SANATANI
Maharshi Patanjali · Yoga · 195 verses
Pada 1
Samadhi Pada
इस साथ पदका प्रयोग करके योगशिक्षाकी अनादिता सूचित की है और अथ शब्दसे उसके आरम्भ करनेकी करके योगसाधनाकी कर्तव्यता सूचित की है
इस प्रकारके करके अब सामान्य लक्षण बतलाते हैं—
इस ग्रन्थमें प्रधानतासे ही ‘योग’ नामसे कहा गया है
शब्दकी परिभाषा करके अब उसका सर्वोपरि फल बतलाते हैं—
जब हो जाता है, उस समय ()-की अपने स्वरूपमें हो जाती है; अर्थात् वह - प्राप्त हो जाता है (योग० 4। 34)
क्या होनेके पहले अपने स्वरूपमें स्थित नहीं रहता?—इसपर कहते हैं—
जबतक - द्वारा नहीं हो जाता, तबतक अपने ही अनुरूप अपना स्वरूप समझता रहता है, उसे अपने स्वरूपका नहीं होता। अत: चित्तवृत्तिनिरोधरूप अवश्य कर्तव्य है
असंख्य होती हैं, अत: उनको पाँच श्रेणियोंमें बाँटकर उनका स्वरूप बतलाते हैं—
ये आगे किये जानेवाले लक्षणोंके अनुसार पाँच प्रकारकी होती हैं तथा हर प्रकारकी दो भेद होते हैं। एक तो यानी अविद्यादि पुष्ट करनेवाली और योगसाधनमें विघ्नरूप होती हैं तथा दूसरी अक्लिष्ट यानी क्षय करनेवाली और योगसाधनमें सहायक होती हैं। चाहिये कि इस रहस्यको भलीभाँति समझकर पहले अक्लिष्ट हटावे, फिर उन अक्लिष्ट भी करके सिद्ध करे
उक्त पाँच प्रकारकी लक्षणोंका करनेके लिये पहले उनके नाम बतलाते हैं—
इन पाँचोंके स्वरूपका स्वयं अगले किया है, अत: यहाँ उनकी नहीं की गयी है
उपर्युक्त पाँच प्रकारकी वृत्तियोंमेंसे प्रमाणवृत्तिके भेद बतलाये जाते हैं—
प्रमाणवृत्ति तीन प्रकारकी होती है; उसको इस प्रकार समझना चाहिये— (1) -—, मन और इन्द्रियोंके जाननेमें आनेवाले जितने भी हैं, उनका अन्त:करण और इन्द्रियोंके साथ बिना किसी व्यवधानके सम्बन्ध होनेसे जो भ्रान्ति तथा संशयरहित होता है, वह होनेवाली प्रमाणवृत्ति है। जिन संसारके क्षणभंगुरताका होकर या सब प्रकारसे उनमें दु:खकी प्रतीति होकर (योग० 2। 15) मनुष्यका हो जाता है, जो रोकनेमें सहायक हैं, जिनसे मनुष्यकी योगसाधनमें और बढ़ते हैं, उनसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति तो अक्लिष्ट है तथा जिन मनुष्यको नित्य और सुखरूप होते हैं, आसक्ति हो जाती है, जो विरोधी भावोंको बढ़ानेवाले हैं, उनसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति है। (2) -—किसी सहारे युक्तियोंद्वारा जो अप्रत्यक्ष स्वरूपका होता है, वह होनेवाली प्रमाणवृत्ति है। जैसे धूमको देखकर अग्निकी विद्यमानताका होना, नदीमें बाढ़ आया देखकर दूर-देशमें वृष्टि होनेका होना—इत्यादि। इनमें भी जिन मनुष्यको संसारके अनित्यता, दु:खरूपता आदि दोषोंका होकर उनमें होता है और बढ़ती है, जो आत्मज्ञानमें सहायक हैं, वे सब तो अक्लिष्ट हैं और उनके विपरीत हैं। (3) -—, और आप्त (यथार्थ वक्ता) वचनको ‘आगम’ कहते हैं। जो मनुष्यके अन्त:करण और इन्द्रियोंके नहीं है एवं जहाँ भी पहुँच नहीं है, उसके स्वरूपका , और महापुरुषोंके वचनोंसे होता है, वह होनेवाली प्रमाणवृत्ति है। जिस - मनुष्यका होता है (गीता 5। 22) और योगसाधनोंमें - बढ़ते हैं, वह तो अक्लिष्ट है और जिस - और - अरुचि हो, जैसे स्वर्गलोकके बड़ाई सुनकर उनमें और उनके साधनरूप सकाम कर्मोंमें आसक्ति और होती है, वह है
प्रमाणवृत्तिके भेद बतलाकर अब विपर्ययवृत्तिके लक्षण बतलाते हैं—
