SANATANI
Maharshi Patanjali · Yoga · 195 verses
Pada 3
Vibhuti Pada
नाभिचक्र, हृदय-कमल आदि भीतरी हैं और या सूर्य-चन्द्रमा आदि देवता या कोई भी मूर्ति तथा कोई भी बाहरके हैं, उनमेंसे किसी एक लगानेका नाम ‘धारणा’ है
स्वरूप बतलाते हैं—
जिस वस्तुमें लगाया जाय, उसीमें एकाग्र हो जाना अर्थात् केवल ध्येयमात्रकी एक ही तरहकी प्रवाह चलना, उसके बीचमें किसी भी दूसरी न उठना ‘ध्यान’ है
स्वरूप बतलाते हैं—
करते-करते जब ध्येयाकारमें हो जाता है, उसके अपने स्वरूपका -सा हो जाता है, उसको भिन्न उपलब्धि नहीं होती, उस समय उस ही नाम ‘समाधि’ हो जाता है। यह समापत्तिके नामसे पहले किया गया है (योग० 1। 43)
तीनों सांकेतिक नाम बतलाते हैं—
किसी एक , और —ये तीनों होनेसे ‘संयम’ कहलाता है। अत: इस ग्रन्थमें जहाँ-तहाँ किसी करनेको कहा जाय या फल बतलाया जाय तो नामसे किसी एक तीनोंका होना समझ लेना चाहिये
फल बतलाते हैं—
करते-करते जब प्राप्त कर लेता है, अर्थात् ऐसी प्राप्त कर लेता है कि जिस वह करना चाहे, उसीमें तत्काल हो जाता है, उस समय प्राप्त हो जाता है अर्थात् उसकी अलौकिक ज्ञानशक्ति आ जाती है। इसीको प्रथम अध्यात्मप्रसादके और ऋतम्भरा नामसे कहा है (योग० 1। 47-48)
प्रयोगकी विधिका करते हैं—
प्रयोग करना चाहिये अर्थात् पहले करना चाहिये। वह स्थिर हो जानेपर विषयोंमें करना चाहिये। इसी प्रकार जिस-जिस स्थलमें स्थिर होता जाय, उस-उससे आगे बढ़ते रहना चाहिये
तीनों विशेषता बतलाते हैं—
इसके पहले अर्थात् दूसरे जो यम, , , और —ये पाँच अंग बतलाये गये हैं, उनकी अपेक्षा उपर्युक्त , और —ये तीनों अन्तरंग हैं; क्योंकि इन तीनोंका - साथ निकटतम सम्बन्ध है
निर्बीज- विशेषताका करते हैं—
पर- दृढ़तासे जब समाधिप्रज्ञाके भी हो जाता है, तब निर्बीज- होती है (योग० 1। 51)। अत: , और भी उसके अन्तरंग नहीं हो सकते; क्योंकि उसमें सब प्रकारकी किया जाता है (योग० 1। 18); किसी भी स्थिर करनेका नहीं किया जाता
चंचल है, उनमें होता रहता है। ही है, अत: वह भी कभी एक नहीं रह सकता। अत: - समय उसका कैसा होता है, यह बतलानेके लिये कहते हैं—
- सम्पूर्ण हो जानेपर भी उनके नहीं होता। उस केवल ही शेष रहते हैं, यह बात पहले कही है (योग० 1। 18)। अत: निरोधकालमें व्युत्थान और दोनों ही प्रकारके व्याप्त रहता है, क्योंकि है और उसके हैं; अपने सदैव व्याप्त रहता है यह है (योग० 3। 14)। उस निरोधकालमें जो व्युत्थानके दब जाना और - प्रकट हो जाना है तथा - सम्बन्धित हो जाना है, यह व्युत्थानधर्मसे निरोधधर्ममें होनारूप - है15। - अपेक्षा - भी व्युत्थान- ही है (योग० 3। 8)। अत: उसके यहाँ व्युत्थान- ही अन्तर्गत समझना चाहिये
इसके बाद क्या होता है, सो बतलाते हैं—
‘पहले कथनानुसार जब व्युत्थानके सर्वथा दब जाते हैं और बढ़कर भरपूर हो जाते हैं, उस समय उस संस्कारमात्र शेष - अधिकतासे केवल -संस्कारधारा चलती रहती है अर्थात् केवल - ही प्रवाह चलता रहता है। यह निरुद्ध - है
अब - जैसा होता है, उसका करते हैं—
- पहले जब होता है, उस समय विक्षिप्तावस्थाका होकर एकाग्र- उदय हो जाता है। और - केवल ध्येयमात्रका ही रहता है, निज स्वरूपतकका भान नहीं रहता (योग० 1। 43); वह विक्षिप्तावस्थासे एकाग्र- हो जानारूप - है
उसके बादकी करते हैं।
जब - एकाग्र- प्रवेश करता है, उस समय जो होता है उसका नाम - है। जब भलीभाँति हो चुकता है, उसके बाद जो होता रहता है, उसे - कहते हैं। उसमें होनेवाली और उदय होनेवाली एक-सी ही होती है। पहले कहे हुए - तो होनेवाली और उदय होनेवाली होता है, किन्तु इसमें होनेवाली और उदय होनेवाली नहीं होता, यही - और - अन्तर है। - प्रथम - होता है और उसकी - - होता है। इस - समय होनेवाली ही पहले - निर्मलताके नामसे कहा है (योग० 1। 47)
उपर्युक्त नाम बतलाते हुए उनके उदाहरणसे अन्य समस्त वस्तुओंमें होनेवाले करते हैं—
