सब मिलकर सोलहोंका नाम ‘विशेष’ है। विशेष अभिव्यक्ति (प्रकटता) इन्हींसे होती है, इसलिये इनको विशेष कहते हैं। सांख्यकारिकामें इनका नाम विकार रखा है (सां० का० 3)। (2) अविशेष—शब्द, स्पर्श, , रस और गन्ध—ये पाँच तन्मात्राएँ हैं, इन्हींको महाभूत भी कहते हैं; क्योंकि ये पाँच महाभूतोंके हैं तथा छठा अहंकार जो कि मन और इन्द्रियोंका है, इन छहोंका नाम ‘अविशेष’ है। इनका स्वरूप इन्द्रियगोचर नहीं है, इसलिये इनको ‘अविशेष’ कहते हैं। (3) लिंगमात्र—उपर्युक्त बाईस तत्त्वोंका कारणभूत जो महत्तत्त्व है, जिसका उपनिषदोंमें और नामसे किया गया है, (कठ० 1। 3। 10; गीता 13। 5) उसका नाम ‘लिंगमात्र’ है। इसकी उपलब्धि केवल सत्तामात्रसे ही होती है, इस इसको ‘लिंगमात्र’ कहते हैं। (4) अलिंग—मूल , (सां० का०) जो कि तीनों साम्यावस्था मानी गयी है, महत्तत्त्व जिसका पहला () है, उपनिषद् और जिसका अव्यक्त नामसे किया गया है (कठ० 1। 3। 11; गीता 13। 5) उसका नाम ‘अलिंग’ है। साम्यावस्थाको प्राप्त स्वरूपकी अभिव्यक्ति नहीं होती, इसलिये चिह्नरहित (अव्यक्त) कहते हैं। इस प्रकार चार अवस्थाओंमें रहनेवाले ये सत्त्वादि ही नामसे कहे गये हैं
अब स्वरूपका करते हैं—
केवल चेतनमात्र ही जिसका स्वरूप है, ऐसा आत्मतत्त्व स्वरूपसे सर्वथा , है तो भी सम्बन्धसे बुद्धिवृत्तिके अनुरूप देखनेवाला होनेसे ‘द्रष्टा’ कहलाता है। वास्तवमें (आत्मतत्त्व) सर्वथा , , कूटस्थ, है तथापि इसका सम्बन्ध साथ अनादिसिद्ध माना जाता है। जबतक उस नाशद्वारा यह अलग होकर अपने असली स्वरूपमें स्थित नहीं हो जाता तबतक साथ प्राप्त हुआ-सा देखता रहता है और जबतक उनको देखता है, तभीतक इसकी ‘द्रष्टा’ संज्ञा है। सम्बन्ध न रहनेपर किसका? फिर तो यह केवल चेतनमात्र, सर्वथा और है ही
और स्वरूपका करनेके बाद अब स्वरूपकी सार्थकताका प्रतिपादन करते हैं—
अपने दर्शनद्वारा करनेके लिये और निज स्वरूपका कराकर () करनेके लिये—इस प्रकार करनेके लिये ही है। इसीमें उसके होनेकी सार्थकता है। अठारहवें करते समय भी यही बात कही गयी है
कर देनेके बाद कोई शेष नहीं रहता, फिर उसका बना रहना निरर्थक है; अत: उसका हो जाना चाहिये; इसपर कहते हैं—
किसी एक ही लिये और करना नहीं है, वह तो सभी लिये समान है। अत: जिसका वह कर चुकी, उस कृतार्थ—मुक्त लिये उसकी आवश्यकता न रहनेके यद्यपि वह उसके लिये नष्ट हो जाती है, तो भी दूसरे सब और करना तो शेष है ही। इसलिये उसका सर्वथा नहीं होता, वह रहती है। इससे यह बात होती है कि परिणामी होनेपर भी और नित्य है। यहाँ जो मुक्त लिये उसका नष्ट होना बतलाया गया है, वह भी अदृश्य होना ही बतलाया गया है; क्योंकि सिद्धान्तमें किसी भी वस्तुका सर्वथा नहीं माना गया है
अब संयोगके स्वरूपका करते हैं—