किसी भी वस्तुके असली स्वरूपको न समझकर उसे दूसरी ही वस्तु समझ लेना—यह विपरीत ही विपर्ययवृत्ति है—जैसे सीपमें चाँदीकी प्रतीति। यह भी यदि उत्पन्न करनेवाली और योगमार्गमें - बढ़ानेवाली हो तो अक्लिष्ट है, अन्यथा है। जिन इन्द्रिय आदिके द्वारा वस्तुओंका यथार्थ होता है, उन्हींसे विपरीत भी होता है। यह मिथ्या भी कभी-कभी करनेवाला हो जाता है। जैसे भोग्य क्षणभंगुरताको देखकर, करके या सुनकर उनको सर्वथा मिथ्या मान लेना -सिद्धान्तके अनुसार विपरीतवृत्ति है; क्योंकि वे परिवर्तनशील होनेपर भी मिथ्या नहीं हैं तथापि यह मान्यता भोगीमें उत्पन्न करनेवाली होनेसे अक्लिष्ट है। कुछ महानुभावोंके मतानुसार विपर्ययवृत्ति और —दोनों एक ही हैं, परंतु यह युक्तिसंगत नहीं मालूम होता; क्योंकि तो केवल असम्प्रज्ञातयोगसे ही होता है (योग० 4। 29-30) जहाँ प्रमाणवृत्ति भी नहीं रहती। किंतु विपर्ययवृत्तिका तो प्रमाणवृत्तिसे ही हो जाता है। इसके सिवा मतानुसार है, किंतु नहीं मानी गयी है; क्योंकि वह और दृश्यके स्वरूपकी उपलब्धिमें हेतुभूत संयोगकी भी है (योग० 2। 23-24) तथा और आदि भी है (योग० 2। 4), इसके अतिरिक्त प्रमाणवृत्तिमें विपर्ययवृत्ति नहीं है, परंतु -द्वेषादि वहाँ भी सद्भाव है, इसलिये भी विपर्ययवृत्ति और एकता नहीं हो सकती; क्योंकि विपर्ययवृत्ति तो कभी होती है और कभी नहीं होती, किंतु तो - प्राप्तितक निरन्तर विद्यमान रहती है। उसका होनेपर तो सभी धर्मी स्वयं भी अपने विलीन हो जाता है (योग० 4। 32)। परंतु प्रमाणवृत्तिके समय विपर्ययवृत्तिका हो जानेपर भी न तो - होता है तथा न और दृश्यके संयोगका ही। इसके सिवा प्रमाणवृत्ति भी होती है; परंतु जिस यथार्थ होता है, वह नहीं होता। अत: यही मानना ठीक है कि धर्मरूप विपर्ययवृत्ति अन्य है तथा और संयोगकी कारणरूपा उससे सर्वथा भिन्न है
अब विकल्पवृत्तिके लक्षण बतलाये जाते हैं—
केवल शब्दके आधारपर बिना हुए कल्पना करनेवाली जो है, वह विकल्पवृत्ति है। यह भी यदि वृद्धिमें , योगसाधनोंमें और बढ़ानेवाली तथा आत्मज्ञानमें सहायक हो तो अक्लिष्ट है, अन्यथा है। -प्रमाणजनित होनेवाले विशुद्ध संकल्पोंके सिवा सुनी-सुनायी बातोंके आधारपर मनुष्य जो नाना प्रकारके व्यर्थ संकल्प करता रहता है, उन सबको विकल्पवृत्तिके ही अन्तर्गत समझना चाहिये। विपर्ययवृत्तिमें तो विद्यमान वस्तुके स्वरूपका विपरीत होता है और विकल्पवृत्तिमें अविद्यमान वस्तुकी शब्दज्ञानके आधारपर कल्पना होती है, यही और भेद है। जैसे कोई मनुष्य सुनी-सुनायी बातोंके आधारपर अपनी मान्यताके अनुसार भगवान्के रूपकी कल्पना करके भगवान्का करता है, पर जिस स्वरूपका वह करता है उसे न तो उसने देखा है, न -शास्त्रसम्मत है और न वैसा कोई भगवान्का स्वरूप वास्तवमें है ही, केवल कल्पनामात्र ही है। यह विकल्पवृत्ति मनुष्यको भगवान्के चिन्तनमें लगानेवाली होनेसे अक्लिष्ट है; दूसरी जो प्रवृत्त करनेवाली विकल्पवृत्तियाँ हैं, वे हैं। इसी प्रकार सभी और अक्लिष्टका भेद समझ लेना चाहिये
अब निद्रावृत्तिके लक्षण बतलाये जाते हैं।
जिस समय मनुष्यको किसी भी नहीं रहता; केवलमात्र ही प्रतीति रहती है, वह जिस आश्रित रहता है, वह निद्रावृत्ति है1। भी वृत्तिविशेष है, तभी तो मनुष्य गाढ़ उठकर कहता है कि मुझे आज ऐसी गाढ़ आयी जिसमें किसी बातकी कोई खबर नहीं रही। इस स्मृतिवृत्तिसे ही यह सिद्ध होता है कि भी एक है, नहीं तो जगनेपर उसकी कैसे होती। भी और अक्लिष्ट दो प्रकारकी होती है। जिस जगनेपर मन और इन्द्रियोंमें सात्त्विकभाव भर जाता है, आलस्यका नाम-निशान नहीं रहता तथा जो योगसाधनमें उपयोगी और आवश्यक मानी गयी है। (गीता 6। 17)2, वह अक्लिष्ट है, दूसरे प्रकारकी उस परिश्रमके बोध कराकर विश्रामजनित सुखमें आसक्ति उत्पन्न करनेवाली होनेसे है
अब स्मृत्तिवृत्तिके लक्षण बतलाये जाते हैं—
उपर्युक्त , , और —इन चार प्रकारकी वृत्तियोंद्वारा आये हुए विषयोंके जो पड़े हैं, उनका पुन: किसी निमित्तको पाकर स्फुरित हो जाना ही है। उपर्युक्त चार प्रकारकी सिवा इस स्मृतिवृत्तिसे जो पड़ते हैं उनमें भी पुन: स्मृतिवृत्ति उत्पन्न होती है। स्मृतिवृत्ति भी और अक्लिष्ट दोनों ही प्रकारकी होती है। जिस मनुष्यका होता है तथा जो योगसाधनोंमें और बढ़ानेवाला एवं आत्मज्ञानमें सहायक है, वह तो अक्लिष्ट है और जिससे - बढ़ता है, वह है। कोई-कोई स्मृतिवृत्ति मानते हैं, परंतु जाग्रत्की भाँति सभी देखा जाता है; अत: उसका किसी एक अन्तर्भाव मानना उचित प्रतीत नहीं होता