पहले नवें और दसवें तो - समय होनेवाले -, - और - किया गया है तथा ग्यारहवें और बारहवें - समय होनेवाले -, - और - किया गया है। इसी तरह संसारकी समस्त वस्तुओंमें ये बराबर होते रहते हैं; क्योंकि तीनों ही परिणामी हैं, अत: उनके कार्योंमें होते रहना अनिवार्य है। इसलिये इस यह बात कही गयी है कि ऊपरके ही पाँचों और समस्त इन्द्रियोंमें होनेवाले , और - समझ लेना चाहिये। इनका उदाहरणसहित समझाया जाता है। यह रखना चाहिये कि सांख्य और सिद्धान्तमें कोई भी बिना हुए उत्पन्न नहीं होता। जो कुछ वस्तु उत्पन्न होती है, वह उत्पन्न होनेसे पहले भी अपने थी और होनेके बाद भी है (योग० 4। 12)। (1) -—जब किसी एक लय होकर दूसरे उदय होता है, उसे ‘धर्म-परिणाम’ कहते हैं। जैसे नवें चित्तरूप व्युत्थान-संस्काररूप दब जाना और -संस्काररूप प्रकट होना बतलाया गया है। यही रहनेवाले चित्तरूप - है। इसी प्रकार ग्यारहवें जो सर्वार्थतारूप और एकाग्रतारूप उदय बतलाया गया है, यह भी चित्तरूप - है। इसी तरह मिट्टीमें पिण्डरूप और घटरूप उदय होना, फिर घटरूप और ठीकरी (फूटे हुए घटके टुकड़े)- उदय होना—सब प्रकारके रहनेवाले मिट्टीरूप - है। इसी तरह अन्य समस्त वस्तुओंमें भी समझ लेना चाहिये। (2) -—यह भी - साथ-साथ हो जाता है। यह - होता है (योग० 4। 12)। हो जाना उसका - है, प्रकट होना उसका - है और प्रकट होनेसे पहले वह लक्षणवाला रहता है। इन तीनोंको ‘लक्षण-परिणाम’ कहते हैं। ग्यारहवें जो सर्वार्थता- होना बतलाया गया है, वह उसका - है और जो एकाग्रतारूप उदय होना बतलाया है, वह उसका - है। उदय होनेसे पहले वह - था। इसी प्रकार दूसरी वस्तुओंके भी समझ लेना चाहिये। (3) -—जो लक्षणयुक्त नयापनसे पुरानापन आता-जाता है, वह परिवर्तित होता रहता है और छोड़कर चला जाता है, यह ‘अवस्था-परिणाम’ है। एकादश वर्णनानुसार जब चित्तरूप लक्षणवाला सर्वार्थतारूप दबकर प्राप्त होता है, उस जो उसके दबनेका है वह उसका - है और जो एकाग्रतारूप आता है तब उसका जो उदय होनेका है, वह भी - है। दसवें निरुद्ध - और बारहवेंमें एकाग्रचित्तके - है। इस प्रकार यह एक छोड़कर दूसरी होते जाना ही - है। यह - होता रहता है। कोई भी त्रिगुणमय वस्तु क्षणभर भी एक नहीं रहती। यही बात दसवें और बारहवें निरोधधर्मके और एकाग्रधर्मके - एक प्रकारके और और उदय बतलाकर दिखलायी गयी है। हम बालकसे जवान और जवानसे बूढ़े किसी एक दिनमें या एक घड़ीमें नहीं हुए, हमारा यह - अर्थात् होता हुआ ही यहाँतक पहुँचा है। इसीको - कहते हैं। यह विचारद्वारा समझमें आता है, सहसा प्रतीत नहीं होता। आगे कहेंगे भी कि अवसानमें होता है (योग० 4। 33)। - तो होता है, - पहले हो जाना और नये हो जाना—इस प्रकार बदलता है और - युक्त रहते हुए ही उसकी बदलती रहती है। पहले अपेक्षा दूसरा है और दूसरेकी अपेक्षा तीसरा है
और विवेचन करनेके लिये स्वरूप बतलाते हैं—
द्रव्यमें सदा रहनेवाली अनेकों नाम है और उसके आधारभूत द्रव्यका नाम है। यह है कि जिस कारणरूप जो कुछ बन चुका है, जो बना हुआ है और जो बन सकता है; वे सब उसके हैं, वे एक अनेक रहते हैं तथा अपने-अपने मिलनेपर प्रकट और होते रहते हैं। उनके तीन इस प्रकार हैं— (1) अव्यपदेश्य—जो शक्तिरूपसे रहते हैं, व्यवहारमें आने लायक न होनेके जिनका निर्देश नहीं किया जा सकता, वे ‘अव्यपदेश्य’ कहलाते हैं। इन्हींको या आनेवाले भी कहते हैं। जैसे जलमें बर्फ और मिट्टीमें बर्तन अपना व्यापार करनेके लिये प्रकट होनेसे पहले शक्तिरूपमें छिपे रहते हैं। (2) उदित—जो पहले शक्तिरूपसे छिपे हुए थे, वे जब अपना करनेके लिये प्रकट हो जाते हैं, तब ‘उदित’ कहलाते हैं। इन्हींको ‘वर्तमान’ भी कहते हैं। जैसे जलमें शक्तिरूपसे बर्फका प्रकट होकर वर्तमानरूपमें आ जाना, मिट्टीमें शक्तिरूपसे बर्तनोंका प्रकट होकर वर्तमानरूपमें आ जाना। (3) जो अपना व्यापार पूरा करके हो जाते हैं, वे ‘शान्त’ कहलाते हैं, इन्हींको ‘अतीत’ भी कहते हैं। जैसे बर्फका गलकर जलमें हो जाना और घड़ेका फूटकर मिट्टीमें हो जाना। , उदित और अव्यपदेश्य—इन तीनों ही सदा ही अनुगत रहता है। किसी बिना नहीं रहते
एक ही भिन्न-भिन्न अनेक - कैसे होते हैं, यह बतलाते हैं—