स्वरूप ही लिये है, यह बात पहले कह आये हैं, इसी लेकर इस स्वामी बतलाया है और ‘स्व’ अर्थात् अपना यानी अधिकृत कहा है। उस साथ सम्बन्ध उन दोनोंके स्वरूपको जाननेके लिये ही है, अत: उस () जबतक मनुष्य इस नाना देखता रहता है, तबतक तो भोगता रहता है। जब इनके होकर अपने स्वरूप- ओर झाँकता है, तब स्वरूपका हो जाता है (योग० 3। 35)। फिर संयोगकी कोई आवश्यकता न रहनेसे उसका हो जाता है। यही ‘कैवल्य’ है (योग० 3। 34)
अब संयोगका बतलाते हैं—
सर्वथा जो यह जड साथ सम्बन्ध है यह अनादिसिद्ध ही है, वास्तवमें नहीं है। यहाँ विपर्ययवृत्तिका नाम नहीं है, किंतु अपने स्वरूपके अनादिसिद्ध नाम है। इसीलिये अपने स्वरूपके इसका हो जाता है और उसके बाद न रहनेपर वह भी हो जाता है। यही ‘कैवल्य’ है
अब कारणसहित संयोगके होनेवाले सर्वथा दु:खनाशरूप ‘हान’ का करते हैं—
जब आत्मदर्शनरूप यानी सर्वथा हो जाता है, तब अज्ञानजनित संयोगका भी अपने-आप हो जाता है, फिर कोई सम्बन्ध नहीं रहता और उसके - आदि सम्पूर्ण दु:खोंका सदाके लिये अत्यन्त हो जाता है तथा अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है—यही उसका अर्थात् सर्वथा अकेलापन है
अब दु:खोंके अत्यन्त अभावरूप ‘हान’ का उपाय बतलाते हैं—
तथा उसके -, अहंकार, इन्द्रियाँ और —इन सबके यथार्थ स्वरूपका हो जानेसे तथा इनसे सर्वथा भिन्न और है, इनके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है, इस प्रकार स्वरूपका यथार्थ हो जानेसे जो और स्वरूपका अलग-अलग यथार्थ होता है, इसीका नाम ‘विवेकज्ञान’ है (योग० 3। 54)। उस समय विवेकज्ञानमें निमग्न और अभिमुख रहता है। यह जब निर्मलता—स्वच्छता होनेपर पूर्ण और निश्चल हो जाता है, उसमें किसी प्रकारका भी मल नहीं रहता (योग० 4। 31), तब वह अविप्लव विवेकज्ञान कहलाता है। ऐसा विवेकज्ञान ही समस्त दु:खोंके अत्यन्त अभावरूप उपाय है। इससे संसारके बीज अविद्यादि और समस्त सर्वथा हो जाता है (योग० 4। 30)। उसके बाद अपने आश्रयरूप—महत्तत्त्व आदिके सहित अपने हो जाता है तथा जो स्वाभाविक - है, वह उसके लिये बंद हो जाता है (योग० 4। 32)
विवेकज्ञानके समय किस प्रकारकी होती है, यह बतलाते हैं—
जब और अचल विवेकख्यातिके द्वारा आवरण और मल सर्वथा नष्ट हो जाता है (योग० 4। 31) उस समय उस दूसरे उदय नहीं होता। अत: सात प्रकारकी उत्कर्ष अवस्थावाली () उत्पन्न होती है। उनमें पहली चार प्रकारकी तो कार्यविमुक्तिकी द्योतक हैं, इस वे ‘कार्यविमुक्तिप्रज्ञा’ कहलाती हैं और अन्तकी तीन चित्तविमुक्तिकी द्योतक हैं, इस उनका नाम ‘चित्तविमुक्तिप्रज्ञा’ है। कार्यविमुक्तिप्रज्ञा यानी कर्तव्यशून्य चार इस प्रकार हैं— (1) ज्ञेयशून्य —जो कुछ जानना था जान लिया; अब कुछ भी जानना शेष नहीं रहा अर्थात् जितना गुणमय है (योग० 2। 