SANATANI
Adi Shankaracharya · Stotra · 8 verses
जो भगवान् कृष्णचन्द्रके अंगोंकी नीलिमा लिये हुए मनोहर जलौघ धारण करती है, त्रिभुवनका शोक हरनेवाली होनेके कारण स्वर्गलोकको तृणके समान सारहीन समझती है, जिसके मनोरम तटपर निकुंजोंका पुंज वर्तमान है, जो लोगोंका दुर्मद दूर कर देती है; वह कालिन्दी यमुना सदा हमारे आन्तरिक मलको धोवे
जो मलापहारी सलिलसमूहसे अत्यन्त सुशोभित है, मुक्तिदायक है, सदा ही बड़े-बड़े पातकोंको लूट लेनेमें अत्यन्त प्रवीण है, सुन्दर नन्द-नन्दनके अंगस्पर्शजनित रागसे रंजित है, सबकी हितकारिणी है, वह कालिन्दी यमुना सदा ही हमारे मानसिक मलको धोवे
जो अपनी सुहावनी तरंगोंके सम्पर्कसे समस्त प्राणियोंके पापोंको धो डालती है, जिसके तटपर नूतन मधुरिमासे भरे भक्तिरसके अनेक चातक रहा करते हैं, तटके समीप वास करने-वाले भक्तरूपी हंसोंसे जो सेवित रहती है और उनकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली है; वह कलिन्द-कन्या यमुना सदा हमारे मानसिक मलको मिटावे
जिसके तटपर विहार और रास-विलासके खेदको मिटा देनेवाली मन्द-मन्द वायु चल रही है, जिसके नीरकी सुन्दरताका वाणीद्वारा वर्णन नहीं हो सकता, जो अपने प्रवाहके सहयोगसे पृथ्वी, नदी और नदोंको पावन बनाती है; वह कलिन्दनन्दिनी यमुना सदा हमारे मानसिक मलको दूर करे
लहरोंसे सम्पर्कित वालुकामय तटसे जिसका मध्यभाग सुशोभित है, जिसका वर्ण सदा ही श्यामल रहता है, जो शरद्ऋतुके चन्द्रमाकी किरणमयी मनोहर मञ्जरीसे अलंकृत होती है और सुन्दर सलिलसे संसारको सन्तोष देनेमें जो कुशल है, वह कलिन्द-कन्या यमुना सदा हमारे मानसिक मलको नष्ट करे
जो जलके भीतर क्रीडा करनेवाली सुन्दरी राधाके अंगरागसे युक्त है, अपने स्वामी श्रीकृष्णके अंगस्पर्शसुखका जो अन्य किसीके लिये दुर्लभ है, उपभोग करती है, जो अपने प्रवाहसे प्रशान्त सप्त-समुद्रोंमें हलचल पैदा करनेमें अत्यन्त कुशल है; वह कालिन्दी यमुना सदा हमारे आन्तरिक मलको धोवे
जलमें धुलकर गिरे हुए श्रीकृष्णके अंगरागसे अपना अंगस्नान करती हुई सखियोंसे जिसकी शोभा बढ़ रही है, जो राधाकी चंचल अलकोंमें गुँथी हुई चम्पक-मालासे मालाधारिणी हो गयी है, स्वामी श्रीकृष्णके भृत्य नारद आदि जिसमें सदा ही स्नान करनेके लिये आया करते हैं; वह कलिन्द-कन्या यमुना हमारे आन्तरिक मलको धो डाले
जिसके तटवर्ती मंजुल निकुंज सदा ही नन्दनन्दन श्रीकृष्णकी लीलाओंसे सुशोभित होते हैं; किनारेपर बढ़कर खिली हुई मल्लिका और कदम्बके पुष्प-परागसे जिसका वर्ण उज्ज्वल हो रहा है, जो अपने जलमें डुबकी लगानेवाले मनुष्योंको भवसागरसे पार कर देती है, वह कलिन्द-कन्या यमुना सदा ही हमारे मानसिक मलको दूर बहावे
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीयमुनाष्टकं सम्पूर्णम्।
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