एक ही द्रव्यका किसी एक जो होता है, दूसरे उससे भिन्न दूसरा ही होता है। अन्य प्रकारके तीसरा ही होता है। जैसे हमें रूईसे वस्त्र बनाना है तो पहले रूईको धुनकर उसकी पूनी बनाकर चरखेपर कातकर उसका सूत बनाना पड़ेगा, फिर उस सूतका लम्बा ताना करेंगे, फिर उसे तानेमेंसे पार करके रोलपर चढ़ायेंगे, फिर ‘वै’ मेंसे पार करके उसके आधे तन्तुओंको ऊपर उठायेंगे, आधोंको नीचे ले जायँगे और बीचमें भरनीका सूत फेंककर उस धागेको यथास्थान बैठायेंगे, फिर ऊपरवाले धागोंको नीचे लायेंगे और नीचेवालोंको ऊपर ले जायँगे, इस तरह करते रहनेपर अन्तमें वस्त्ररूपमें रूईका होगा। पर यदि हमें उसी रूईसे दीपककी बत्ती बनानी है तो उसे कुछ फैलाकर थोड़ा बट दे देनेसे तुरंत बन जायगी और यदि कुएँमेंसे जल निकालनेकी रस्सी बनानी है तो पहले सूत बनाकर उन धागोंको तीन या चार भागोंमें लम्बा करके बट लगानेसे रस्सी बन जायगी। इनमें भी जैसा वस्त्र या जैसी बत्ती या जिस प्रकारकी रस्सी बनानी है वैसे ही उनमें करना पड़ेगा। इसी तरह दूसरी वस्तुओंमें भी समझ लेना चाहिये। इससे यह हो गया कि करनेसे एक ही भिन्न-भिन्न नाम-रूपवाले युक्त हो जाता है, उसके भिन्नताका भिन्नता ही है, दूसरा कुछ नहीं। भिन्नता सहकारी सम्बन्धसे होती है। जैसे ठंडके सम्बन्धसे जलमें बर्फरूप प्रकट होनेका चलता और गर्मीके संयोगसे स्टीम (भाप) बननेका हो जाता है
किस -वस्तुमें कर लेनेपर उससे क्या फल मिलता है; इसका यहाँसे इस समाप्तिपर्यन्त किया गया है। इनको ही ‘विभूति’ अर्थात् भिन्न-भिन्न प्रकारका महत्त्व कहते हैं। (इन सबको समझकर चाहिये कि अपने लिये जो सबसे बढ़कर फल मालूम पड़े, उसे चुन ले।)
-, - और -— इस प्रकार जिन तीन पहले किया गया है, उन तीनों अर्थात् , और कर लेनेसे उनका होकर और हो जाता है। अभिप्राय यह है कि जिस वस्तुके यह जानना चाहे कि इसका मूल क्या है और यह किस ढंगसे बदलती हुई कितने आयी है और किस प्रकार बदलती हुई कितने किस प्रकार अपने होगी? तो ये सब बातें तीनों करनेसे जान सकता है
इसी प्रकार अब दूसरी विभूतियोंका करते हैं—
वस्तुके नाम, और —यह तीनों यद्यपि परस्पर भिन्न हैं, जैसे ‘घट’ यह शब्द मिट्टीसे बने हुए जिस संकेत करता है, उस सर्वथा भिन्न वस्तु है। इसी प्रकार उस घटरूप जो प्रतीति होती है, वह वृत्तिविशेष है। अत: वह भी घटरूप सर्वथा भिन्न वस्तु है क्योंकि शब्द वाणीका है, घटरूप मिट्टीका है और है तथापि तीनोंका परस्पर मिश्रण हुआ रहता है। अत: जब विचारद्वारा इनके विभागको समझकर उस विभागमें कर लेता है, तब उसको समस्त प्राणियोंकी वाणीके अर्थका हो जाता है16
प्राणी जो कुछ करता है एवं अपने इन्द्रियों और मन-बुद्धिद्वारा जो कुछ करता है, वे सब उसके अन्त:करणमें संस्काररूपमें संचित रहते हैं। दो प्रकारके होते हैं—एक वासनारूप, जो कि हैं, दूसरे धर्माधर्मरूप जो कि , और हैं—ये दोनों ही प्रकारके अनेक -जन्मान्तरोंसे संगृहीत होते आ रहे हैं (योग० 2। 12, 4। 8 से 11)। उन करके उनको कर लेनेसे पूर्वजन्मका हो जाता है। जैसे अपने पूर्व अपने पूर्वजन्मका होता है, उसी प्रकार दूसरेके करनेसे उसके पूर्वजन्मका भी हो सकता है
श्रीविज्ञानभिक्षुका अर्थ है कि संयमद्वारा अपने कर लेनेसे संकल्पमात्रसे ही दूसरेके जान लेता है कि यह कुछ चिन्तन करनेमें लग रहा है या नहीं, इस समय यह प्रक्षिप्त है या मूढ़ है या प्रशान्त है इत्यादि। किंतु दूसरे टीकाकारोंने यह अर्थ स्वीकार नहीं किया है। इस ग्रन्थमें प्राय: वृत्तिविशेषको या ही प्रत्यय नामसे कहा गया है। किंतु यहाँ दूसरे टीकाकारोंने प्रत्ययका अर्थ न लेकर लिया है; क्योंकि इस उसके फल कहा है और अगले वृत्तिसहित निषेध किया है तथा इस यह स्पष्ट नहीं है कि किसके चित्तसाक्षात्कारका यह फल बतलाया गया है। किंतु फलमें ‘पर’ शब्दका प्रयोग देखकर भी दूसरेके ही माना है। वास्तवमें क्या बात है, ठीक समझमें नहीं आती
उसीको स्पष्ट करते हैं—
जो दूसरेके होता है, वह केवल स्वरूपमात्रका ही होता है, उस सालम्बनका यानी उसका जिस वस्तुका चिन्तन कर रहा है, उसका नहीं होता; क्योंकि दूसरेका है, उसका आलम्बन नहीं
अब दूसरी करते हैं—
