SANATANI
Traditional · Stotra · 15 verses
जो कुन्दके फूल, चन्द्रमा, बर्फ और हारके समान श्वेत हैं, जो शुभ्र कपड़े पहनती हैं, जिनके हाथ उत्तम वीणासे सुशोभित हैं, जो श्वेत कमलासनपर बैठती हैं, ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देव जिनकी सदा स्तुति करते हैं और जो सब प्रकारकी जड़ता हर लेती हैं, वे भगवती सरस्वती मेरा पालन करें
हे कमलपर बैठनेवाली सुन्दरी सरस्वति! तुम सब दिशाओंमें पुंजीभूत हुई अपनी देहलताकी आभासे ही क्षीर-समुद्रको दास बनानेवाली और मन्द मुसकानसे शरद्-ऋतुके चन्द्रमाको तिरस्कृत करनेवाली हो, तुमको मैं प्रणाम करता हूँ
शरत्कालमें उत्पन्न कमलके समान मुखवाली और सब मनोरथोंको देनेवाली शारदा सब सम्पत्तियोंके साथ मेरे मुखमें सदा निवास करें
उन वचनकी अधिष्ठात्री देवी सरस्वतीको प्रणाम करता हूँ जिनकी कृपासे मनुष्य देवता बन जाता है
बुद्धिरूपी सोनेके लिये कसौटीके समान सरस्वतीजी, जो केवल वचनसे ही विद्वान् और मूर्खोंकी परीक्षा कर देती हैं, हमलोगोंका पालन करें
जिनका रूप श्वेत है, जो ब्रह्मविचारकी परम तत्त्व हैं, जो सब संसारमें फैल रही हैं, जो हाथोंमें वीणा और पुस्तक धारण किये रहती हैं, अभय देती हैं, मूर्खतारूपी अन्धकारको दूर करती हैं, हाथमें स्फटिकमणिकी माला लिये रहती हैं, कमलके आसनपर विराजमान होती हैं और बुद्धि देनेवाली हैं, उन आद्या परमेश्वरी भगवती सरस्वतीकी वन्दना करता हूँ
हे वीणा धारण करनेवाली, अपार मंगल देनेवाली, भक्तोंके दुःख छुड़ानेवाली, ब्रह्मा, विष्णु और शिवसे वन्दित होनेवाली, कीर्ति तथा मनोरथ देनेवाली, पूज्यवरा और विद्या देनेवाली सरस्वति! तुमको नित्य प्रणाम करता हूँ
हे श्वेत कमलोंसे भरे हुए निर्मल आसनपर विराजनेवाली, श्वेत वस्त्रोंसे ढके सुन्दर शरीरवाली, खुले हुए सुन्दर श्वेत कमलके समान मंजुल मुखवाली और विद्या देनेवाली सरस्वति! तुमको नित्य प्रणाम करता हूँ!
हे मातः! जो (मनुष्य) तुम्हारे चरण-कमलोंमें भक्ति रखकर और सब देवताओंको छोड़कर तुम्हारा भजन करते हैं, वे पृथ्वी, अग्नि, वायु, आकाश और जल—इन पाँच तत्त्वोंके बने शरीरसे ही देवता बन जाते हैं
हे उदार बुद्धिवाली माँ! मोहरूपी अन्धकारसे भरे मेरे हृदयमें सदा निवास करो और अपने सब अंगोंकी निर्मल कान्तिसे मेरे मनके अन्धकारका शीघ्र नाश करो
हे देवि! तुम्हारे ही प्रभावसे ब्रह्मा जगत्को बनाते हैं, विष्णु पालते हैं और शिव विनाश करते हैं; हे प्रकट प्रभावशाली! यदि इन तीनोंपर तुम्हारी कृपा न हो, तो वे किसी प्रकार अपना काम नहीं कर सकते
हे सरस्वति! लक्ष्मी, मेधा, धरा, पुष्टि, गौरी, तुष्टि, प्रभा, धृति—इन आठ मूर्तियोंसे मेरी रक्षा करो
सरस्वतीको नित्य नमस्कार है, भद्रकालीको नमस्कार है और वेद, वेदान्त, वेदांग तथा विद्याओंके स्थानोंको प्रणाम है
हे महाभाग्यवती ज्ञानस्वरूपा कमलके समान विशाल नेत्रवाली, ज्ञानदात्री सरस्वति! मुझको विद्या दो, मैं तुमको प्रणाम करता हूँ
हे देवि! जो अक्षर, पद अथवा मात्रा छूट गयी हो, उसके लिये क्षमा करो और हे परमेश्वरि! प्रसन्न रहो
इति श्रीसरस्वतीस्तोत्रं सम्पूर्णम्।
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