यहाँतक कर्तव्यता, लक्षण और लक्षण बतलाये गये; अब उन उपाय बतलाते हैं—
सर्वथा करनेके लिये और —ये दो उपाय हैं। प्रवाह परम्परागत बलसे ओर चल रहा है। उस प्रवाहको रोकनेका उपाय है और उसे कल्याणमार्गमें ले जानेका उपाय है3
उक्त दोनों उपायोंमेंसे पहले लक्षण बतलाते हैं—
जो स्वभावसे ही चंचल है ऐसे मनको किसी एक स्थिर करनेके लिये बारम्बार चेष्टा करते रहनेका नाम ‘अभ्यास’ है। इसके प्रकार बहुत बतलाये गये हैं; इसी पादके 32 वें 39 वेंतक कुछ भेदोंका है; उनमेंसे जिस लिये जो सुगम हो, जिसमें उसकी स्वाभाविक रुचि और हो उसके लिये वही ठीक है
अब दृढ़ होनेका प्रकार बतलाते हैं—
अपने दृढ़ बनानेके लिये चाहिये कि कभी उकतावे नहीं। यह दृढ़ विश्वास रखे कि किया हुआ कभी भी व्यर्थ नहीं हो सकता, बलसे मनुष्य नि:संदेह अपने लक्ष्यकी प्राप्ति कर लेता है। यह समझकर लिये कालकी अवधि न रखे, आजीवन करता रहे, साथ ही यह भी रखे कि व्यवधान (अन्तर) न पड़ने पावे, निरन्तर (लगातार) चलता रहे तथा तुच्छ न करे, उसकी अवहेलना न करे, बल्कि ही अपने जीवनका आधार बनाकर अत्यन्त आदर और प्रेमपूर्वक उसे सांगोपांग करता रहे। इस प्रकार किया हुआ दृढ़ होता है4
अब लक्षण आरम्भ करते हुए पहले अपर- लक्षण बतलाते हैं—
अन्त:करण और इन्द्रियोंके द्वारा आनेवाले इस लोकके समस्त समाहार यहाँ ‘दृष्ट’ शब्दमें किया गया है और जो उपलब्ध नहीं हैं, जिनकी बड़ाई , और करनेवाले सुनी गयी है, ऐसे भोग्य विषयोंका समाहार ‘आनुश्रविक’ शब्दमें किया गया है। उपर्युक्त दोनों प्रकारके जब भलीभाँति तृष्णारहित हो जाता है, जब उसको प्राप्त करनेकी इच्छाका सर्वथा हो जाता है, ऐसे कामनारहित जो वशीकार नामक अवस्थाविशेष है, वह ‘अपर-वैराग्य’ है
अब पर- लक्षण बतलाते हैं—
पहले बतलाये हुए वशीकार-संज्ञारूप जब विषयकामनाका हो जाता है और उसके प्रवाह समानभावसे अपने एकाग्र हो जाता है (योग० 3। 12), उसके बाद होनेपर और पुरुषविषयक विवेकज्ञान प्रकट होता है (योग० 3। 35), उसके होनेसे जब तीनों गुणोंमें और उनके कार्यमें किसी प्रकारकी किंचिन्मात्र भी तृष्णा नहीं रहती; (योग० 4। 26), जब वह सर्वथा आप्तकाम निष्काम हो जाता है (योग० 2। 27), ऐसी सर्वथा रागरहित ‘पर-वैराग्य’ कहते हैं5
इस प्रकार - उपायोंका करके अब -निरोधरूप निर्बीज- स्वरूप बतलानेके लिये पहले उसके पूर्वकी सम्प्रज्ञातयोगके नामसे अवान्तर भेदोंके सहित करते हैं—
सम्प्रज्ञातयोगके तीन माने गये हैं—(1) (इन्द्रियोंके और ), (2) (इन्द्रियाँ और अन्त:करण) तथा (3) ग्रहीता ( साथ एकरूप हुआ ) (योग० 1। 41)। जब स्थूलरूपमें की जाती है, उस समय जबतक शब्द, अर्थ और वर्तमान रहता है, तबतक तो वह है और जब इनका नहीं रहता, तब वही कही जाती है। इसी प्रकार जब और सूक्ष्मरूपमें की जाती है उस समय जबतक शब्द, अर्थ और रहता है, तबतक वह और जब इनका नहीं रहता, तब वही कही जाती है। जब सम्बन्ध तो नहीं रहता, परंतु आनन्दका और अहंकारका सम्बन्ध रहता है, तबतक वह आनन्दानुगता है और जब उसमें आनन्दकी प्रतीति भी हो जाती है, तब वही केवल अस्मितानुगत समझी जाती है। यही निर्मलता है, इनका विस्तृत इसी पादके 41 वें 49 वेंतक किया गया है
अब उस अन्तिम स्वरूप बतलाते हैं, जिसके सिद्ध होनेपर अपने स्वरूपमें हो जाती है (योग० 1। 3); जो कि इस मुख्य प्रतिपाद्य है जिसे - भी कहते हैं—