जब अपने कर लेता है; तब वह दूसरेके देखनेमें आनेवाली दृश्यताशक्तिका संकल्पमात्रसे अवरोध कर सकता है; उसका अवरोध कर लेनेपर दूसरोंके नेत्रोंकी प्रकाशनशक्तिसे उसका सम्बन्ध नहीं होता, इस उसे कोई नहीं देख सकता। इसका नाम अन्तर्धान है। इसी तरह यदि शब्दमें कर लेता है तो उसके शब्दको कोई नहीं सुन सकता। यदि स्पर्शमें कर लेता है, तो उसे कोई छू नहीं सकता—इत्यादि भी उपलक्षणसे समझ लेनी चाहिये
अन्य करते हैं—
जिन फलस्वरूप मनुष्यकी निर्माण होता है, वे दो प्रकारके होते हैं—(1) सोपक्रम—जिनके फलका हो चुका है, जो कि अपना फल देनेमें लगे हुए हैं। (2) निरुपक्रम—जिसके फलभोगका नहीं हुआ है। इन दोनों प्रकारके करके जब मनुष्य इनको इस तरह कर लेता है कि कौन-कौन-से कितने अंशमें अपना फल दे चुके हैं और कौन-से कितना फल- बाकी है और इनकी हिसाबसे कितने दोनों प्रकारके समस्त समाप्ति हो जायगी, तब उसे अपनी मृत्युका अर्थात् शरीरनाशके समयका पूरा-पूरा हो जाता है। इसके सिवा, अरिष्टोंसे अर्थात् बुरे चिह्नोंसे भी मृत्युका हो जाता है, परंतु यह नहीं है, - है
पहले (योग० 1। 33 से) मैत्री, और —इन तीन प्रकारकी भावनाओंका है। चौथी जो है, वह नहीं है, त्याग है। उनमेंसे पहली जो सुखी मनुष्योंमें है, उसमें करनेसे प्राप्त हो जाती है अर्थात् वह सबका मित्र बनकर उनको पहुँचानेमें समर्थ हो जाता है। दूसरी जो दु:खी मनुष्योंमें है, उसमें करनेसे करुणाबल प्राप्त हो जाता है अर्थात् उसका परम दयालु हो जाता है और उसमें हरेक प्राणीके दु:खोंको दूर करनेकी आ जाती है। तीसरी जो मनुष्योंमें है, उसमें करनेसे बल प्राप्त हो जाता है अर्थात् वह सर्वथा शून्य हो जाता है और सदैव प्रसन्न रहता है। कोई भी परिस्थिति उसके मनमें किंचिन्मात्र भी चिन्ता, शोक या भयकी उत्पन्न नहीं कर सकती तथा वह दूसरोंको भी अपनी ही भाँति प्रसन्न बनानेमें समर्थ हो जाता है
यदि वह हाथीके बलमें करता है तो उसे हाथीके समान बल मिल जाता है। यदि गरुड़के बलमें करता है तो गरुड़के समान बल मिल जाता है। यदि बलमें करता है तो समान बल मिलता है। इसी तरह जिसके बलमें करता है, वैसा ही बल उसे प्राप्त हो जाता है
तीन प्रकारकी वस्तुओंका साधारणतया इन्द्रियोंसे नहीं हो सकता। एक तो जो वस्तु अत्यन्त होती है, जैसे परमाणु, महत्तत्त्व आदि; दूसरी व्यवहित अर्थात् जो किसी परदेमें छिपी हो, जैसे समुद्रमें रत्न, खानमें सुवर्ण, मणि आदि; तीसरी विप्रकृष्ट अर्थात् जो दूर- हो, जैसे हम आसाममें बैठे हैं और वस्तु मारवाड़में पड़ी है अथवा यों समझिये हि हम हिन्दुस्तानमें हैं और वस्तु अमेरिकामें पड़ी है। इनमें किसी भी वस्तुको जाननेके लिये जब पहले छत्तीसवें और सैंतालीसवें तथा इस पाँचवें वर्णित ज्योतिष्मती अर्थात् प्रकाशवती उसपर छोड़ता है, तब उसी समय वह हो जाती है
पुराणोंमें चौदहों भुवनोंका आता है, उनमेंसे एक भूलोक है, उन चौदहों भुवनोंका सूर्यमें करनेसे हो जाता है। व्यासभाष्यमें इन लोकोंका विस्तारपूर्वक किया गया है, परंतु लिये उपयोगी न समझकर मैंने यहाँ उनका नहीं किया है। इनके सिवा यह बात भी है कि इनके ठीक-ठीक समझमें भी नहीं आता
चन्द्रमामें करनेसे कौन तारा किस स्थानमें टिका है, इसका यथावत् हो जाता है
उसके बाद—
ध्रुवतारा निश्चल है और सब ताराओंकी उससे सम्बन्ध है, अत: उसमें करनेसे समस्त ताराओंकी अर्थात् कौन तारा कितने समयमें किस राशि और नक्षत्रपर जायगा—इसका पूरा-पूरा हो जाता है
नाभिमें स्थित जो चक्र है, जिसमें समस्त नाडि़याँ गुथी हुई हैं, उसमें करनेसे व्यूहका हो जाता है अर्थात् संगठन किस प्रकार हुआ है, उसमें कौन-सी धातु किस प्रकार कहाँ स्थित है, इन सबका और समस्त नाडि़योंका पूरा-पूरा हो जाता है
जिह्वाके नीचे एक तन्तु है (जिसे जिह्वामूल भी कहते हैं), उसके नीचे कण्ठ है, उसके नीचे कूप (गड्ढा) है। उस कण्ठकूपमें करनेसे भूख-प्यासकी मिट जाती है। इसमें यह बतलाया जाता है कि उस कण्ठकूपसे टकराती है, उसीसे भूख-प्यासकी होती है, उसमें करनेके बाद वह नहीं होते
कूपके नीचे वक्ष:स्थलमें एक कछुएके आकारवाली नाड़ी है, उसमें करनेसे स्थिर प्राप्ति हो जाती है अर्थात् और —दोनों स्थिर हो जाते हैं
सिरके कपोलमें एक छिद्र है (इसीको ब्रह्मरन्ध्र कहते हैं), वहाँ जो प्रकाशमयी ज्योति है, उसमें करनेवालेको और स्वर्गलोकके बीचमें विचरनेवाले होते हैं
