SANATANI
Adi Shankaracharya · Stotra · 14 verses
पहले कर्मप्रसंगसे किया हुआ पाप मुझे माताकी कुक्षिमें ला बिठाता है, फिर उस अपवित्र विष्ठा-मूत्रके बीच जठराग्नि खूब सन्तप्त करता है। वहाँ जो-जो दु:ख निरन्तर व्यथित करते रहते हैं उन्हें कौन कह सकता है? हे शिव! हे शिव! हे शंकर! हे महादेव! हे शम्भो! अब मेरा अपराध क्षमा करो! क्षमा करो!
बाल्यावस्थामें दु:खकी अधिकता रहती थी, शरीर मल-मूत्रसे लिथड़ा रहता था और निरन्तर स्तनपानकी लालसा रहती थी; इन्द्रियोंमें कोई कार्य करनेकी सामर्थ्य न थी; शैवी मायासे उत्पन्न हुए नाना जन्तु मुझे काटते थे; नाना रोगादि दु:खोंके कारण मैं रोता ही रहता था, (उस समय भी) मुझसे शंकरका स्मरण नहीं बना, इसलिये हे शिव! हे शिव! हे शंकर! हे महादेव! हे शम्भो! अब मेरा अपराध क्षमा करो! क्षमा करो!
जब मैं युवा-अवस्थामें आकर प्रौढ़ हुआ तो पाँच विषयरूपी सर्पोंने मेरे मर्मस्थानोंमें डँसा, जिससे मेरा विवेक नष्ट हो गया और मैं धन, स्त्री और सन्तानके सुख भोगनेमें लग गया। उस समय भी आपके चिन्तनको भूलकर मेरा हृदय बड़े घमण्ड और अभिमानसे भर गया। अत: हे शिव! हे शिव! हे शंकर! हे महादेव! हे शम्भो! अब मेरा अपराध क्षमा करो! क्षमा करो!
वृद्धावस्थामें भी, जब इन्द्रियोंकी गति शिथिल हो गयी है, बुद्धि मन्द पड़ गयी है और आधिदैविकादि तापों, पापों, रोगों और वियोगोंसे शरीर जर्जरित हो गया है, मेरा मन मिथ्या मोह और अभिलाषाओंसे दुर्बल और दीन होकर (आप) श्रीमहादेवजीके चिन्तनसे शून्य ही भ्रम रहा है। अत: हे शिव! हे शिव! हे शंकर! हे महादेव! हे शम्भो! अब मेरा अपराध क्षमा करो! क्षमा करो!
पद-पदपर अति गहन प्रायश्चित्तोंसे व्याप्त होनेके कारण मुझसे तो स्मार्तकर्म भी नहीं हो सकते, फिर जो द्विजकुलके लिये विहित हैं, उन ब्रह्मप्राप्तिके मार्गस्वरूप श्रौतकर्मोंकी तो बात ही क्या है? धर्ममें आस्था नहीं है और श्रवण-मननके विषयमें विचार ही नहीं होता, निदिध्यासन (ध्यान) भी कैसे किया जाय ? अत: हे शिव! हे शिव! हे शंकर! हे महादेव! हे शम्भो! अब मेरा अपराध क्षमा करो! क्षमा करो!
प्रात:काल स्नान करके आपका अभिषेक करनेके लिये मैं गंगाजल लेकर प्रस्तुत नहीं हुआ, न कभी आपकी पूजाके लिये वनसे बिल्वपत्र ही लाया और न आपके लिये तालाबमें खिले हुए कमलोंकी माला तथा गन्ध-पुष्प ही लाकर अर्पण किये। अत: हे शिव! हे शिव! हे शंकर! हे महादेव! हे शम्भो! अब मेरा अपराध क्षमा करो! क्षमा करो!
मधु, घृत, दधि और शर्करायुक्त दूध (पंचामृत) से मैंने आपके लिंगको स्नान नहीं कराया, चन्दन आदिसे अनुलेपन नहीं किया, धतूरेके फूल, धूप, दीप, कपूर तथा नाना रसोंसे युक्त नैवेद्योंद्वारा पूजन भी नहीं किया। अत: हे शिव! हे शिव! हे शंकर! हे महादेव! हे शम्भो! अब मेरे अपराधोंको क्षमा करो! क्षमा करो!