जब पर- प्राप्ति हो जाती है, उस समय स्वभावसे ही संसारके ओर नहीं जाता। वह उनसे अपने-आप उपरत हो जाता है। उस उपरत- प्रतीतिका नाम ही यहाँ विराम-प्रत्यय है। इस उपरतिकी प्रतीतिका -क्रम भी जब बंद हो जाता है, उस समय सर्वथा हो जाता है (योग० 1। 51); केवलमात्र अन्तिम उपरत- युक्त रहता है (योग० 3। 9-10)। फिर - क्रमकी समाप्ति होनेसे वह भी अपने लीन हो जाता है (योग० 4। 32—34) अत: संयोगका हो जानेपर अपने स्वरूपमें हो जाती है। इसीको असम्प्रज्ञातयोग, निर्बीजसमाधि (योग० 1। 51) और - (योग० 2। 25; 3। 55; 4। 34) आदि नामोंसे कहा गया है
यहाँतक और उसके संक्षेपमें किया गया, अब किस प्रकारके उपर्युक्त शीघ्र-से-शीघ्र सिद्ध होता है, यह समझानेके लिये प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
जो पूर्वजन्ममें करते-करते -अवस्थातक पहुँच चुके थे; अर्थात् बन्धनसे छूटकर बाहर स्थिर होनेका जिनका दृढ़ हो चुका था, जो ‘महाविदेह’ प्राप्त कर चुके थे (योग० 3। 43), एवं जो करते-करते ‘प्रकृतिलय’ (योग० 1। 45; 3। 48) तककी प्राप्त कर चुके थे, किंतु -पदकी प्राप्ति होनेके पहले जिनकी मृत्यु हो गयी, उन दोनों प्रकारके योगियोंका जब पुनर्जन्म होता है, जब वे योगभ्रष्ट पुन: योगिकुलमें जन्म करते हैं; तब उनको पूर्वजन्मके योगाभ्यास-विषयक प्रभावसे अपनी तत्काल हो जाता है (गीता 6। 42-43) और वे परम्पराके बिना ही निर्बीजसमाधि- प्राप्त कर लेते हैं। उनकी निर्बीजसमाधि उपायजन्य नहीं है, अत: उसका नाम ‘भवप्रत्यय’ है अर्थात् वह ऐसी है कि जिसके सिद्ध होनेमें पुन: मनुष्यजन्म प्राप्त होना ही है, साधनसमुदाय नहीं
दूसरे कैसे सिद्ध होता है? सो बतलाते हैं—
किसी भी प्रवृत्त होनेका और अविचलभावसे उसमें लगे रहनेका मूल (भक्तिपूर्वक विश्वास) ही है। कमीके ही उन्नतिमें विलम्ब होता है, अन्यथा कल्याणके विलम्बका कोई नहीं है। लिये किसी अप्राप्त और परिस्थितिकी आवश्यकता नहीं है। इसीलिये पहला स्थान दिया है। साथ वीर्य अर्थात् मन, इन्द्रिय और सामर्थ्य भी परम आवश्यक है; क्योंकि इसीसे बढ़ता है। और वीर्य—इन दोनोंका संयोग मिलनेपर स्मरणशक्ति बलवती हो जाती है तथा उसमें योगसाधनके ही बारम्बार प्राकट्य होता रहता है; अत: उसका मन विषयोंसे होकर हो जाता है। इसीको कहते हैं (योग० 1। 46; 3। 3)। इससे अन्त:करण स्वच्छ हो जानेपर ‘ऋतम्भरा’— धारण करनेवाली हो जाती है (योग० 1। 48)। इस ही नाम समाधिप्रज्ञा है। अतएव पर- प्राप्तिपूर्वक निर्बीजसमाधिरूप सिद्ध हो जाता है। भी कहा है— ‘श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।’ ‘ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥’ (4। 39) जितेन्द्रिय साधनपरायण और श्रद्धावान् मनुष्य प्राप्त होकर वह बिना विलम्बके—तत्काल ही परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है
अब - अधिकताके शीघ्र और अति शीघ्र होनेकी बात कहते हैं—
जिन ( और ) तेजीसे चलता है, जो सब प्रकारकी -बाधाओंको ठुकराकर अपने तत्परतासे लगे रहते हैं, उनका शीघ्र सिद्ध होता है
किंतु—
किसका किस दर्जेका है; इसपर भी - शीघ्रताका विभाग निर्भर करता है; क्योंकि क्रियात्मक और तीव्र होनेपर भी विवेक और भावकी न्यूनाधिकताके सिद्ध होनेके कालमें भेद होना स्वाभाविक है। जिस , विवेकशक्ति और भाव कुछ उन्नत हैं, उसका मध्यमात्रावाला है और जिस , विवेक और भाव अत्यन्त उन्नत हैं, उसका अधिमात्रावाला है। क्रियाकी अपेक्षा भावका अधिक महत्त्व है। और जो क्रियात्मक बाह्य स्वरूप है, वह तो ऊपरवाले ‘वेग’ के नामसे कहा गया है और उनका जो भावात्मक आभ्यन्तर स्वरूप है, वह उनकी मात्रा यानी दर्जा है। व्यवहारमें भी देखा जाता है कि एक ही कामके लिये समानरूपसे परिश्रम किया जानेपर भी जो उसकी अधिक विश्वास रखता है, जिस मनुष्यको उस कामके करनेकी अधिक है एवं जो उसे प्रेम और उत्साहपूर्वक बिना उकताये करता रहता है; वह दूसरोंकी अपेक्षा उसे शीघ्र पूरा कर लेता है। वही बात भी समझ लेनी चाहिये। प्राप्तिके लिये करनेवालोंमें जिसका , विवेकशक्ति और भाव आदिकी अधिकताके जितने ऊँचे दर्जेका है और जिसकी चालका क्रम जितना तेज है, उसीके अनुसार वह शीघ्र या अतिशीघ्र प्राप्ति कर सकेगा। यही बात समझानेके लिये उपर्युक्त दो रचना की है—ऐसा मालूम होता है। अत: चाहिये कि अपने सर्वथा निर्दोष बनानेकी चेष्टा रखे, उसमें किसी प्रकारकी शिथिलता न आने दे