जिसका इसी 36 वें है, उसका नाम प्रातिभ है, यह विवेकजनित पूर्वरूप है। अत: जिस प्रकार सूर्यकी प्रभासे जो कि सूर्योदयसे कुछ पहले प्रकट होता है, मनुष्य सब वस्तुओंको देख सकता है, उसी प्रकार प्रातिभ उत्पन्न होनेसे सब कुछ जान जाता है
इस ब्रह्मपुर नामक हृदयदेशमें गर्त (गड्ढे)-के आकारवाला कमल है, वह स्थान है, उसमें करनेसे वृत्तियोंसहित हो जाता है
स्वरूपका होनेसे विवेक होते ही स्वरूपका हो जाता है। अत: अगले कहते हैं—
और —दोनों सर्वथा भिन्न हैं, उनका कोई मेल नहीं है, क्योंकि परिणामशील, जड, भोग्य और चंचल है एवं अपरिणामी, , भोक्ता और है। तथापि उनकी -सी हो रही है, इसीका नाम है (योग० 2। 6)। इस दोनोंका अलग-अलग नहीं होता, एक साथ मिला हुआ होता है, उस दशामें इस जड- (जो कि चेतनासे -सी हो रही है) जो -दु:ख और मोहरूप नाना प्रकारकी उदय होता है, वह अविशेष (अभिन्न-मिश्रित) है, क्योंकि इससे -दु:ख और मोह आदि प्रतिबिम्बित चैतन्य अध्यारोपित होते हैं। यह अभेद-प्रतीति ही है। यह अभेदरूप यद्यपि है, परंतु लिये है, इस परार्थ है और इसी दशामें जो इस भोगरूप भिन्न द्रष्टापुरुषके स्वरूपविषयक होती है, वह पौरुषेय स्वार्थ है, क्योंकि उसका है और वह है भी उसके लिये, अत: वह परार्थ नहीं है। इस स्वार्थवृत्तिमें करनेसे होता है? यद्यपि है, अत: उस धर्मरूप नहीं जाना जाता है, किन्तु जो चेतनरूप प्रतिबिम्बित है, उसको दर्पणमें अपना मुख देखनेकी भाँति देखता है। इस प्रकार होता है17। यही प्रथम इकतालीसवें बतलायी हुई ग्रहीतृविषयक है। इस ‘पुरुष’ सम्बन्धित होनेके पहले सत्रहवें इसको अस्मितानुगत नामसे भी कहा है, ऐसा किया जाता है, क्योंकि ऐसा माननेसे पूर्वापरका प्रसंग ठीक बैठ जाता है तथा ग्रहीतृविषयक अन्तर्भाव मानना भी सुसंगत हो जाता है
होनेके पूर्व जो सामने आती हैं, उनका करते हैं—
ये छहों ग्रहीतृविषयक लगे हुए पुरुषज्ञानके पहले प्राप्त होती हैं। इनके इस प्रकार हैं— (1) प्रातिभ—इसका तैंतीसवें आया है। इससे , और एवं , ढकी हुई और दूर- स्थित वस्तुएँ हो जाती हैं। (2) श्रावण—इससे शब्द सुननेकी आ जाती है। (3) वेदन—इससे स्पर्शका करनेकी आ जाती है। (4) आदर्श—इससे करनेकी आ जाती है। (5) आस्वाद—इससे रसका करनेकी आ जाती है। (6) वार्ता—इससे गन्धका करनेकी आ जाती है
इन करनेके लिये कहते हैं—
छ: प्रकारकी सामने आयें तो इनका त्याग कर देना चाहिये, क्योंकि ये उसके विघ्नस्वरूप हैं। हाँ, जिसका चंचल है, जो नहीं है, जो या आत्मोद्धारकी आवश्यकता नहीं समझता है, ऐसे मनुष्यको किसी प्राप्त हो जायँ तो उसके लिये अवश्य ही ये हैं
यहाँतक नाना प्रकारके जो भिन्न-भिन्न होते हैं, उनका ज्ञानपर्यन्त किया गया, अब भिन्न-भिन्न जो भिन्न-भिन्न प्रकारकी क्रियाशक्तियाँ उपलब्ध होती हैं, उनका अगले किया जाता है—
बन्धनका - है; फल भुगतानेके लिये ही यह किसी एक बँधे रहनेके लिये बाध्य हो जाता है। बन्धनके कारणरूप - जब मनुष्य अभ्यासद्वारा शिथिल करके स्वच्छ बना लेता है और साथ ही जिन-जिन मार्गोंद्वारा विचरता है (जाता-आता है), उन मार्गोंको और भी भलीभाँति जान लेता है; तब उसमें यह आ जाती है कि वह अपने बाहर करके दूसरेके (मृत या जीवित) किसी भी प्रविष्ट कर सकता है। साथ-साथ इन्द्रियाँ भी जहाँ जाता है, वहाँ अपने-आप चली जाती हैं
जीवनका आधार है, क्रियाभेदसे उसके , अपान, समान, व्यान और उदान—ये पाँच नाम हैं। उनके इस प्रकार हैं— (1) —यह इन पाँचोंमें प्रधान है, इसकी मुख और नासिकाद्वारा होती है। नासिकाके अग्रभागसे लेकर हृदयतक इसका है। (2) अपान—यह नीचेकी ओर गमन करनेवाला है, नाभिसे लेकर पादतलतक इसका है। मूत्र, विष्ठा और गर्भ आदि इसीके वेगसे नीचे उतरते हैं। (3) समान—हृदयसे लेकर नाभितक इसका है, खान-पानके रसको समस्त यथायोग्य पहुँचा देना इसका काम है, इसकी सम है। (4) व्यान—यह समस्त व्याप्त रहता हुआ ही समस्त नाडि़योंमें विचरता है। (5) उदान—यह ऊपरकी ओर गमन करनेवाला है; कण्ठमें रहनेवाला और सिरतक गमन करनेवाला है। मृत्युके समय इसीके सहारे गमन होता है। यह प्रश्नोपनिषद् (3। 5 से 7)-में देखना चाहिये। जब उदानवायुपर प्राप्त कर लेता है, तब उसका धुनी हुई रूईकी भाँति अत्यन्त हलका हो जाता है, अत: पानी और कीचड़पर चलते हुए भी उसके पैर अन्दर नहीं जाते, काँटे आदि भी उसके प्रविष्ट नहीं हो सकते। इसके सिवा - उसके ब्रह्मरन्ध्र (मूर्धाके छिद्र) द्वारा निकलते हैं; इस ऐसे शुक्लमार्गसे होती है। उपनिषदोंमें भी ऊर्ध्वगतिका आया है (देखिये कठ०2। 3। 16)
