SANATANI
Adi Shankaracharya · Stotra · 9 verses
जो कृपाकी समुद्र, सूर्यकुमारी, तापको शान्त करनेवाली, श्रीकृष्णचन्द्रकी प्रेमिका, संसारभीतिके लिये दावानलस्वरूप, भक्तोंको वर देनेवाली और आकाशजालसे मुक्त लक्ष्मीस्वरूपा हैं, उन नित्यफलदायनी यमुनाजीका धीर पुरुष सुखप्राप्तिके लिये निश्चयपूर्वक निरन्तर प्रतिदिन भजन करता है
हे मधुवनमें विहार करनेवाली! हे भास्करवाहिनि! हे गंगाजीकी सहचरी! हे सिन्धुसुते! हे श्रीमधुसूदनविभूषिणि! हे माधवतृप्तिकारिणि! हे गोकुलका भय दूर करनेवाली! हे जगत्पापविनाशिनि! हे वांछितफलदायिनि! हे कृष्णकेलिकी आश्रयभूता सकलभयनिवारिणी संकटनाशिनी यमुने! तुम्हारी जय हो! जय हो! तुम मुझे पवित्र करो
अयि मधुरे! अयि मधुगन्धविलासिनि! हे पर्वतोंमें विहार करनेवाली! परम वेगवती अपने तीरवर्ती भक्तजनोंका पालन करनेवाली, दुष्टोंका संहार करनेवाली, इच्छित कामनाओंकी विलासभूमि, व्रजभूमिनिवासियोंके अर्जित पापोंको हरण करनेवाली तथा सम्पूर्ण जीवोंका उद्धार करनेवाली, सकलभयनिवारिणी संकटनाशिनी यमुने! तुम्हारी जय हो! जय हो! तुम मुझे पवित्र करो
जो महान् विपत्तिसागरमें निमग्न है, सैकड़ों सांसारिक संतापोंसे जिसका मन व्याकुल है, जो गति (आश्रय) और मति (विचार)-से शून्य तथा सब प्रकारके भयोंसे व्याकुल है, जो ऋण और भयसे दबा हुआ तथा सैकड़ों-हजारों-करोड़ों प्रतिकारशून्य पापोंका पुतला है, तुम्हारे चरणकमलयुगलमें प्राप्त हुए ऐसे मुझको, हे सकल भयनिवारिणी संकटनाशिनी यमुने! तुम्हारी जय हो! जय हो! तुम मुझे पवित्र करो
तुम्हारा शरीर करोड़ों नवीन मेघोंकी कान्तिसे सुशोभित तथा सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित है, जिसका चंचल अंचल चपलाकी भी अवहेलना करता है, ऐसे पीत दुकूलको धारण करके तुम परम शोभायमान हो रही हो तथा मणिमय आभूषण और चित्र-विचित्र वस्त्र एवं आसनसे रंजित होकर तुमने सूर्यकी किरणोंको भी कुण्ठित कर दिया है; हे सकल भयनिवारिणी संकटहारिणी यमुने! तुम्हारी जय हो, जय हो! तुम मुझे पवित्र करो
हे सुन्दर तटोंवाली! हे मधुमत्त-यदुकुलोत्पन्न श्रीकृष्ण और बलरामके रासमहोत्सवकी क्रीडाभूमि! हे ऊँचे-ऊँचे कुलपर्वतोंकी श्रेणियोंपर शोभायमान मुक्तावलीरूप आभूषणोंसे पृथ्वी और आकाशको विभूषित करनेवाली, हे करोड़ों भास्करोंके समान नवीन मणियोंकी कंचुकीसे सुशोभित तथा तारावलीरूप हारसे युक्त, सकल भयनिवारिणी संकटहारिणी यमुने! तुम्हारी जय हो, जय हो! तुम मुझे पवित्र करो
तुम्हारी नासिकाकी भूषणरूप गजमुक्ता वायुसे चंचल होकर झिलमिला रही है, तुम्हारे नेत्ररूप मतवाले भौंरे मानो मुखकमलकी सुवाससे चंचल हो रहे हैं तथा दोनों अमल कपोल हिलते हुए मणिमय कुण्डलोंकी झलकसे झिलमिला रहे हैं, हे सकल भयनिवारिणी संकटहारिणी यमुने! तुम्हारी जय हो, जय हो! तुम मुझे पवित्र करो
तुम्हारे अरुण चरणकमल सुवर्णमय नूपुरोंके कलरवसे युक्त हैं, तुम मनको प्रसन्न करनेवाली ‘धिमि धिमि’ स्वरमयी मनोहर गतिसे गमन करती हो, जो मनुष्य तुम्हारे चरणकमलोंमें चित्त लगाता है, तुम उसके सम्पूर्ण ताप हर लेती हो; हे सकल भयनिवारिणी संकटहारिणी यमुने! तुम्हारी जय हो! जय हो! तुम मुझे पवित्र करो
जो मनुष्य संसारके सन्तापसमुद्रमें डूबकर अत्यन्त दुर्गतिग्रस्त हो रहा है, वह यदि प्रतिदिन प्रातःकाल अनन्य चित्तसे (इस स्तोत्रद्वारा श्रीयमुनाजीकी) स्तुति करेगा, वह (यावज्जीवन) घोड़ोंकी हिनहिनाहट तथा हाथोंमें पुष्पपुंजसे सुशोभित होकर, निरन्तर सम्पूर्ण भोगोंको भोगेगा और मरनेके समय भगवद्रूप हो जायगा
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं यमुनाष्टकं सम्पूर्णम्।
More scriptures