अब पूर्वोक्त और अपेक्षा निर्बीज- सुगम उपाय बतलाया जाता है—
यानी नाम ‘ईश्वरप्रणिधान’ है (देखिये योग० 2। 1 की ); इससे भी निर्बीजसमाधि शीघ्र सिद्ध हो सकती है (योग० 2। 45), क्योंकि सर्वसमर्थ हैं, वे अपने शरणापन्न भक्तपर प्रसन्न होकर उसके भावानुसार सब कुछ प्रदान कर सकते हैं (गीता 4। 11)6
अब उक्त लक्षण बतलाते हैं—
, , , और —ये पाँच ‘क्लेश’ हैं; इनका विस्तृत दूसरे पादके तीसरे नवेंतक है। ‘कर्म’ चार प्रकारके हैं—पुण्य, पाप, पुण्य और पापमिश्रित तथा पुण्य-पापसे रहित (योग० 4। 7)। कर्मके फलका नाम ‘विपाक’ है (योग० 2। 13) और कर्मसंस्कारोंके समुदायका नाम ‘आशय’ है (योग० 2। 12)। समस्त इन चारोंसे सम्बन्ध है। यद्यपि मुक्त पीछे सम्बन्ध नहीं रहता तो भी पहले सम्बन्ध था ही; किंतु तो कभी भी इनसे न सम्बन्ध था, न है और न होनेवाला है; इस उन मुक्त भी विशेष है, यह बात प्रकट करनेके लिये ही ‘पुरुषविशेष:’ पदका प्रयोग किया है
विशेषताका पुन: प्रतिपादन करते हैं—
जिससे बढ़कर कोई दूसरी वस्तु हो, वह सातिशय है और जिससे बड़ा कोई न हो वह निरतिशय है। अवधि है, उसका सबसे बढ़कर है; उसके बढ़कर किसीका भी नहीं है; इसलिये उसे निरतिशय कहा गया है। जिस प्रकार पराकाष्ठा है, उसी प्रकार धर्म, , यश और ऐश्वर्य आदिकी पराकाष्ठाका आधार भी उसीको समझना चाहिये
और भी उसकी विशेषताका प्रतिपादन करते हैं—
सर्गके आदिमें उत्पन्न होनेके सबका गुरु ब्रह्माको माना जाता है, परंतु उसका कालसे अवच्छेद है (गीता 8। 17)। स्वयं और अन्य सबका आदि है (गीता 10। 2-3); वह कालकी सीमासे सर्वथा अतीत है, वहाँतक कालकी पहुँच नहीं है; क्योंकि वह कालका भी महाकाल है। इसलिये वह सम्पूर्ण पूर्वजोंका भी गुरु यानी सबसे बड़ा, सबसे पुराना और सबको शिक्षा देनेवाला है (श्वेता० 3। 4; 6। 18)
प्रकार बतलानेके लिये उसके नामका करते हैं—
नाम और नामीका सम्बन्ध और बड़ा ही घनिष्ठ है। इसी नाम-जपकी बड़ी महिमा है (तुलसी०, बाल० दोहा 18 से 27), भी जपयज्ञको सब यज्ञोंमें श्रेष्ठ बतलाया गया है (10। 25), ‘ॐ’ उस परमेश्वरका वेदोक्त नाम होनेसे मुख्य है (गीता 17। 23; कठ० 1। 2। 15—17); इस यहाँ उसीका किया गया है। इसी श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि जितने भी नाम हैं, उनके जपका भी माहात्म्य समझ लेना चाहिये
नाम बतलाकर अब उसके प्रयोगकी विधि बतलाते हैं—
नामका जप और उसके स्वरूपका -चिन्तन करना चाहिये।7 इसीको पूर्वोक्त अर्थात् या कहते हैं। और भी बहुत-से प्रकार हैं, परंतु जप और सब मुख्य होनेके यहाँ केवल नाम और नामीके स्मरणरूप एक ही प्रकारका किया है। भी इसी तरह आया है (8। 13)। इसे उपलक्षण मानकर भगवद्भक्तिके सभी प्रसन्नताके नाते निर्बीजसमाधिकी समझना चाहिये अर्थात् सभी अंग-प्रत्यंगोंका अन्तर्भाव समझना चाहिये
अब नाम-जप और स्वरूपचिन्तनके फलका करते हैं—
अगले दो जिन विस्तारपूर्वक किया गया है, भजन- उनका अपने-आप हो जाता है और अन्तरात्माके () स्वरूपका होकर - भी उपलब्ध हो जाती है; अत: यह निर्बीजसमाधिकी प्राप्तिका बहुत ही सुगम उपाय है
पूर्वसूत्रमें जिन अन्तरायोंका होनेकी बात कही गयी है, उनके नाम बतलाये जाते हैं—
