SANATANI
Umapati Sharma Dwivedi · Stotra · 20 verses
जो अपनी पूँछसे साफ किये हुए आकाश तथा समुद्रके मध्यवर्ती मार्गपर उछलकर चलते समय इन्द्रके आनन्दका कारण हो रहे थे और आगेकी ओर फैलायी हुई जिनकी भुजाओंसे पर्वतखण्ड फूटते जाते थे, जानकीजीके नेत्रोंको शीघ्र ही आनन्द देनेवाले उन हनुमान्जीकी आज मैं वन्दना करता हूँ
जानकीजीने पतिके लिये जो निशाचरोंके बीच अत्यन्त भयके कारण दुःसह, घोर एवं अद्भुत व्रत किया था, उसीके विविध फल-स्वरूप दूतवेषमें सीताके सम्मुख अपने शरीरको प्रकट किये हुए हनुमान्जीकी मैं स्तुति करता हूँ
जिन्होंने श्रीरघुनाथपत्नी जानकीके दोनों चरणारविन्दोंको, जो निराशारूप धूलिसे धूसरित होनेके कारण रागशून्य हो गये थे, बारंबार प्रणाम करते हुए, अपने अनुरागोंद्वारा [पतिमिलनके—] पहले ही रागरंजित कर दिया; उन अञ्जनीनन्दन महावीरजीकी मैं विशेष सन्तोषके लिये वन्दना करता हूँ
सुन्दर अशोकवनके घने वृक्षोंको जानकीजीकी विरहवेदना [को बढ़ाने] का कारण समझकर जिन्होंने लङ्कानगरीकी स्निग्ध अलकावलीके समान उन्हें शीघ्र ही उखाड़ डाला, उन सुवर्णके सदृश सुन्दर शरीरवाले कपिवर हनुमान्जीको मैं अपने पालन-पोषणके लिये प्रणाम करता हूँ
अपने गम्भीर घोषसे प्रतिध्वनित पर्वतोंकी सहस्रों कन्दराओंमें रहनेवाले सिंहोंके समूहको जिन्होंने सम्भ्रमवश शब्दायमान एवं विचलित कर दिया और अक्षकुमारके विनाशकालमें राक्षसराज रावणको भी आश्चर्यमें डाल दिया, उन कपिराज सुग्रीवकी सेनाके नायक हनुमान्जीकी मैं वन्दना करता हूँ
लीलासे ही महासागरको लाँघ जानेपर भी जो तीव्र गतिसे घूमती हुई गदाद्वारा राक्षसोंके क्षत-विक्षत होनेपर अपने आनन्दसमुद्रको अपार-सा देख रहे थे, उन अक्षयकुमारके मारकेशरूप महावीरजीको मैं प्रणाम करता हूँ
जिन्होंने इन्द्रजित् (मेघनाद) के हठात् फेंके हुए पाशबन्धको ब्रह्माजीके अनुरोधकी भाँति तत्काल ग्रहण कर लिया और रुद्रका अवतार होनेपर भी जो रावणकी विशालदृष्टिके संकोचका कारण बन गये, उन उदार वानरवीरको मैं भजता हूँ
जो अभिमानसे ऊपर उठे हुए रावणके मस्तकोंपर देदीप्यमान किरीटोंमें अपने प्रतिबिम्बको देखकर उसमें अपने भुजयन्त्रद्वारा पीसे जानेवाले रावणके शरीरके रक्तपातकी अपेक्षा रखनेवाली अपनी छातीकी ओर निहारते हुए प्रसन्न हो रहे थे, उन्हें मैं प्रणाम करता हूँ
देवताओंके समान पराक्रम रखनेवाले अक्षकुमार आदि वीरोंके नाशजनित क्रोधसे ही मानो जिसने शीघ्र ही बदला लेनेके लिये चन्द्रहास नामक तलवार उठा ली है, उस दशशीश (रावण)के शरीरका, गम्भीर मेघगर्जनाको भी मूक बनानेवाले अपने भयंकर सिंहनादसे स्तम्भन करते हुए हनुमान्जीको प्रणाम करता हूँ
जो अपने किये हुए प्रचुर पराक्रमोंद्वारा विजयकी आशंसासे युक्त श्रीरामचन्द्रजीके तेजका वर्णन कर रहे हैं और दूतधर्ममें प्राप्त होनेके समन्वयका [अथवा समस्त शास्त्रोंके अन्वयका] उपदेश करते हैं, उन राजा सुग्रीवकी सेनाके प्रधान (सेनापति) वीरकी मैं वन्दना करता हूँ
उचित उपदेश दे चुकनेपर, जिनकी पूँछमें निशाचरराज रावणका कोपानल ही उसकी दम्भसे अन्धी हुई बुद्धिके सहारे बढ़कर, लंकाको जलानेकी इच्छासे वहाँ कूद पड़ा था, उन्हीं हनुमान्जीका मैं वरण करता हूँ
