SANATANI
Maharshi Vyasa · Ashtakam · 10 verses
जिनकी जटाएँ गंगाजीकी लहरोंसे सुन्दर प्रतीत होती हैं, जिनका वामभाग सदा पार्वतीजीसे सुशोभित रहता है, जो नारायणके प्रिय और कामदेवके मदका नाश करनेवाले हैं, उन काशीपति विश्वनाथको भज।
वाणीद्वारा जिनका वर्णन नहीं हो सकता, जिनके अनेक गुण और अनेक स्वरूप हैं, ब्रह्मा, विष्णु और अन्य देवता जिनकी चरणपादुकाका सेवन करते हैं, जो अपने सुन्दर वामांगके द्वारा ही सपत्नीक हैं, उन काशीपति विश्वनाथको भज।
जो भूतोंके अधिपति हैं, जिनका शरीर सर्परूपी गहनोंसे विभूषित है, जो बाघकी खालका वस्त्र पहनते हैं, जिनके हाथोंमें पाश, अंकुश, अभय, वर और शूल हैं, उन जटाधारी त्रिनेत्र काशीपति विश्वनाथको भज।
जो चन्द्रमाद्वारा प्रकाशित किरीटसे शोभित हैं, जिन्होंने अपने भालस्थ नेत्रकी अग्निसे कामदेवको दग्ध कर दिया, जिनके कानोंमें बड़े-बड़े साँपोंके कुण्डल चमक रहे हैं, उन काशीपति विश्वनाथको भज।
जो पापरूपी मतवाले हाथियोंके मारनेवाले सिंह हैं, दैत्यसमूहरूपी साँपोंका नाश करनेवाले गरुड़ हैं तथा जो मरण, शोक और बुढ़ापारूपी भीषण वनको जलानेवाले दावानल हैं, ऐसे काशीपति विश्वनाथको भज।
जो तेजपूर्ण, सगुण, निर्गुण, अद्वितीय, आनन्दकन्द, अपराजित और अतुलनीय हैं, जो अपने शरीरपर साँपोंको धारण करते हैं, जिनका रूप हृस-वृद्धिरहित है, ऐसे आत्मस्वरूप काशीपति विश्वनाथको भज।
जो रागादि दोषोंसे रहित हैं; अपने भक्तोंपर कृपा रखते हैं, वैराग्य और शान्तिके स्थान हैं, पार्वतीजी सदा जिनके साथ रहती हैं, जो धीरता और मधुर स्वभावसे सुन्दर जान पड़ते हैं तथा जो कण्ठमें गरलके चिह्नसे सुशोभित हैं, उन काशीपति विश्वनाथको भज।
सब आशाओंको छोड़कर, दूसरोंकी निन्दा त्यागकर और पाप-कर्मसे अनुराग हटाकर, चित्तको समाधिमें लगाकर, हृदयकमलमें प्रकाशमान परमेश्वर काशीपति विश्वनाथको भज।
जो मनुष्य काशीपति शिवके इस आठ श्लोकोंके स्तवनका पाठ करता है, वह विद्या, धन, प्रचुर सौख्य और अनन्त कीर्ति प्राप्तकर देहावसान होनेपर मोक्ष भी प्राप्त कर लेता है।
जो शिवके समीप इस विश्वनाथाष्टकका पाठ करता है, वह शिवलोक प्राप्त करता और शिवके साथ आनन्दित होता है।
इति श्रीमहर्षिव्यासप्रणीतं श्रीविश्वनाथाष्टकं सम्पूर्णम् ।
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