योगसाधनमें लगे हुए विक्षेप उत्पन्न करके उसको विचलित करनेवाले ये नौ योगमार्गके माने गये हैं। (1) , इन्द्रियसमुदाय और किसी प्रकारका रोग उत्पन्न हो जाना ‘व्याधि’ है। (2) अकर्मण्यता अर्थात् न होनेका स्वभाव ‘स्त्यान’ है। (3) अपनी शक्तिमें या फलमें संदेह हो जानेका नाम ‘संशय’ है। (4) योगसाधनोंके अनुष्ठानकी अवहेलना (बे-परवाही) करते रहना ‘प्रमाद’ है। (5) तमोगुणकी अधिकतासे और भारीपन हो जाना और उसके न होना ‘आलस्य’ है। (6) विषयोंके साथ इन्द्रियोंका संयोग होनेसे उनमें आसक्ति हो जानेके जो हो जाता है, उसे ‘अविरति’ कहते हैं। (7) किसी विपरीत समझना अर्थात् यह ठीक नहीं, ऐसा मिथ्या हो जाना ‘भ्रान्तिदर्शन’ है। (8) करनेपर भी भूमिकाओंका अर्थात् प्राप्त न होना—यह ‘अलब्धभूमिकत्व’ है; इससे कम हो जाता है। (9) योगसाधनसे किसी भूमिमें होनेपर भी उसका न ठहरना ‘अनवस्थितत्व’ है। इन नौ प्रकारके ही अन्तराय, और प्रतिपक्षी आदि नामोंसे कहा जाता है
इनके साथ-साथ होनेवाले दूसरे करते हैं—
उपर्युक्त साथ-साथ होनेवाले दूसरे पाँच इस प्रकार हैं— (1) दु:ख—, और आधिदैविक—इस तरह दु:खके प्रधानतया तीन भेद माने गये हैं। काम-क्रोधादिके व्याधि आदिके या इन्द्रियोंमें किसी प्रकारकी विकलता होनेके जो मन, इन्द्रिय या ताप या पीड़ा होती है, उसको ‘आध्यात्मिक दु:ख’ कहते हैं। मनुष्य, पशु, पक्षी, सिंह, व्याघ्र, मच्छर और अन्यान्य होनेवाली पीड़ाका नाम ‘आधिभौतिक दु:ख’ है तथा सर्दी, गर्मी, वर्षा, भूकम्प आदि दैवी घटनासे होनेवाली पीड़ाका नाम ‘आधिदैविक दु:ख’ है। (2) —इच्छाकी पूर्ति न होनेपर जो मनमें क्षोभ होता है, उसे ‘दौर्मनस्य’ कहते हैं। (3) अङ्गमेजयत्व— अंगोंमें कम्प होना, ‘अंग-मेजयत्व’ है। (4) श्वास—बिना इच्छाके बाहरकी वायुका भीतर प्रवेश कर जाना अर्थात् बाहरी हो जाना ‘श्वास’ है। (5) प्रश्वास—बिना इच्छाके ही भीतरकी वायुका बाहर निकल जाना अर्थात् भीतरी हो जाना ‘प्रश्वास’ है। ये पाँचों ही होते हैं, नहीं; इसलिये इनको ‘विक्षेपसहभू’ कहते हैं
उक्त दूर करनेका दूसरा उपाय बतलाते हैं—
उपर्युक्त दोनों प्रकारके -प्रणिधानसे तो होता ही है, उसके सिवा यह दूसरा उपाय बतलाया गया है। भाव यह कि किसी एक वस्तुमें स्थित करनेका बार-बार प्रयत्न करनेसे भी उत्पन्न होकर हो जाता है; अत: यह भी किया जा सकता है
अन्तरालमें -द्वेषादि मल रहनेके मलिन स्थिर नहीं होता, अत: बनानेका सुगम उपाय बतलाते हैं—
सुखी मनुष्योंमें करनेसे, दु:खी मनुष्योंमें करनेसे, प्रसन्नताकी करनेसे और पापियोंमें करनेसे , , , और आदि मलोंका होकर शुद्ध— हो जाता है। अत: इसका करना चाहिये
चित्तशुद्धिका दूसरा उपाय बतलाते हैं—
बारम्बार बाहर निकालनेका तथा यथाशक्ति बाहर रोके रखनेका करनेसे मनमें निर्मलता आती है, इससे नाडि़योंका भी मल नष्ट होता है
प्रसंगवश निर्मलताके उपाय बतलाकर, अब मनको स्थिर करनेवाला अन्य बतलाते हैं—
करते-करते विषयोंका हो जाता है, उन विषयोंका करनेवाली नाम विषयवती है (योग० 3। 36)। ऐसी उत्पन्न होनेसे योगमार्गमें विश्वास और बढ़ जाता है, इस यह आत्मचिन्तनके भी मनको स्थिर करनेमें बन जाती है
इसी प्रकारका और भी उपाय बतलाते हैं—
करते-करते यदि शोकरहित प्रकाशमय हो जाय तो वह भी मनको स्थिर करनेवाली होती है
अब स्थिरताका अन्य उपाय बतलाते हैं—
जिस - सर्वथा नष्ट हो चुके हैं, ऐसे बनाकर करनेवाला अर्थात् उसके भावका मनन करनेवाला भी स्थिर हो जाता है
और भी अन्य उपाय बतलाते हैं—
कोई अलौकिक हुआ हो, जैसे अपने इष्टदेवका आदि, तो उसको करके वैसा ही चिन्तन करनेसे मन स्थिर हो जाता है तथा गाढ़ केवल ही रहता है, किसी भी प्रतीति नहीं होती, उसी प्रकार समस्त बाध करके अवलम्बन करनेसे अर्थात् उसीको लक्ष्य बनाकर करनेसे भी अनायास ही स्थिर हो सकता है। जिस कालमें तमोगुणका होता है; उस समय ‘यह नहीं करना चाहिये।’ जिस समय और इन्द्रियोंमें सत्त्वगुण बढ़ा हुआ हो, उस समय यह अधिक लाभप्रद हो सकता है
