SANATANI
Traditional · Stotra · 8 verses
हे जगदीश! हे सुमतियोंके स्वामी! हे विश्वेश! हे सर्वव्यापिन्! हे परमेश्वर! हे प्रकृति आदिसे अतीत! हे परमपावन! हे पितः! हे जीवोंका निस्तार करनेवाले! इस शरणागत, पतित और बुद्धि-बलसे हीन संसारसन्तप्त दासका उद्धार कीजिये॥ १॥
जो सर्वथा गुणहीन, अत्यन्त दीन और मलिनमति है तथा अपने रक्षक और दाता आपसे पराङ्मुख है, हे जीवोंका निस्तार करनेवाले! इस संसारसन्तप्त उस तामस-राजसवृत्तिवाले दासका आप उद्धार कीजिये॥ २॥
हे जीवोंका निस्तार करनेवाले! इस भयानक मरुभूमिमें पड़कर नितान्त निश्चेष्ट हुए मेरे इस अति सन्तप्त जीवनरूप मीनका अपने करुणावारिधिकी चंचल तरंगोंका जल लाकर उद्धार कीजिये॥ ३॥
अतः हे संसारकी निवृत्ति करनेवाले! हे कर्मविस्तारके कारणस्वरूप! हे कल्याणमय! हे जीवोंका निस्तार करनेवाले! संसारसमुद्रके जलमें डूबकर सन्तप्त होते हुए इस दासको अपनी करुणारूप नौका समर्पण करके यहाँसे तुरंत उद्धार कीजिये॥ ४॥
हे पुण्यरुचे! हे जीवोद्धारक! जिसकी पापराशिके भारसे पृथ्वी परिपूर्ण है, ऐसे मुझ नीचके जन्मको सदाके लिये मिटाकर मुझ अत्यन्त निन्दनीय, नगण्य, पापमें रुचि रखनेवाले और संसारके दुःखोंसे दुःखितका उद्धार कीजिये॥ ५॥
हे जगत्कर्ता! हे नारकीय यन्त्रणाओंका अपहरण करनेवाले! हे संसारका उद्धार करनेवाले! हे पापराशिको विदीर्ण करनेवाले! हे शंकर! इस दासकी कर्मराशिका हरण कीजिये और हे जीवोंका निस्तार करनेवाले! इस संसारसन्तप्त जनका उद्धार कीजिये॥ ६॥
हे अच्युत! हे चिन्मय! हे उदारचूडामणि! हे कल्याणस्वरूप! मैं अत्यन्त तृषित हूँ, मुझे ज्ञानरूप अमृतका पान कराइये। मैं अत्यन्त मोहके वशीभूत होकर नष्ट हो रहा हूँ। हे जीवोंका उद्धार करनेवाले! मुझ संसारसन्तप्तको पार लगाइये॥ ७॥
संसारमें जन्मप्राप्तिके कारणभूत कर्मोंका नाश करनेवाले आपको मैं बारंबार प्रणाम और नमस्कार करता हूँ। हे जीवोंका उद्धार करनेवाले! आप निर्गुण और अनन्तकी शरणको प्राप्त हुए इस संसारसन्तप्त जनका उद्धार कीजिये॥ ८॥
इति परमेश्वरस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।
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