उनकी तनी हुई पूँछके किनारे अग्नि लगी थी, उससे समस्त लंकानगरी अत्यन्त वेगसे जल रही थी, बाहर निशाचरकुलका करुणक्रन्दन मचा हुआ था, उस समय ऐसा जान पड़ता था मानो अग्निज्वालासे झुलसे हुए घर ही बाहर निकलकर रो रहे हैं, ऐसी लंकामें चारों ओर दौड़ते हुए हनूमान्जीको मैं प्रणाम करता हूँ
प्रासादशिखरपर रहनेवाले तोता और कबूतर आदि पक्षी जलते हुए जब आकाशमें उड़ते थे तो ऐसा मालूम होता था मानो उन दग्ध होनेवाले गृहोंके प्राण ही मूर्तिमान् होकर स्वर्गमें जा रहे हैं; उन पक्षियोंसे क्षणभर घिरकर ऊपर उठी हुई ज्वालाओंवाली पूँछ धारण किये, जिनकी शोभा पीताम्बरधारी भगवान् विष्णुको पीठपर चढ़ाकर अपना समूह साथ लिये विचरनेवाले पक्षिराज गरुडकी-सी हो रही थी, उन हनुमान्जीकी मैं स्तुति करता हूँ
लंकानगरके ऊपर अपनी विशाल पूँछ खंभेमें लगी हुई अग्निकी ज्वाला ही जिसमें पताकाके समान है, ऐसी रामचन्द्रजीकी रणविजयवैजयन्तीको देवताओंकी प्रसन्नताके लिये मानो आज ही आकाशमें दिखलाते हुए महावीरजीकी मैं वन्दना करता हूँ
जिन्होंने सीताजीकी पीड़ाको, जो उनके दर्शनमात्रसे मर चुकी थी, एकमात्र राक्षस-समूहरूप काठ-कबाड़ोंसे बनी हुई लंकारूपिणी चितापर सुलाकर, अपनी पूँछकी लगायी हुई अग्निसे उसका मरणान्त कालोचित दाह-संस्कार किया, वे हनूमान्जी हमारी प्रसन्नताके कारण हों
विदेहनन्दिनी सीताकी शुद्धिके लिये श्रीरामचन्द्रजीके प्रति प्रेमके एकमात्र साक्षीपदपर स्थित पावकको मानो समुद्रके यहाँ धरोहर रखनेके निमित्त,उसमें कूद पड़नेवाले, वायुनन्दनको मैं भजता हूँ
राक्षसों [के साथ संग्राम] में तृप्त न होनेके कारण, क्रोध एवं अशान्तिसे जो विशेष रक्तवर्ण हो गये हैं, अक्षकुमारके संहारकालके कार्योंसे जिनकी दक्षताका अनुमान किया जा चुका है तथा जो प्रभातसमयके प्रभामय सूर्यके किरणोंके समान कान्तिमान् हैं, लंकाको भय देनेवाले उन भगवान् हनूमान्की मैं स्तुति करता हूँ
समुद्र लाँघकर, सीताके दिये हुए चूडारत्नको पाकर और शत्रुके महान् नगरको भी जलाकर, श्रीरामचन्द्रजीके आनन्दाश्रुसे सींचे जानेवाले, ब्रह्मचारिश्रेष्ठ वानरवीरकी मैं शरण लेता हूँ
जो पूर्वजन्ममें गौतम ऋषिके शंकरात्मा नामक शान्त शिष्य होनेपर भी उनके गुरुके समान श्रद्धापात्र थे; शंकरजीके प्राणवायुसे जिनका प्रादुर्भाव हुआ है, जो हरि (वानर) भावको प्राप्त होकर भी हरि (विष्णु) की भाँति शंकरजीके हार्दिक प्रेमी हैं तथा बुद्धि, धैर्य और शास्त्रके वैभवमें जिनकी कहीं समता नहीं है, उन हनूमान्जीकी मैं शरण लेता हूँ
जिन्होंने आशुतोष उमानाथको कंधेपर चढ़ाकर, अपनी लोकोत्तर गायन-शैलीसे उन्हें प्रसन्न किया और उनसे पानेयोग्य उत्तम वरोंको भी प्राप्त कर लिया, मैं उन परम वैष्णव भगवान् वानरवीरकी स्तुति करता हूँ
उमापतेः कविपतेः स्तुतिर्बाल्यविजृम्भिता। हनूमतस्तुष्टयेऽस्तु वीरविंशतिकाभिधा॥
इति श्रीकविपत्युपनामकोमापतिशर्मद्विवेदिविरचितं वीरविंशतिकाख्यं श्रीहनुमत्स्तोत्रं सम्पूर्णम्।
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