जब द्वारा उपर्युक्त समानवायुको जीत लेता है, तब उसका सदृश प्रज्वलित यानी अत्यन्त देदीप्यमान (प्रकाशयुक्त) हो जाता है; क्योंकि जठराग्नि और समानवायुका घनिष्ठ सम्बन्ध है, अत: समानवायुको जीत लेनेपर अपने रहनेवाले जठराग्निके आवरणको हटाकर सदृश प्रकाशमान हो सकता है
पहले छत्तीसवें जो छ: बतलायी गयी हैं, उनमेंसे श्रावण नामकी बतलाते हैं—
शब्दको करनेवाली श्रोत्र-इन्द्रिय अहंकारसे उत्पन्न हुई है और उत्पत्ति अहंकारजनित शब्दतन्मात्रासे हुई है, अत: , शब्द और श्रोत्र-इन्द्रिय—इन तीनोंकी है। इस श्रोत्र और सम्बन्धको जब संयमद्वारा कर लेता है तब उसकी श्रोत्र-इन्द्रियमें आ जाती है। फिर वह -से- शब्दको सुन सकता है तथा किसी वस्तुसे ढके हुए शब्दको भी सुन सकता है और जो शब्द कहीं दूर- बोला जाय, उसे भी सुन सकता है, क्योंकि विभु अर्थात् सर्वव्यापी है, इस उसके अन्दर कहीं भी होनेवाला शब्द तत्काल ही सर्वत्र व्याप्त हो जाता है। अत: जिसकी श्रोत्र-इन्द्रिय यानी अलौकिक हो जाती है, वह चाहे जिस शब्दको, जहाँपर वह हो वहीं सुन सकता है
और जो सम्बन्ध है; उसे संयमद्वारा कर लेनेपर इस तत्त्वको भलीभाँति समझ लेता है कि अंग किस प्रकार - - होते हैं और किस प्रकार पुन: किये जा सकते हैं। अत: वह अपने अत्यन्त हलका बनाकर गमन कर सकता है। इसी तरह जब किसी भी (धुनी हुई रूई या बादल आदि) वस्तुमें करके तद्रूप हो जाता है, तब उससे भी उसको आकाशगमनकी मिल जाती है
अब आवरणका जिस उपायसे किया जा सकता है; वह बतलाते हैं—
बाहर जो मनकी है, उसको - कहते हैं, वह जब मनके रहते हुए ही केवल भावनामात्रसे होती है, तब तो कल्पित है और जब सम्बन्ध छोड़कर बाहर निकले हुए मनकी बाहर हो जाती है, तब अकल्पित होती है। कल्पित ही अकल्पित होती है। इसीको महाविदेहा कहते हैं, इससे आवरण नष्ट हो जाता है। यह इन्द्रिय और मनकी स्वरूपावस्थामें करनेसे होती है (योग० 3। 48)
यहाँतक नाना प्रकारके फलसहित किया, अब जो पहले इकतालीसवें , और ग्रहीतामें की जानेवाली सबीज- बतलाये गये थे, उनका फल बतलानेके लिये पहले पाँच और तज्जनित की जानेवाली ग्राह्यविषयक फल बतलाते हैं—
, जल, , और —ये पाँच हैं। इनमेंसे हरेककी पाँच होती हैं। जैसे— (1) स्थूलावस्था—जिस हम इनको अपनी इन्द्रियोंद्वारा कर रहे हैं, जिनको इन्द्रियगोचर नाम दिया है (13। 5), वे इन्द्रियोंद्वारा आनेवाले शब्द, स्पर्श, , रस और गन्ध नामवाले पाँचों इनकी - है। (2) स्वरूपावस्था—इनके जो हैं, वह इनकी स्वरूपावस्था है। जैसे मूर्ति, जलका गीलापन, उष्णता और , और कम्पन, अवकाश—यह इनकी स्वरूपावस्था है, क्योंकि इन्हींसे इनके भिन्न-भिन्न होता है। (3) सूक्ष्मावस्था—इनकी जो - है, जिनको तन्मात्रा और महाभूत भी कहते हैं, वे इनकी - हैं। जैसे गन्धतन्मात्रा, जलकी रसतन्मात्रा, रूपतन्मात्रा, स्पर्शतन्मात्रा और शब्दतन्मात्रा। (4) अन्वय-—पाँचों जो तीनों यानी , और व्याप्त है, वह इनकी अन्वय- है। (5) अर्थवत्त्व-—ये पाँचों और लिये हैं। यही इनकी अर्थवत्त्व (प्रयोजनता)- है। इन पाँचों प्रत्येक सम्पूर्ण अवस्थाओंमें भलीभाँति करके जब इनको कर लेता है, तब इन पूरा अधिकार हो जाता है
इस प्रकार जब प्राप्त कर लेता है, तब क्या होता है? सो बतलाते हैं—