18, 19), वह सब अनित्य और परिणामी है यह जान लिया। (2) हेयशून्य —जिसका करना था, उसका कर दिया; अर्थात् और संयोगका, जो कि हेयका है, कर दिया, अब कुछ भी करनेयोग्य शेष नहीं रहा। (3) प्राप्यप्राप्त —जो कुछ प्राप्त करना था, प्राप्त कर लिया अर्थात् समाधिद्वारा केवल प्राप्ति हो चुकी; अत: अब कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रहा। (4) चिकीर्षाशून्य —जो कुछ करना था, कर लिया अर्थात् हानका उपाय जो और अचल विवेकज्ञान है, उसे कर लिया, अब और कुछ करना शेष नहीं रहा। चित्तविमुक्तिप्रज्ञाके तीन इस प्रकार हैं— (1) कृतार्थता— अपना अधिकार ‘भोग और अपवर्ग’ देना पूरा कर दिया, अब उसका कोई शेष नहीं रहा। (2) गुणलीनता— अपने कारणरूप लीन हो रहा है, क्योंकि अब उसका कोई शेष नहीं रहा। (3) आत्मस्थिति— सर्वथा होकर अपने स्वरूपमें अचल स्थित हो गया। इस सात प्रकारकी प्रान्तभूमिप्रज्ञाको करनेवाला कुशल (जीवन्मुक्त) कहलाता है और जब अपने लीन हो जाता है, तब भी कुशल (विदेहमुक्त) कहलाता है
अब विवेकज्ञानकी प्राप्तिका उपाय बतलाते हैं—
आगे बतलाये जानेवाले आठ अंगोंका करनेसे अर्थात् उनको आचरणमें लानेसे मलका होकर वह सर्वथा हो जाता है, उस समय विवेकख्यातितक हो जाता है अर्थात् उसे स्वरूप, , अहंकार और इन्द्रियोंसे सर्वथा भिन्न दिखलायी देता है
योगांगोंके नाम और उनकी संख्या बतलाते हैं—
इन आठोंके और फलोंका अगले स्वयं ही किया है, अत: यहाँ विस्तारकी आवश्यकता नहीं है
पहले यमोंका करते हैं—
(1) अहिंसा—मन, वाणी और किसी प्राणीको कभी किसी प्रकार किंचिन्मात्र भी दु:ख न देना ‘अहिंसा’ है, परदोष- सर्वथा त्याग भी इसीके अन्तर्गत है। (2) —इन्द्रिय और मनसे देखकर, सुनकर या करके जैसा किया हो, ठीक वैसा-का-वैसा ही प्रकट करनेके लिये प्रिय और हितकर तथा दूसरेको उद्वेग उत्पन्न न करनेवाले जो वचन बोले जाते हैं, उनका नाम ‘सत्य’ है। इसी प्रकार कपट और छलरहित व्यवहारका नाम सत्यव्यवहार समझना चाहिये। (3) अस्तेय—दूसरेके स्वत्वका अपहरण करना, छलसे या अन्य किसी उपायसे अन्यायपूर्वक अपना बना लेना ‘स्तेय’ (चोरी) है, इसमें सरकारकी टैक्सकी चोरी और घूसखोरी भी सम्मिलित है; इन सब प्रकारकी चोरियोंके नाम ‘अस्तेय’ है। (4) ब्रह्मचर्य—मन, वाणी और होनेवाले सब प्रकारके मैथुनोंका सब अवस्थाओंमें सदा त्याग करके सब प्रकारसे वीर्यकी रक्षा करना ‘ब्रह्मचर्य’ है12। अत: चाहिये कि न तो कामदीपन करनेवाले सेवन करे, न ऐसे दृश्योंको देखे, न ऐसी बातोंको सुने, न ऐसे साहित्यको पढ़े और न ऐसे ही मनमें लावे तथा स्त्रियोंका और स्त्री-आसक्त संग भी ब्रह्मचर्यमें बाधक है, अत: ऐसे संगसे सदा सावधानीके साथ अलग रहे। (5) अपरिग्रह—अपने स्वार्थके लिये ममतापूर्वक धन, सम्पत्ति और -सामग्रीका संचय करना ‘परिग्रह’ है, इसके नाम ‘अपरिग्रह’ है
यमोंकी सबसे ऊँची बतलाते हैं—
अहिंसादिका जब सार्वभौम अर्थात् सबके साथ, सब जगह और सब समय समानभावसे किया जाता है, तब ये महाव्रत हो जाते हैं। जैसे किसीने लिया कि मछलीके सिवा अन्य नहीं करूँगा तो यह -अवच्छिन्न अहिंसा है, इसी तरह कोई ले कि मैं तीर्थोंमें नहीं करूँगा तो यह -अवच्छिन्न अहिंसा है। कोई यह करे कि मैं एकादशी, अमावास्या और पूर्णिमाको नहीं करूँगा तो यह कालावच्छिन्न अहिंसा है। कोई करे कि मैं विवाहके अवसरके सिवा अन्य किसी नहीं करूँगा तो यह समयावच्छिन्न ( सम्बन्धित) अहिंसा है। इसी प्रकार , अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रहके भी समझ लेने चाहिये। ऐसे यम व्रत तो हैं, परंतु सार्वभौम न होनेके महाव्रत नहीं हैं। उपर्युक्त प्रकारका प्रतिबन्ध न लगाकर जब सभी प्राणियोंके साथ सब सदा-सर्वदा इनका पालन किया जाय, किसी भी इनमें शिथिलता आनेका अवकाश न दिया जाय, तब ये सार्वभौम होनेपर ‘महाव्रत’ कहलाते हैं