मनुष्योंकी रुचि भिन्न-भिन्न होती है; अत: अब सर्वसाधारणके उपयोगी करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते हैं—
उपर्युक्त साधनोंमेंसे कोई किसी अनुकूल नहीं पड़ता हो तो उसे अपनी रुचिके अनुसार अपने करना चाहिये। अपनी रुचिके अनुसार अपने करनेसे मन स्थिर हो जाता है
स्थिरताके उपाय बतलाकर अब यह बतलाते हैं कि जब स्थिर होनेकी हो जाती है, तब उसकी कैसी होती है—
करते-करते जब भलीभाँति प्राप्त कर लेता है; उस समय अपने -से- लेकर बड़े-से-बड़े महान् पदार्थतक चाहे जहाँ, चाहे जब तत्काल स्थिर कर सकता है। उसका अपने पूर्ण अधिकार हो जाता है। स्थिर होनेकी हो जानेकी पहचान भी यही है (गीता 6। 19)
पहले बतलाये हुए उपायोंसे जब अपने अधिकार हो जाता है और अत्यन्त होकर उसमें आ जाती है, इसके बाद किस प्रकार क्रमसे सम्प्रज्ञात निर्बीजसमाधि सिद्ध होती है, उसका आरम्भ करते हैं—
पूर्वोक्त करते-करते जब स्वच्छ स्फटिकमणिकी भाँति अति हो जाता है, जब उसकी अतिरिक्त बाह्य शान्त हो जाती हैं, उस समय इन्द्रियोंके या विषयोंको (योग० 3। 44), या अन्त:करण और इन्द्रियोंको (योग० 3। 47) अथवा बुद्धिस्थ (योग० 3। 49)—जिस किसी भी लक्ष्य बनाकर उसमें अपने लगाता है तो वह उस वस्तुमें स्थित होकर हो जाता है। इसीको सम्प्रज्ञात कहते हैं, क्योंकि इस वस्तुके स्वरूपका भली प्रकार हो जाता है, उसके किसी प्रकारका या नहीं रहता है।8 अगले न तो आनन्दानुगत चर्चा की है, न या इन्द्रियानुगतकी और न या पुरुषानुगतकी, इस यद्यपि यह स्पष्ट नहीं होता, परंतु हद अलिंगपर्यन्त बतला दी, इससे मन, इन्द्रियाँ और उसीमें अन्तर्भाव माना जा सकता है। सम्भव है, इसीसे उन्होंने इन्द्रियानुगत और अस्मितानुगत भेदोंका अलग न किया हो; क्योंकि तीसरे पादके 44 वें, 47 वें और 49 वें जहाँ ग्राह्यविषयक, ग्रहणविषयक और ग्रहीतृविषयक संयमका फल बताया है, वहाँ सूक्ष्मरूपमें तन्मात्राओंको और सूक्ष्मरूपमें ले लिया है। आनन्द भी मनका होनेके इसको भी ग्राह्यविषयक ही अन्तर्गत माना जा सकता है।9 अत: यहाँ यह मानना उचित मालूम होता है कि आकाशादि पंच महाभूत और उनका कार्य तो है तथा तन्मात्रा और उनका कार्य है। इन्द्रियाँ और अन्त:-करण ग्रहणविषयक अन्तर्गत हैं, वे ग्राह्यविषयक तो नहीं आते; परन्तु हद अलिंगपर्यन्त बतला देनेसे ग्रहणविषयक भी विचारानुगत ही अन्तर्भाव हो जाता है। इसी प्रकार आनन्द नाम आह्लादका है। यह और संयोगसे उत्पन्न होनेवाला और मनके द्वारा है। अत: वह अन्तर्गत आ जानेके उसका - अन्तर्भाव है एवं यहाँ जो ग्रहीतृविषयक बतायी गयी है, वह भी तीसरे पादके पैंतीसवें अनुसार - संयोग-कालमें ही स्वरूपमें की जाती है। अत: वह अस्मितानुगत है, यह समझना चाहिये; क्योंकि उसका फल उसी बतलाया गया है
सामान्यरूपसे सम्प्रज्ञातसमाधिका स्वरूप बतला दिया, अब इसके भेदोंका करते हैं—
यानी मन और इन्द्रियोंद्वारा करनेमें आनेवाले दो प्रकारके होते हैं—(1) , (2) । इनमेंसे किसी एक लक्ष्य बनाकर उसके स्वरूपको जाननेके लिये जब अपने उसमें लगाता है, तब पहले-पहल होनेवाले उस वस्तुके नाम, रूप और मिश्रण रहता है। अर्थात् उसके स्वरूपके साथ-साथ उसके नाम और प्रतीतिकी भी स्फुरणा रहती है। अत: इस कहते हैं। इसीका दूसरा नाम भी है
इसके बाद—
पहले बतलायी हुई बाद जब वस्तुके नामकी हो जाती है और उसको करनेवाली भी नहीं रहता, तब अपने () स्वरूपका भी भान न रहनेके उसके स्वरूपके -सी हो जाती है, उस समय सब प्रकारके हो जानेके केवल साथ हुआ प्रकाशित करता है, उस नाम ‘निर्वितर्क’ है। इसमें शब्द और प्रतीतिका कोई नहीं रहता, अत: इसे ‘निर्विकल्प’ भी कहते हैं
इस प्रकार - होनेवाली सम्प्रज्ञात भेद बतलाकर अब होनेवाली सम्प्रज्ञात भेद बतलाते हैं—