(क) ऊपर बतलायी हुई अणिमादि आठ नाम और इस प्रकार हैं— (1) अणिमा—अणुके समान धारण कर लेना, जैसे हनुमान्जीने सुरसाके मुखमें एवं लंकामें प्रवेश करते समय किया था (वा० रामायण, सुन्दर० 1। 156, 2। 47)। (2) लघिमा— हलका कर देना। इससे जल, पंक और कण्टकादिसे नहीं होती (योग० 3। 39) और गमन करनेकी आ जाती है (योग० 3। 42)। (3) महिमा— बड़ा कर लेना। जैसे हनुमान्जीने सुरसाके सामने किया था (वा० रामायण, सुन्दर० 1। 154)। (4) गरिमा— भारी कर लेना। जैसे हनुमान्जीने भीमसेनके मार्गमें रुकावट डालते समय किया था (महा०, वन० 146-147 वाँ अध्याय)। (5) प्राप्ति—जिस किसी इच्छित भौतिक संकल्पमात्रसे ही प्राप्त कर लेना। (6) प्राकाम्य—बिना रुकावट भौतिक -सम्बन्धी इच्छाकी पूर्ति अनायास हो जाना। (7) वशित्व—पाँचों और तज्जन्य वशमें हो जाना। (8) ईशित्व—उन और भौतिक नानारूपोंमें उत्पन्न करनेकी और उनपर शासन करनेकी । (ख) कायसम्पत्का विवरण अगले आयेगा। (ग) न होना—इसका यह है कि उस काममें नहीं डाल सकते। वह अंदर भी उसी प्रकार प्रवेश कर सकता है, जैसे हरेक मनुष्य जलमें प्रवेश कर सकता है। स्थूलभाव (कड़ापन) उसे नहीं पहुँचा सकता। उसपर यदि पत्थरोंकी वर्षा की जाय तो वे उसके आघात नहीं पहुँचा सकते। इसी तरह जलका गीलापन उसके गला नहीं सकता, जला नहीं सकता अर्थात् सर्दी-गर्मी, वर्षा आदि कोई भी उसके किसी प्रकारकी नहीं पहुँचा सकते। ये सब चौवालीसवें कथनानुसार सब अवस्थाओंपर प्राप्त कर लेनेपर मिलती हैं, यह है
कायसम्पत्की स्वयं करते हैं—
अत्यन्त सुन्दर आकृति, समस्त अंगोंमें चमक, बलकी बहुलता तथा समस्त अंगोंका वज्रकी भाँति दृढ़ और परिपूर्ण हो जाना—ये चारों शरीरसम्बन्धी सम्पदा हैं
अब मनसहित इन्द्रियोंमें की जानेवाली ग्रहणविषयक फलका करते हैं—
मनसहित इन्द्रियोंकी पाँच हैं। उनमें करनेसे इन्द्रियोंपर पूर्ण अधिकार हो जाता है। उनकी अवस्थाओंके पाँच इस प्रकार हैं— (1) —विषयोंको करते समय जो आकारमें मनसहित इन्द्रियोंकी है, यह उनकी - है। (2) स्वरूप—मन और इन्द्रियोंका स्वाभाविक स्वरूप, जो कि अपने-अपने स्थानमें रहता है और (संकेत)-से जाननेमें आता है, यह उनकी स्वरूप- है। (3) —यह मनसहित इन्द्रियोंका सूक्ष्मरूप है। इसीसे मनसहित दसों इन्द्रियोंकी उत्पत्ति होती है। यह उनकी सूक्ष्मावस्था है। (4) अन्वय—मनसहित सब इन्द्रियोंमें जो तीनों यानी , और व्याप्त है, वह इनकी अन्वय- है। (5) अर्थवत्त्व—ये मनसहित सब इन्द्रियाँ और लिये हैं, यही इनकी अर्थवत्त्व- (सार्थकता) है। इस प्रकार जब मन और दसों इन्द्रियोंकी पाँचों अवस्थाओंमें करके भलीभाँति उनको कर लेता है, तब इन सबपर उसका पूरा अधिकार हो जाता है। इन्द्रियाँ और मन—ये सभी अहंकारसे उत्पन्न हैं तथा मन और इन्द्रियोंके मेलसे विषयोंको करता है या अकेले मनके द्वारा करता है। अत: यहाँ इन्द्रियजयसे मनसहित सब इन्द्रियोंपर समझनी चाहिये तथा मनमें की जानेवाली और की जानेवाली भी की जानेवाली अन्तर्गत समझना चाहिये
इन्द्रियजयका फल बतलाते हैं—
इन तीनों अलग-अलग स्वरूप इस प्रकार समझना चाहिये— (1) मनोजवित्व— और इन्द्रियोंके सहित मनकी तरह एक कहीं-से-कहीं दूर- जानेकी मनोजवित्व अर्थात् मनके सदृश कहते हैं। यह - फल है। (2) विकरणभाव— बिना ही दूर- स्थित वस्तुओंको कर लेनेकी विकरणभाव कहते हैं। जब महाविदेहा (योग० 3। 43) हो जाती है, उस समय भी मन और इन्द्रियोंमें यही काम करती है, उसीसे मनुष्य दूर- स्थित पर- करके उसमें प्रविष्ट होता है (योग० 3। 38); यह स्वरूपावस्थामें फल है। (3) प्रधानजय— और कारणरूपमें स्थिर सम्पूर्ण पूरा अधिकार हो जाना ‘प्रधानजय’ है; यह , अन्वय और अर्थवत्त्व- फल है। यह ही कहलाता है। ये तीनों प्रकारकी ग्रहणविषयक हो जानेपर अपने-आप मिल जाती हैं
अब ग्रहीतामें होनेवाली ग्रहीतृविषयक फलसहित करते हैं—
ग्रहीतृविषयक जब रजोगुण और तमोगुणसम्बन्धी सर्वथा धुलकर उसमें सत्त्वगुणके ही रह जाते हैं, उस समय केवलमात्र और भिन्नताका करनेवाली रहती है, इसीको विवेकज्ञान भी कहते हैं (योग० 3। 54, 4। 25)। इसीको पहले स्वार्थमें करनेसे होनेवाले पुरुषज्ञानके नामसे कहा है (योग० 3। 35)। ग्रहीतृविषयक द्वारा जब यह प्राप्त हो जाती है, उस समय समस्त स्वामिभाव प्राप्त हो जाता है, अर्थात् सम्पूर्ण —जो कि करनेमें लगे हुए हैं और जो अनारम्भ- हैं वे सब दासकी भाँति आज्ञापालन करनेके लिये सर्वभावसे उपस्थित हो जाते हैं तथा उसे , और -अवस्थाओंमें स्थित समस्त एक साथ भलीभाँति हो जाता है। इसीसे वह सर्वज्ञ कहलाता है, इसके बादकी धर्ममेघसमाधि है (योग० 4। 29)
