SANATANI
Yamunacharya · Stotra · 9 verses
जो नील मेघके समान श्याम वर्ण हैं, जिनके कमलके समान विशाल नेत्र हैं, जो बन्धूक पुष्पके समान अरुण ओष्ठ, हस्त और चरणोंसे शोभित हैं, जो सीताजीके साथ विराजमान एवं अभ्युदयशील हैं, जिन्होंने धनुष-बाणको धारण किया है, जिनका वेष बड़ा ही सुन्दर है, सीताजीके सहित उन श्रीरामको मैं सिरसे नमस्कार करता हूँ
जो प्रौढ़ मेघके समान धीर-गम्भीर, टंकार-ध्वनि करनेवाले धनुषको धारणकर और अपने वेगसे वायुका भी मान-मर्दन करनेवाले एक बाणको तूणीर (तरकस) से खींचकर ‘मत डरो’ ऐसा कहते हुए अपने आश्रितोंको अभय-वचन देनेवाले हैं तथा जिन्होंने रणमें दानवराज (रावण) को मारा है, लक्ष्मणके सहित वे श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे सब प्रकार सहायक हैं
जो राजा दशरथके कुलके दीपक (प्रकाशक) हैं, जिनके बाहुबलका प्रताप मापा नहीं जा सकता, जो रावणके ऊपर कोप करनेवाले, समस्त पापको दूर करनेवाले, असुरोंको ताप देनेवाले और अनेक राजाओंको आनन्द प्रदान करनेवाले हैं, अज्ञान और पापसे रहित वे श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे सहायक हैं
जो कमल-पत्रके समान श्यामवर्ण, मेरी इष्ट वस्तुओंके दाता, मुनिजनोंकी रक्षा करनेवाले और राक्षसोंको एकमात्र मारनेवाले हैं, जो [अपने] राम-नामके उच्चारणमात्रसे ही पुरुषोंके पापका नाश करनेवाले हैं, समस्त देवताओं और राजाओंके स्वामी वे श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे सहायक हैं
जो असुरकुल [को भस्म करने] के लिये अग्नि हैं, देवता और मनुष्यके समूहोंके हृदय-कमलको विकसित करनेके लिये सूर्य हैं, असंख्य गुणोंकी सीमा हैं, नील मेघ-मण्डलीके समान जिनका श्याम शरीर है और जो शममें मुनीश्वरोंको भी जीतनेवाले हैं, वे रघुकुलके अग्रणी श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे सहायक हैं
जिन्होंने लक्ष्मणको साथ लेकर विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षा की है और वायुवेगवाले बाणोंके समूहसे मारीच निशाचरकी मायाका नाश किया है, जो शिवजीके धनुषका भंजन करनेवाले तथा पृथ्वीकी पुत्री (सीता) के नयनकुमुदको विकसित करनेके लिये चन्द्रमाके समान हैं, वे श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे सहायक हैं
जो हनुमान्जीके हाथोंपर अपने चरण-कमलोंको रखे हुए हैं, जिन्होंने अगस्त्य ऋषिके कहनेसे इन्द्रधनुषको ग्रहण किया, जिनका तूणीर (तरकस) असंख्य बाणोंसे परिपूर्ण है, जो रणधीर हैं और जिन्होंने अति शीघ्रतासे वानरराज बालीको मार गिराया, वे श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे सहायक हैं
जो सुवर्णके समान निर्मल और गौर कान्तिवाली सीताके सम्पर्कमें रहते हैं, ऋषियों और मनुष्योंने भी जिन्हें श्रेष्ठ एवं आदरणीय माना है, जो सम्पूर्ण वागीश्वरोंके वन्दनीय तथा अपने भक्त-समुदायकी बन्धुके समान रक्षा करनेवाले हैं, जिन्होंने लीलासे ही समुद्रपर पुल बाँध दिया था, वे देवता, मनुष्य तथा वानरोंके स्वामी श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे सहायक हैं
जो पुरुष यामुनाचार्यके द्वारा रचित इस दिव्य तथा कल्याणदायक श्रीरामप्रेमाष्टक-स्तोत्रका शुद्धभावसे पाठ करता है, वह श्रीरामचन्द्रजीके सन्निकट निवास प्राप्त करता है
इति श्रीयामुनाचार्यकृतं श्रीरामप्रेमाष्टकं सम्पूर्णम्।
More scriptures