SANATANI
Krishnalal Dvija · Stotra · 2 verses
(पञ्चमस्वरमेकतालं भजनम्, विहागरागेण गीयते)
मामुद्धर ते श्रीकरलालितचरणकमलपरिधौ लग्नम्॥ (ध्रुवपदम्)
हे परमसखे! श्रीकृष्ण! हे अच्युत! श्रीलक्ष्मीजीके करकमलोंद्वारा सेवित आपके चरणारविन्दोंकी शरणमें आये हुए एवं भयंकर भवसागरमें डूबते हुए मेरा उद्धार कीजिये। त्रिगुणमयी मायारूपिणी मृगतृष्णासे जिसकी बुद्धि चंचल हो रही है, जिसकी दसों इन्द्रियाँ विषयभोगोंके लिये उत्कण्ठित रहा करती हैं, जो दुष्ट मनुष्योंद्वारा अपमानित हो चुका है, अपनी बुद्धि मारी जानेके कारण जिसने भगवान्की शरण छोड़ गुणोंकी शरण ली है; उस सदा भयभीत मनवाले, कामादि छः शत्रुओंके जालमें फँसकर सबकी खुशामद करनेवाले, कालिन्दीके प्राणनाथ आप (श्रीकृष्ण) के चरणारविन्दपरागसे शून्य, मनके शोक और बुद्धिके भ्रमको नाश करनेके लिये अजन्मा आपके मुखकमलके दर्शनाभिलाषी तथा लक्ष्मीजीके करकमलोंद्वारा सेवित आपके चरणकमलोंकी शरणमें आये हुए मेरा आप उद्धार कीजिये
कालिन्दी, रुक्मिणी, राधा, सत्यभामा और जाम्बवतीके सुहृद्, अपने शरणागत भक्तजनोंपर कृपा करके उन्हें भव-भयसे मुक्त करनेवाला वर देनेवाले, गोपबालाओंके प्रियतम, रासके अधिनायक, गोवर्धनधारी, मधुसूदन, सर्वेश्वर, अत्यन्त कमनीय गुणोंके आश्रय, आपको मैं नमस्कार करता हूँ, हे मन! तू सर्वदा कृष्णलालद्विजके स्वामी यज्ञेश्वर कृष्णका भजन कर; हे परमसखे! लक्ष्मीजीके करकमलोंद्वारा सेवित आपके चरणारविन्दोंकी शरणमें आये हुए मेरा उद्धार कीजिये
इति श्रीकृष्णलालद्विजविरचितायां गीताभजनसप्तशत्यां प्रपन्नगीतं सम्पूर्णम्।
More scriptures