यमोंका करके अब करते हैं—
(1) शौच—जल, मृत्तिकादिके द्वारा , वस्त्र और मकान आदिके मलको दूर करना बाहरकी है, इसके सिवा अपने वर्णाश्रम और अनुसार न्यायपूर्वक धनको और शरीरनिर्वाहके लिये आवश्यक अन्न आदि पवित्र वस्तुओंको प्राप्त करके उनके द्वारा शास्त्रानुकूल भोजनादि करना तथा सबके साथ यथायोग्य पवित्र बर्ताव करना—यह भी बाहरी ही अन्तर्गत है। जप, तप और द्वारा एवं मैत्री आदिकी अन्त:करणके -द्वेषादि मलोंका करना भीतरकी पवित्रता है। (2) संतोष—कर्तव्यकर्मका पालन करते हुए उसका जो कुछ हो तथा प्रारब्धके अनुसार अपने-आप जो कुछ भी प्राप्त हो एवं जिस और परिस्थितिमें रहनेका संयोग प्राप्त हो जाय, उसीमें संतुष्ट रहना और किसी प्रकारकी भी कामना या तृष्णा न करना ‘संतोष’ है। (3) तप, (4) स्वाध्याय और (5) -प्रणिधान—इन तीनोंकी क्रियायोगके कर चुके हैं (देखिये योग० 2। 1 की ), उसी प्रकार यहाँ भी समझ लेना चाहिये
यम- उपस्थित होनेपर उन हटानेका उपाय बतलाते हैं—
जब कभी संगदोषसे या अन्यायपूर्वक किसीके द्वारा सताये जानेपर बदला लेनेके लिये या अन्य किसी भी मनमें अहिंसादिके विरोधी पहुँचावें अर्थात् , झूठ, चोरी आदिमें प्रवृत्त होकर यम-नियमादिका त्याग कर देनेकी परिस्थिति उत्पन्न कर दें तो उस समय उन विरोधी करनेके लिये उन दोषदर्शनरूप प्रतिपक्षकी करनी चाहिये
इस दोषदर्शनरूप प्रतिपक्षभावनाका ही अगले करते हैं—
स्वयं किये हुए, दूसरोंसे करवाये हुए, दूसरोंको करते देखकर अनुमोदन किये हुए—इस तरह तीन प्रकारसे होनेवाले , झूठ, चोरी और व्यभिचार आदि अवगुण, जो कि यम- विरोधी हैं, उनका नाम ‘वितर्क’ है। ये कभी लोभसे, कभी और कभी मोहसे एवं कभी छोटे , कभी मध्यम और कभी भयंकररूपमें सामने उपस्थित होकर उसे सताते हैं। उस समय सावधान होकर करना चाहिये कि ये हिंसादि महान् हानिकारक और नरकमें ले जानेवाले हैं, इनका अनन्तकालतक बारम्बार दु:ख भोगना और वशमें होकर शूकर-कूकर आदि मूढ़ पड़ना है, अत: इनसे सर्वथा दूर रहकर दृढ़तापूर्वक यम- पालन करते रहना चाहिये। इस प्रकारके बारम्बार करते रहना ही ‘प्रतिपक्षकी भावना’ है
इस प्रकार यम- विरोधी हिंसादिको हटानेका उपाय उसमें देखना बतलाकर अब यम- प्रीति उत्पन्न करनेके लिये उनके पालनका भिन्न-भिन्न फल बतलाते हैं—
जब अहिंसाभाव दृढ़ स्थिर हो जाता है तब उसके निकटवर्ती हिंसक भी वैरभावसे रहित हो जाते हैं। इतिहास-ग्रन्थोंमें जहाँ मुनियोंके आश्रमोंकी शोभाका आता है, वहाँ वनचर स्वाभाविक वैरका दिखलाया गया है, यह उन ऋषियोंके अहिंसाभावकी प्रतिष्ठाका द्योतक है13