जिस प्रकार - की जानेवाली दो भेद हैं, उसी प्रकार - सम्बन्ध रखनेवाली भी दो भेद समझ लेने चाहिये अर्थात् जब किसी - स्वरूपका यथार्थ स्वरूप जाननेके लिये उसमें स्थिर किया जाता है, तब पहले उसके नाम, रूप और मिला हुआ होता है, वह है और उसके बाद जब नामका और अर्थात् निज स्वरूपका भी विस्मरण होकर केवल ही होता है, वह है
अब किन-किनकी गणना है, यह स्पष्ट करते हैं—
पृथ्वीका गन्धतन्मात्रा, जलका रसतन्मात्रा, तेजका रूपतन्मात्रा, वायुका स्पर्शतन्मात्रा और आकाशका शब्दतन्मात्रा है एवं उन सबका और मनसहित इन्द्रियोंका अहंकार, अहंकारका महत्तत्त्व और महत्तत्त्वका यानी है। उससे आगे कोई नहीं है; वही सूक्ष्मताकी अवधि है। अत: प्रकृतिपर्यन्त किसी भी लक्ष्य बनाकर उसमें की हुई और अन्तर्गत समझ लेना चाहिये। यद्यपि भी है, पर वह दृश्य नहीं है, अत: तद्विषयक इसमें नहीं आनी चाहिये; तथापि ग्रहीतृविषयक प्रतिबिम्बित की जाती है (योग० 3। 35)। अत: उसको अन्तर्गत मान लेनेमें कोई आपत्ति मालूम नहीं होती; क्योंकि कठोपनिषद् (1। 3। 10) में जीवात्मासे ‘पर’ कहा गया है। इस प्रकार यहाँ सीमा प्रकृतिपर्यन्त बतला देनेके मन, इन्द्रियाँ तथा आनन्द और उसमें अन्तर्भाव प्रतीत होता है; फिर सत्रहवें कहे हुए आनन्द और और इकतालीसवें नामसे कहे हुए मन और इन्द्रियोंको और ग्रहीता नामसे कहे हुए प्रकृतिस्थ टीकाकारोंने ‘विचार’ शब्दवाच्य अलग कैसे कहा—और तद्विषयक भेदोंका क्यों नहीं किया, यह विचारणीय है
इकतालीसवें पैंतालीसवेंतक सम्प्रज्ञातसमाधिका भेद बतलाकर अब उन सब प्रकारकी सहेतुक दूसरा नाम बतलाते हैं—
और होनेपर भी निर्बीज नहीं हैं, ये सब-की-सब सबीज ही हैं; क्योंकि इनमें बीजरूपसे किसी-न-किसी करनेवाली अस्तित्व-सा रहता है। अत: सम्पूर्ण पूर्णतया न होनेके इन - लाभ नहीं होता
उक्त चार प्रकारकी समाधियोंमेंसे ही सबसे श्रेष्ठ है, यह प्रतिपादन करनेके लिये उसकी विशेष फलसहित करते हैं—
जब सर्वथा हो जाती है, उसकी - किसी प्रकारका किंचिन्मात्र भी दोष नहीं रहता (योग० 1। 40)। उस समय अत्यन्त स्वच्छ— हो जाती है (योग० 3। 5)
अत:—
उस वस्तुके (असली) स्वरूपको करनेवाली होती है; उसमें और लेश भी नहीं रहता
उक्त ऋतम्भरा विशेषताका करते हैं—
, और आप्त वचनोंसे वस्तुका सामान्य होता है, पूर्ण नहीं होता। इसी प्रकार भी साधारण ही होता है। बहुत-से तो पहुँच ही नहीं है। अत: - किसी वस्तुके स्वरूपका सुननेसे जो तद्विषयक होता है, वह श्रुतबुद्धि है; इसी प्रकार () जो वस्तुके स्वरूपका होता है, वह अनुमानबुद्धि है। ये दोनों प्रकारकी - वस्तुके स्वरूपको सामान्यरूपसे ही करती हैं, उसके अंग-प्रत्यंगोंसहित उसका पूर्ण इनसे नहीं होता; किंतु ऋतम्भरा वस्तुके स्वरूपका यथार्थ और पूर्ण (अंग-प्रत्यंगोंसहित) हो जाता है। अत: यह उन दोनों प्रकारकी भिन्न और अत्यन्त श्रेष्ठ है
इस ऋतम्भरा और भी महत्त्व बतलाते हैं—
मनुष्य जिस किसी भी वस्तुका करता है, जो कुछ भी क्रिया करता है, उन सबके अन्त:करणमें इकट्ठे हुए रहते हैं, इन्हींको कर्माशय (योग० 2। 12) के नामसे कहा है। ये ही मनुष्यको संसारचक्रमें भटकानेवाले मुख्य हैं (योग० 2। 13); इनके ही मनुष्य मुक्तिलाभ कर सकता है। अत: उक्त महत्त्व प्रकट करते हुए कहते हैं कि इस प्रकट होनेपर जब मनुष्यको यथार्थ रूपका भान हो जाता है; तब उसका और उसके कार्योंमें स्वभावसे ही हो जाता है। उस पूर्व इकट्ठे हुए सब प्रकारके -द्वेषमय कर डालते हैं (योग० 2। 26; 3। 49-50), इससे शीघ्र ही मुक्तावस्थाके समीप पहुँच जाता है
अब निर्बीज-समाधिरूप - करते हुए इस पादकी समाप्ति करते हैं—
जब ऋतम्भरा प्रज्ञाजनित प्रभावसे अन्य सब प्रकारके हो जाता है, उसके बाद उस ऋतम्भरा उत्पन्न भी आसक्ति न रहनेके उनका भी हो जाता है। उनका होते ही समस्त अपने-आप हो जाता है। अत: बीजका सर्वथा हो जानेसे इस नाम निर्बीजसमाधि है। इसीको - भी कहते हैं (योग० 3। 50)