SANATANI
Adi Shankaracharya · Stotra · 7 verses
हे विष्णुभगवान्! मेरी उद्दण्डता दूर कीजिये, मेरे मनका दमन कीजिये और विषयोंकी मृगतृष्णाको शान्त कर दीजिये, प्राणियोंके प्रति मेरा दयाभाव बढ़ाइये और इस संसार-समुद्रसे मुझे पार लगाइये।
भगवान् लक्ष्मीपतिके उन चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ, जिनका मकरन्द गंगा और सौरभ सच्चिदानन्द है तथा जो संसारके भय और खेदका छेदन करनेवाले हैं।
हे नाथ! [मुझमें और आपमें] भेद न होनेपर भी, मैं ही आपका हूँ, आप मेरे नहीं; क्योंकि तरंग ही समुद्रकी होती है, तरंगका समुद्र कहीं नहीं होता।
हे गोवर्धनधारिन्! हे इन्द्रके अनुज (वामन)! हे राक्षसकुलके शत्रु! हे सूर्य-चन्द्ररूपी नेत्रवाले! आप-जैसे प्रभुके दर्शन होनेपर क्या संसारके प्रति उपेक्षा नहीं हो जाती? [अपितु अवश्य ही हो जाती है]।
हे परमेश्वर! मत्स्यादि अवतारोंसे अवतरित होकर पृथ्वीकी सर्वदा रक्षा करनेवाले आपके द्वारा संसारके त्रिविध तापोंसे भयभीत हुआ मैं रक्षा करनेके योग्य हूँ।
हे गुणमन्दिर दामोदर! हे मनोहर मुखारविन्द गोविन्द! हे संसारसमुद्रका मन्थन करनेके लिये मन्दराचलरूप! मेरे महान् भयको आप दूर कीजिये।
हे करुणामय नारायण! मैं सब प्रकारसे आपके चरणोंकी शरण लूँ। यह पूर्वोक्त षट्पदी (छ: पदोंकी स्तुतिरूपिणी भ्रमरी) सर्वदा मेरे मुख-कमलमें निवास करे।
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं षट्पदीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।
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