जब पालन करनेमें हो जाता है, उसमें किसी प्रकारकी कमी नहीं रहती, उस समय वह कर्तव्यपालनरूप क्रियाओंके फलका आश्रय बन जाता है। जो किसीने नहीं किया है, उसका भी फल उसे कर देनेकी उस आ जाती है, अर्थात् जिसको जो वरदान, शाप या आशीर्वाद देता है, वह हो जाता है
जब चोरीका प्रतिष्ठित हो जाता है, तब जहाँ कहीं भी गुप्त स्थानमें पड़े हुए समस्त रत्न उसके सामने प्रकट हो जाते हैं अर्थात् उसकी जानकारीमें आ जाते हैं
जब ब्रह्मचर्यकी दृढ़ हो जाती है, तब उसके मन, , इन्द्रिय और हो जाता है, मनुष्य किसी काममें भी उसकी बराबरी नहीं कर सकते
जब अपरिग्रहका स्थिर हो जाता है, तब उसे अपने पूर्वजन्मोंकी और सब बातें मालूम हो जाती हैं अर्थात् मैं पहले किस हुआ था, मैंने उस समय क्या-क्या काम किये, किस प्रकार रहा—ये सब हो जाते हैं और इस भी बीती हुई सब बातें हो जाती हैं। यह भी संसारमें उत्पन्न करनेवाला और - छुटकारा पानेके लिये योगसाधनमें प्रवृत्त करनेवाला है। यहाँतक यमोंकी जो फल बतलाया गया है, उसके सिवा निष्कामभावसे यमोंका सेवन करनेसे प्राप्तिमें भी सहायता मिलती है
अब पालनका फल बतलाते हैं; परंतु इन पूर्णप्रतिष्ठाकी शर्त नहीं रखी गयी है। इससे यह मालूम होता है कि इनका जितना पालन करता है, उतना ही उसे लाभ मिलता चला जाता है। सबसे पहले अगले बाह्य शौचका फल बतलाते हैं—
बाह्य पालनसे अपने अपवित्र होकर उसमें हो जाता है अर्थात् उसमें आसक्ति नहीं रहती और दूसरे मनुष्योंके साथ संसर्ग करनेकी इच्छा नहीं रहती अर्थात् उनके संगमें भी या आसक्ति नहीं रहती
भीतरकी फल बतलाते हैं—
मैत्री आदिकी द्वारा अथवा जप, तप आदि अन्य किसी साधनद्वारा आन्तरिक शौचके लिये करनेसे -, आदि मलोंका होकर मनुष्यका अन्त:करण और स्वच्छ हो जाता है। मनकी व्याकुलताका होकर उसमें सदैव प्रसन्नता बनी रहती है; विक्षेप- होकर आ जाती है और सब इन्द्रियाँ मनके वशमें हो जाती हैं, अत: उसमें आत्मदर्शनकी आ जाती है। इस प्रकार इसके ऊपरवाले तो बाह्य शौचका फल बतलाया गया है और इसमें भीतरकी फल बतलाया गया है
संतोषसे अर्थात् चाहरहित होनेपर जो अनन्त मिलता है, उसकी बराबरी दूसरा कोई नहीं कर सकता। वह ही सर्वोत्तम है
स्वधर्म-पालनके लिये व्रत-उपवास आदि करने या अन्य सब प्रकारके कष्ट सहन करनेका नाम ‘तप’ है (योग० 2। 1 की टीका)। इसके और इन्द्रियोंके मलका हो जाता है, तब स्वस्थ, स्वच्छ और हलका हो जाता है तथा तीसरे पैंतालीसवें और छियालीसवें बतलायी हुई काय-सम्पद्रूप -सम्बन्धी प्राप्त हो जाती हैं एवं , दूर और व्यवधानयुक्त स्थानमें स्थित विषयोंको देखना, सुनना आदि इन्द्रिय-सम्बन्धी भी प्राप्त हो जाती है
शास्त्राभ्यास, मन्त्रजप और अपने जीवनका अध्ययनरूप स्वाध्यायके प्रभावसे जिस इष्टदेवका करना चाहता है, उसीका हो जाता है
योगसाधनमें आनेवाले होकर शीघ्र ही निष्पन्न हो जाती है (योग० 1। 23), क्योंकि निर्भर रहनेवाला तो केवल तत्परतासे करता रहता है, उसे चिन्ता नहीं रहती। उसके आनेवाले दूर करनेका और भार जिम्मे पड़ जाता है, अत: अनायास और शीघ्र पूर्ण होना स्वाभाविक ही है
