SANATANI
Brahmananda Paramahamsa Swami · Ashtakam · 8 verses
कोई शिवको ही बताते हैं तथा कोई शक्तिको, कोई गणेशको और कोई भगवान् कहते हैं; उन सब रूपोंमें आप ही भास रहे हैं, इसलिये हे दीनबन्धो! मेरी तो एकमात्र आप ही हैं॥ १॥
भ्राता, पिता, माता, स्त्री, पुत्र, एवं बल—इनमेंसे कोई भी मुझे अपना नहीं दीखता; अत: हे दीनबन्धो! आप ही मेरी एकमात्र हैं॥ २॥
मैंने न तो छोड़कर महात्माओंकी की, न आस्तिकबुद्धिसे किया है और न कभी विधिपूर्वक देवताओंका ही किया है; अत: हे दीनबन्धो! अब आप ही मेरी एकमात्र हैं॥ ३॥
दुर्वासनाएँ मेरे सदा खींचती रहती हैं, रोगसमूह सर्वदा शरीरको तपाते रहते हैं और जीवनतो सदैव ही है; अत: हे दीनबन्धो! आप ही मेरी एकमात्र हैं॥ ४॥
पहले मुझसे जो-जो बने हैं, उन सबको याद कर-करके मेरा काँपता है; किन्तु तुम्हारी पतितपावनता तो प्रसिद्ध ही है, अत: हे दीनबन्धो! अब आप ही मेरी एकमात्र हैं॥ ५॥
प्रभो! आपको भूलनेसे -जन्मादिसम्भूत दु:ख, नाना , , कुत्ता, शूकरादि तथा नरकादिमें —ये ही फल संसारमें विस्तृत हैं, अत: हे दीनबन्धो! अब आप ही मेरी एकमात्र हैं॥ ६॥
नीच, महापापी अथवा ही क्यों न हो; किन्तु जो एक बार भी यह कह देता है कि ‘मैं आपका हूँ’, उसीको आप अपना दे देते हैं, हे नाथ! आपका यही है; अत: हे दीनबन्धो! अब आप ही मेरी एकमात्र हैं॥ ७॥
वेद, , , रामायण तथा पुराणसमूहमें भी सर्वत्र सब प्रकार आपहीका है; अत: हे दीनबन्धो! अब आप ही मेरी एकमात्र हैं॥ ८॥
इति श्रीमत्परमहंसस्वामिब्रह्मानन्दविरचितं श्रीहरिशरणाष्टकं सम्पूर्णम्।
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