SANATANI
Prithivipati Suri · Ashtakam · 10 verses
ध्यानम्
चाँदीके पर्वतसमान जिनकी श्वेत कान्ति है, जो सुन्दर चन्द्रमाको आभूषणरूपसे धारण करते हैं, रत्नमय अलंकारोंसे जिनका शरीर उज्ज्वल है, जिनके हाथोंमें परशु, मृग, वर और अभय है, जो प्रसन्न हैं, पद्मके आसनपर विराजमान हैं, देवतागण जिनके चारों ओर खड़े होकर स्तुति करते हैं, जो बाघकी खाल पहनते हैं, जो विश्वके आदि, जगत्की उत्पत्तिके बीज और समस्त भयोंको हरनेवाले हैं, जिनके पाँच मुख और तीन नेत्र हैं, उन महेश्वरका प्रतिदिन ध्यान करे।
स्तोत्रम्
अरे मनुष्यो! जो समस्त प्राणियों, स्वर्ग, पृथ्वी और नागलोकके पति हैं, दक्षकन्या सतीके स्वामी हैं, शरणागत प्राणियों और भक्तजनोंकी पीड़ा दूर करनेवाले हैं, उन परमपुरुष पार्वती-वल्लभ शंकरजीको भजो।
ऐ मनुष्यो! कालके वशमें पड़े हुए जीवको पिता, माता, भाई, बेटा, अत्यन्त बल और कुल—इनमेंसे कोई भी नहीं बचा सकता, इसलिये तुम गिरिजापतिको भजो।
रे मनुष्यो! जो मृदंग और डमरू बजानेमें निपुण हैं, मधुर पंचम स्वरके गायनमें कुशल हैं, प्रमथ और भूतगण जिनकी सेवामें रहते हैं, उन गिरिजापतिको भजो।
हे मनुष्यो! ‘शिव! शिव! शिव!’ कहकर मनुष्य जिनको प्रणाम करते हैं, जो शरणागतोंको शरण, सुख और अभय देनेवाले हैं, उन दयासागर गिरिजापतिका भजन करो।
अरे मनुष्यो! जो नरमुण्डरूपी मणियोंका कुण्डल और साँपोंका हार पहनते हैं, जिनका शरीर चिताकी धूलिसे धूसर है, उन वृषभध्वज गिरिजापतिको भजो।
अरे मनुष्यो! जिन्होंने दक्ष-यज्ञका विध्वंस किया था; जिनके मस्तकपर चन्द्रमा सुशोभित हैं, जो यज्ञ करनेवालोंको सदा ही फल देनेवाले हैं और जो प्रलयकी अग्निमें देवता, दानव और मानवोंको दग्ध करनेवाले हैं, उन गिरिजापतिको भजो।
अरे मनुष्यो! जगत्को जन्म, जरा और मरणके भयसे पीड़ित, सामने उपस्थित भयसे व्याकुल देखकर बहुत दिनोंसे हृदयमें संचित मदका त्याग कर उन गिरिजापतिको भजो।
अरे मनुष्यो! विष्णु, ब्रह्मा और इन्द्र जिनकी पूजा करते हैं, यम और कुबेर जिनको प्रणाम करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं तथा जो त्रिभुवनके स्वामी हैं, उन गिरिजापतिको भजो।
जो मनुष्य पृथ्वीपति सूरिके बनाये हुए इस अद्भुत पशुपति-अष्टकका सदा पाठ और श्रवण करता है, वह शिवपुरीमें निवास करता और आनन्दित होता है।
इति श्रीपृथिवीपतिसूरिविरचितं श्रीपशुपत्यष्टकं सम्पूर्णम्॥
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