यहाँतक यम और फलसहित किया गया; अब , उपाय और उसका फल बतलाते हैं—
हठयोगमें बहुत बतलाये गये हैं, परंतु यहाँ उनका नहीं करके बैठनेका तरीका इच्छापर ही छोड़ दिया है। यह है कि जो अपनी अनुसार जिस रीतिसे बिना हिले-डुले स्थिरभावसे सुखपूर्वक बिना किसी प्रकारकी पीड़ाके बहुत समयतक बैठ सके वही उसके लिये उपयुक्त है। इसके सिवा, जिसपर बैठकर किया जाता है, उसका नाम भी है; अत: वह भी स्थिर और सुखपूर्वक बैठनेलायक होना चाहिये14
सीधा और स्थिर करके सुखपूर्वक बैठ जानेके बाद -सम्बन्धी सब प्रकारकी चेष्टाओंका त्याग कर देना ही प्रयत्नकी शिथिलता है, इससे और परमात्मामें मन लगानेसे—इन दो उपायोंसे होती है। यहाँ बहुत-से टीकाकारोंने अनन्तका अर्थ शेषनाग और समापत्तिका अर्थ किया है। भोजराजने अनन्तका अर्थ आकाशादि किया है और समापत्तिका अर्थ तद्रूप हो जाना किया है; किंतु अंगोंमें अन्तिम अंग है, उसीके लिये आदि अंगोंका है। बहिरंग भी बतलाया गया है। अत: किसी प्रकारकी भी स्थिरताका उपाय बतलाना युक्तिसंगत नहीं होता। सज्जन विद्वान् अनुभवी महानुभाव इसपर करें
- हो जानेसे सर्दी, गर्मी आदि द्वन्द्वोंका प्रभाव नहीं पड़ता, उन सबको बिना किसी प्रकारकी पीड़ाके सहन करनेकी आ जाती है। अत: वे द्वन्द्व चंचल बनाकर नहीं डाल सकते
अब सामान्य बतलाते हैं—
प्रविष्ट होना श्वास है और बाहर निकलना प्रश्वास है। इन दोनोंकी रुक जाना अर्थात् गमनागमनरूप बंद हो जाना ही सामान्य है। यहाँ बाद सम्पन्न होना बतलाया है। इसमें यह प्रतीत होता है कि स्थिरताका किये बिना ही जो करते हैं, वे गलत रास्तेपर हैं। करते समय स्थिरता परम आवश्यक है
समझानेके लिये तीन प्रकारके करते हैं—
अगले जिस किये गये हैं उसे चौथा बतलाया है। इससे यह होता है कि इस तीन प्रकारके है और उन तीनों प्रकारके ही , और संख्याद्वारा देखता रहता है कि वे किस अवस्थातक पहुँच चुके हैं। इस प्रकार परीक्षा करते-करते वे जैसे-जैसे उन्नत होते जाते हैं वैसे-ही-वैसे उनमें लम्बाई और हलकापन बढ़ता चला जाता है। इससे यह होता है कि स्तम्भवृत्तिरूप तृतीय भी सम्बन्ध रहता है, अन्यथा वह , और संख्याद्वारा परिदृष्ट कैसे होगा? तीन इस प्रकार समझना चाहिये। (1) बाह्यवृत्ति— बाहर निकालकर बाहर ही जितने कालतक सुखपूर्वक रुक सके, रोके रहना और साथ-ही-साथ इस बातकी भी परीक्षा करते रहना कि वह बाहर आकर कहाँ ठहरा है, कितने समयतक ठहरा है और उतने समयमें स्वाभाविक कितनी संख्या होती है। यह ‘बाह्यवृत्ति’ है, इसे ‘रेचक’ भी कहते हैं; क्योंकि इसमें रेचनपूर्वक रोका जाता है। करते-करते यह दीर्घ (लम्बा) अर्थात् बहुत कालतक रुके रहनेवाला और अर्थात् हलका अनायास साध्य हो जाता है। (2) आभ्यन्तरवृत्ति— भीतर ले जाकर भीतर ही जितने कालतक सुखपूर्वक रुक सके, रोके रहना और साथ-ही-साथ यह देखते रहना कि