SANATANI
Shri Kuresha Swami · Ashtakam · 8 verses
अति वात्सल्यमय होनेके कारण, भयभीतोंको अभयदान देनेका स्वभाव होनेके कारण, दुःखी पुरुषोंका दुःख हरनेके कारण, अति उदार और पापनाशक होनेके कारण और अन्य अगणित कल्याणमय पदों (श्रेयों) की प्राप्ति करा देनेके कारण सारे जगत्के लिये भगवान् लक्ष्मीपति ही सेवनीय हैं; क्योंकि प्रह्लाद, विभीषण, गजराज, द्रौपदी, अहल्या और ध्रुव—ये (क्रमसे) इन कार्योंमें साक्षी हैं
‘अरे प्रह्लाद! यदि तू कहता है कि ईश्वर सर्वत्र है तो मुझे खम्भेमें दिखा’—दैत्य हिरण्यकशिपुके ऐसा कहते ही वहाँ भगवान् आविर्भूत हो गये और अपने नखोंसे उसके वक्षःस्थलको विदीर्ण करके अपना वात्सल्य प्रकट किया। ऐसे दीनरक्षक भगवान् नारायण ही मेरी एकमात्र गति हैं
‘हे श्रीरामजी! यह निष्पाप विभीषण राक्षस रावणके भयसे आया है—यह सुनते ही सुग्रीव! उस पुलस्त्य-ऋषिके पौत्रको तुरंत ले आओ और उसकी रक्षा करो’—ऐसा कहकर जैसा अभयदान श्रीरघुनाथजीने उसे दिया वह सबको विदित ही है; वे ही दीनरक्षक भगवान् नारायण मेरी एकमात्र गति हैं
ग्राहद्वारा पाँव पकड़ लिये जानेपर सूँड़ उठाकर ‘हे ब्रह्मा आदि देवगण! मेरी रक्षा करो।’—इस प्रकार दीनवाणीसे पुकारते हुए गजेन्द्रकी रक्षामें देवताओंको असमर्थ देखकर ‘मत डर’ ऐसा कहकर जिन श्रीधरने ग्राहका वध करनेके लिये सुदर्शनचक्र उठा लिया, वे ही दीनरक्षक भगवान् नारायण मेरी एकमात्र गति हैं
‘हे कृष्ण! हे अच्युत! हे कृपालो! हे हरे! हे पाण्डवसखे! तुम कहाँ हो ? कहाँ हो? दुर्योधनद्वारा लूटी गयी मुझ आतुराकी रक्षा करो! रक्षा करो!!’—इस प्रकार प्रार्थना करनेपर जिसने अक्षयवस्त्रसे द्रौपदीका शरीर ढककर उसकी रक्षा की, वह दुःखियोंका उद्धार करनेमें तत्पर भगवान् नारायण मेरी गति हैं
जिनके चरणकमलोंके नखोंकी धोवन श्रीगंगाजी त्रिलोकीके पापसमूहको ध्वंस करनेवाली हैं, जिनका नामामृतसमूह पान करनेवालोंको संसारसागरसे पार करनेवाला है तथा जिनके पादपद्मोंकी रजसे पाषाण भी मुनिशापसे मुक्त हो गया, वे दीनरक्षक भगवान् नारायण ही मेरी एकमात्र गति हैं
अपने भाईको पिताके साथ उत्तम राजसिंहासनपर बैठा देख उत्तानपादके पुत्र ध्रुवने जब स्वयं ही उसपर चढ़ना चाहा तो पिताने उसे अंकमें नहीं लिया और विमाताने भी उसका अनादर किया, उस समय जिनकी शरण जाकर उसने तपके द्वारा सुमेरुगिरिके राजसिंहासनकी प्राप्ति की, वे ही दीनरक्षक भगवान् नारायण मेरी एकमात्र गति हैं
जो पीड़ित हैं, विषादयुक्त हैं, शिथिल (निराश) हैं, भयभीत हैं अथवा किसी भी घोर आपत्तिमें पड़े हुए हैं, वे ‘नारायण’ शब्दके संकीर्तनमात्रसे दुःखसे मुक्त होकर सुखी हो जाते हैं
इति श्रीकूरेशस्वामिविरचितं श्रीनारायणाष्टकं सम्पूर्णम्।
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