पहले सैंतालीसवें कही हुई ऊँची-से-ऊँची सबीज- और अड़तालीसवें कही हुई ऋतम्भरा भी निर्बीज- बहिरंग बतलाया है; अत: उपर्युक्त भी होनेपर निर्बीज-समाधिरूप प्राप्ति बतलाते हैं—
ग्रहीतृविषयक जब यह हो जाता है कि और —दोनों अत्यन्त भिन्न हैं, इनका संयोग अविद्याकृत है नहीं है, उस समय उसके सामने पूर्व बतायी हुई होता है। उनमें न अटककर जो सर्वथा , , कूटस्थ, आनन्दमय और तथा समस्त और उनके कार्योंको जड, दु:खप्रद और बदलनेवाले समझकर सम्पूर्ण और उनके कार्योंसे अत्यन्त हो जाता है (योग० 1। 16), परवैराग्यसे जब बीजरूप अन्तिम भी सर्वथा हो जाता है, तब निर्बीजसमाधि हो जाती है। इस अपनी संस्कारोंसहित अपने हो जाता है और अपने स्वरूपमें हो जाती है (योग० 4। 34)। यह साथ आत्यन्तिक वियोग है; इसीको कहते हैं
जब कुछ उन्नत जाने लगता है, तब उसके जीवनमें नाना प्रकारके आया करते हैं, अत: उनसे बचनेके लिये सावधान करते हैं—
जब अच्छी हो जाती है, उस समय बड़े-बड़े लोकपाल अधिकारी देवता और होते हैं, उस समय देवतालोग उसे अपने लोकोंमें दिखाकर नाना प्रकारसे उन बड़ाई करके अपने पास बुलाया करते हैं। उस समय खूब सावधान रहना चाहिये, उनके प्रलोभनमें नहीं पड़ना चाहिये। अपने मनमें बार-बार यह लाना चाहिये कि -जन्मान्तरमें करते-करते इस मनुष्य- बड़े सौभाग्यसे महापुरुषोंकी और परम यह प्राप्त हुई है, इसके सामने ये नाना प्रकारके क्षणभंगुर अत्यन्त तुच्छ हैं। इनके प्रलोभनमें पड़कर मैं अपने-आपको कैसे संसार-समुद्रमें डुबा सकता हूँ! मैंने तो इन सबका तत्त्व भलीभाँति कर लिया है; इनमें गन्ध भी नहीं है। इस प्रकारकी करके उनसे हो जाना चाहिये, उनमें जरा-सा भी अपने रागयुक्त सम्बन्ध यानी आसक्ति नहीं होने देनी चाहिये तथा इस बातका अभिमान भी अपने मनमें नहीं आने देना चाहिये कि मैं कैसी उच्च प्राप्त हो गया हूँ, जिसके बड़े-बड़े देवतालोग भी मेरा सत्कार करते हैं और मुझे अपने लोकोंमें बुलाते हैं; क्योंकि संग और अभिमान करनेसे पुन: संसारचक्रमें फँसनेका प्रसंग (मौका) आ जाता है। अत: हर समय हरेक प्रकारके खूब सावधान रहना चाहिये; यह है
विवेकज्ञानकी उत्पत्तिका दूसरा उपाय बतलाते हैं—
जो छोटे-से-छोटा हिस्सा है, जिससे छोटा विभाग हो ही नहीं सकता, उसे ‘क्षण’ कहते हैं; उसका जो एक बाद दूसरे प्रकट होनेका लगातार सिलसिला है, उसका नाम है। यह है कि दो एक साथ नहीं रह सकते और दोनोंके बीचमें किसी औरका व्यवधान भी नहीं है, एकके पीछे दूसरे सिलसिला चालू रहता है, इसीको ‘क्रम’ कहते हैं। अत: और उसके कर लेनेसे विवेकजन्य उत्पन्न हो जाता है
उस विवेकज्ञानका कहते हैं—
वस्तुओंका विवेचन करके उनका समझानेके तीन हैं—(1) वस्तुकी , (2) वस्तुका अर्थात् वर्ण, आकृति आदि, (3) उसका अर्थात् स्थान—इन तीनोंके वस्तुओंकी भिन्नताका विवेचन होता है, परंतु जिन दो वस्तुओंमें इनसे उपलब्धि नहीं हो सके, उन एक-जैसी प्रतीत होनेवाली वस्तुओंके भी जो करा देनेवाला है, उनका नाम विवेकज्ञान है
उस विवेकज्ञानकी विशेषताका करते हैं—
यह परवैराग्यको उत्पन्न करके - सम्पादन करनेमें है, इसलिये इसको तारक अर्थात् संसार-समुद्रसे उद्धार करनेवाला कहा है। इसके द्वारा समस्त वस्तुओंको सब प्रकारसे जान सकता है, इस यह ‘सर्वविषयम्’ और ‘सर्वथाविषयम्’ कहलाता है। इसके द्वारा हरेक वस्तुको बिना एक साथ जान सकता है, इस इसको ‘अक्रमम्’ भी कहते हैं। यह अन्तिम है, इससे ऊँची कोई नहीं है। ‘अक्रमम्’ का यह भी समझना चाहिये कि यह रहित है, अर्थात् दूसरे भाँति परिवर्तनशील नहीं है। इसी पहले सोलहवें ‘पुरुष-ख्याति’ के नामसे परवैराग्यका बतलाया है
ऊपर बतलाये हुए प्रकारसे विवेकज्ञान होनेपर ही हो, ऐसा नहीं है। इसके सिवा दूसरे प्रकारसे भी विवेकज्ञान होकर प्राप्त हो सकता है। अत: उसके लिये जो बात अवश्य होनी चाहिये उसका करते हैं—
इधर अत्यन्त होकर अपने होने लग जाती है और उधर जो साथ अज्ञानकृत सम्बन्ध है, उसका और तज्जनित मल-विक्षेप-आवरणका होनेसे भी हो जाता है। इस प्रकार जब दोनोंकी समभावसे हो जाती है, तब होता है; वह चाहे किसी भी किसी भी प्रकारसे क्यों न हो जाय