आभ्यन्तर कहाँतक जाकर रुकता है; वहाँ कितने कालतक सुखपूर्वक ठहरता है और उतने समयमें स्वाभाविक कितनी संख्या होती है। यह ‘आभ्यन्तर’ है; इसे ‘पूरक’ भी कहते हैं; क्योंकि इसमें अंदर ले जाकर रोका जाता है। अभ्यासबलसे यह भी दीर्घ और होता जाता है। (3) स्तम्भवृत्ति— भीतर जाने और बाहर निकलनेवाली जो स्वाभाविक है, उसे प्रयत्नपूर्वक बाहर या भीतर निकलने या ले जानेका न करके बाहर निकला हो या भीतर गया हो, जहाँ हो, वहीं उसकी स्तम्भित कर देना (रोक देना) और यह देखते रहना कि किस रुके हैं, कितने समयतक सुखपूर्वक रुके रहते हैं, इस समयमें स्वाभाविक कितनी संख्या होती है, यह ‘स्तम्भवृत्ति’ है; इसे ‘कुम्भक’ भी कहते हैं। अभ्यासबलसे यह भी दीर्घ और होता है। कोई-कोई टीकाकार इसे केवल ‘कुम्भक’ कहते हैं और कोई-कोई चौथे केवल कहते हैं। इस तीसरे और अगले बतलाये हुए चौथे निर्णय करनेमें बहुत मतभेद है। किसी भी करें, उसके साथ मन्त्र अवश्य रहना चाहिये
चौथे करते हैं—
बाहर और भीतरके विषयोंके चिन्तनका त्याग कर देनेसे अर्थात् इस समय बाहर निकल रहे हैं या भीतर जा रहे हैं अथवा चल रहे हैं कि ठहरे हुए हैं, इस जानकारीका त्याग करके मनको इष्टचिन्तनमें लगा देनेसे , और संख्याके बिना ही अपने-आप जो जिस-किसी रुक जाती है; वह चौथा है। यह पहले बतलाये हुए तीन प्रकारके सर्वथा भिन्न है, यह बात दिखलानेके लिये ‘चतुर्थ:’ पदका प्रयोग किया गया है। यह अनायास होनेवाला राजयोगका है। इसमें मनकी चंचलता होनेके अपने-आप रुकती है और पहले बतलाये हुए प्रयत्नद्वारा रोकनेका करते-करते होता है, यही इसकी विशेषता है
जैसे-जैसे मनुष्य करता है, वैसे-ही-वैसे उसके संचित - और अविद्यादि दुर्बल होते चले जाते हैं। ये , और अविद्यादि ही आवरण (परदा) है। इस परदेके ही मनुष्यका ढका रहता है, अत: वह मोहित हुआ रहता है। जब यह परदा दुर्बल होते-होते सर्वथा क्षीण हो जाता है, तब सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो जाता है (गीता 5। 16)। इसलिये अवश्य करना चाहिये
दूसरा फल बतलाते हैं—
मनमें भी आ जाती है, यानी उसे चाहे जिस जगह अनायास ही स्थिर किया जा सकता है
अब बतलाते हैं—
प्रकारसे करते-करते मन और इन्द्रियाँ हो जाते हैं, उसके बाद इन्द्रियोंकी बाह्यवृत्तिको सब ओरसे समेटकर मनमें करनेके नाम ‘प्रत्याहार’ है। जब साधनकालमें इन्द्रियोंके विषयोंका त्याग करके अपने लगाता है, उस समय जो इन्द्रियोंका विषयोंकी ओर न जाकर -सा हो जाना है, यह होनेकी पहचान है। यदि उस समय भी इन्द्रियाँ पहलेके इसके सामने बाह्य विषयोंका चित्र उपस्थित करती रहें तो समझना चाहिये कि नहीं हुआ। उपनिषदोंमें भी ‘वाक्’ शब्दसे उपलक्षित इन्द्रियोंको मनमें निरुद्ध करनेकी बात कहकर यही दिखलाया है*
अब फल बतलाकर इस द्वितीय समाप्ति करते हैं—
हो जानेपर इन्द्रियाँ उसके सर्वथा वशमें हो जाती हैं, उनकी स्वतन्त्रताका सर्वथा हो जाता है। हो जानेके बाद इन्द्रिय- लिये अन्य आवश्यकता नहीं रहती