SANATANI
Achyuta Yati · Stotra · 9 verses
ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, मरुद्गण, रुद्र और मुनिजनोंने जब अति रमणीय क्षीरसागरके तटपर जाकर संत-प्रतिपालक अति उदार आपकी वन्दना की, तब भूमिका भार उतारनेके लिये जिन आपने अपनी चिद्घन मूर्तिको प्रकट किया, हे दयामय रघुनन्दन! उन आपको भजनेवाले मुझको अपने चरणकमलोंकी दासता दीजिये
हे कमलदललोचन! हे रघुवंशावतंस! हे देव! हे दयालो! हे निर्मल श्यामघनके सदृश शरीरवाले! हे निखिललोकहृत्पद्म-प्रभाकर! हे अति सुकुमार शरीरवाले! अपने अति पुनीत चरणारविन्दोंकी धूलिसे गौतमपत्नी अहल्याको पवित्र करनेवाले, दयामय रघुनन्दन! अपने भजनेवाले मुझको आप अपने चरणकमलोंकी दासता दीजिये
हे पूर्ण! हे परात्पर! हे अनन्त सुखसागर! मुझ अति दीन और अनाथकी रक्षा करो। वर्षाकालीन अति चपल चंचलाके समान मनोहर पीताम्बरधारी श्रीराम! आपको नमस्कार है। हे कन्दर्प-दर्प-दलन, हे सुन्दर वदन, सुवर्ण-भूषण एवं रत्नकिरीटधारी, दयामय, रघुनन्दन! अपने भजनेवाले मुझको आप अपने चरणकमलोंकी दासता दीजिये
दिव्यशरच्चन्द्रकी कान्तिको मलिन करनेवाली स्वच्छ मुक्तामालाको अपने सुविशाल मौलिपर धारण करनेवाले, कोटि सूर्यकी-सी आभावाले, सदाचारसे पवित्र, करकमलोंमें विचित्र धनुष-बाण धारण करनेवाले एवं अपने प्रचण्ड भुजदण्डसे रावणरूपी महागजका वध करनेवाले हे दयामय श्रीरघुनन्दन! अपने भजनेवाले मुझको आप अपने चरणकमलोंकी दासता दीजिये
जिसमें दोषरूपी हजारों हिंसक सर्प हैं, क्रोधरूपी बड़वानलकी ज्वालाएँ उठ रही हैं, जन्म-जरा-मरणरूपिणी तरंगावली है तथा मद और कामरूपी मगरमच्छ और भँवर हैं, ऐसे इस दुःखमय भवसागरमें चिरकालसे पड़े हुए मुझको, हे राम! कृपया अब निकालिये; और हे दयामय रघुनन्दन! अपने भजनेवाले मुझको आप अपने चरणकमलोंकी दासता दीजिये
तृषा और क्षुधा जिसके तीक्ष्ण दाँत हैं, ऐसा संसाररूपी एक उन्मत्त हाथी है। उसकी यमरूपी सूँड़से झटकोंमें पड़े हुए तथा रज, तम, उन्माद और मोहरूप चारों पगोंसे कुचले हुए अति आर्त, दीन, अनन्यशरण मुझ मूढ़को शीघ्र ही छुड़ाइये; और हे दयामय रघुनन्दन! अपने भजनेवाले मुझको अपने चरणकमलोंकी दासता दीजिये
जिसका हृदय-कमल सैकड़ों जन्मोंके संचित पापोंसे युक्त है, जो पशुतुल्य पतित हो गया है, उस अति मतिमन्द मुझपर हे महारणधीर रघुवीर! कृपा कीजिये। आप ही मेरे माता, पिता और भगिनी हैं तथा हे कृपालो! आप ही मेरे रक्षक हैं। हे दयामय रघुनन्दन! अपना भजन करनेवाले मुझको अपने चरणकमलोंकी दासता दीजिये
हे मेरे स्वामी राम! गलेमें कमलपुष्पोंकी माला धारण करनेवाले आप-सदृश अतिशय उदार दीनवत्सल और दयामय प्रभुको छोड़कर मैं और किस अनामय पुरुषकी शरण लूँ ? अतः मैंने तो आपके ही चरणकमलोंका आसरा लिया है। हे सीताजीके सहित राम! आप प्रसन्न होकर मेरी सर्वदा रक्षा कीजिये और हे दयामय भगवान् रघुनन्दन! आपका भजन करनेवाले मुझको अपने चरणकमलोंकी दासता दीजिये
जो करुणारूप अमृतके समुद्र हैं, अनाथोंके उत्तम बन्धु हैं, अजन्मा और उत्तम कर्मा हैं, भक्तोंको भयरूप तरंगावलिसे पूर्ण संसारसागरसे पार करनेके लिये नौकारूप हैं और सरयू नदीके तीरपर सुन्दर लीलाएँ करनेवाले हैं, उन रघुश्रेष्ठके इस अष्टकका, जो सर्वदा सब अनिष्टोंको दूर करनेवाला है, जो पुरुष पाठ करता है, वह अमर हो जाता है और अविनाशी भगवान् रामके चरणकमलोंकी दासता प्राप्त करता है
इति श्रीमन्मधुसूदनाश्रमशिष्याच्युतयतिविरचितं श्रीसीतारामाष्टकं सम्पूर्णम्।
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