मैंने चित्तमें शिव नामक आपका स्मरण करके ब्राह्मणोंको प्रचुर धन नहीं दिया, न आपके एक लक्ष बीजमन्त्रोंद्वारा अग्निमें आहुतियाँ दीं और न व्रत एवं जपके नियमसे तथा रुद्रजाप और वेदविधिसे गंगातटपर कोई साधना ही की। अत: हे शिव! हे शिव! हे शंकर! हे महादेव! हे शम्भो! अब मेरे अपराधोंको क्षमा करो! क्षमा करो!
जिस सूक्ष्ममार्गप्राप्य सहस्रदल कमलमें पहुँचकर प्राणसमूह प्रणवनादमें लीन हो जाते हैं और जहाँ जाकर वेदके वाक्यार्थ तथा तात्पर्यभूत पूर्णतया आविर्भूत ज्योतिरूप शान्त परम तत्त्वमें लीन हो जाता है, उस कमलमें स्थित होकर मैं सर्वान्तर्यामी कल्याणकारी आपका स्मरण नहीं करता हूँ। अत: हे शिव! हे शिव! हे शंकर! हे महादेव! हे शम्भो! अब मेरे अपराधोंको क्षमा करो! क्षमा करो!
नग्न, नि:संग, शुद्ध और त्रिगुणातीत होकर, मोहान्धकारका ध्वंस कर तथा नासिकाग्रमें दृष्टि स्थिरकर मैंने (आप) शंकरके गुणोंको जानकर कभी आपका दर्शन नहीं किया और न उन्मनी-अवस्थासे कलिमलरहित आप कल्याणस्वरूपका स्मरण ही करता हूँ। अत: हे शिव! हे शिव! हे शंकर! हे महादेव! हे शम्भो! अब मेरे अपराधोंको क्षमा करो! क्षमा करो!
चन्द्रकलासे जिनका ललाट-प्रदेश भासित हो रहा है, जो कन्दर्पदर्पहारी हैं, गंगाधर हैं, कल्याणस्वरूप हैं, सर्पोंसे जिनके कण्ठ और कर्ण भूषित हैं, नेत्रोंसे अग्नि प्रकट हो रहा है, हस्तिचर्मकी जिनकी कन्था है तथा जो त्रिलोकीके सार हैं, उन शिवमें मोक्षके लिये अपनी सम्पूर्ण चित्तवृत्तियोंको लगा दे; और कर्मोंसे क्या प्रयोजन है?
इस धन, घोड़े, हाथी और राज्यादिकी प्राप्तिसे क्या ? पुत्र, स्त्री, मित्र, पशु, देह और घरसे क्या ? इनको क्षणभंगुर जानकर रे मन! दूरहीसे त्याग दे और आत्मानुभवके लिये गुरुवचनानुसार पार्वतीवल्लभ श्रीशंकरका भजन कर
देखते-देखते आयु नित्य नष्ट हो रही है, यौवन प्रतिदिन क्षीण हो रहा है; बीते हुए दिन फिर लौटकर नहीं आते; काल सम्पूर्ण जगत्को खा रहा है। लक्ष्मी जलकी तरंगमालाके समान चपल है; जीवन बिजलीके समान चंचल है; अत: मुझ शरणागतकी हे शरणागतवत्सल शंकर! अब रक्षा करो! रक्षा करो!
हाथोंसे, पैरोंसे, वाणीसे, शरीरसे, कर्मसे, कर्णोंसे, नेत्रोंसे अथवा मनसे भी जो अपराध किये हों, वे विहित हों अथवा अविहित, उन सबको हे करुणा-सागर महादेव शम्भो! क्षमा कीजिये। आपकी जय हो, जय हो
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीशिवापराधक्षमापनस्तोत्रं सम्पूर्णम्।
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