SANATANI
Vallabhacharya · Stotra · 8 verses
जिनके हृदयमें वनमाला है, नेत्र बड़े-बड़े हैं, जो शोकहारी, वृन्दावनके चन्द्रमा, परमानन्दमय और पृथ्वीको धारण करनेवाले हैं, जो सबके प्रिय, मेघके समान श्यामल, पूर्णकाम, अत्यन्त सुन्दर और प्रेम करनेवाले हैं; उन समस्त सुखोंके सारभूत, परब्रह्मस्वरूप, नन्दनन्दन मनमोहन, गोपाल श्रीकृष्णको तत्त्वरूप जानकर भजो
जिनका सुन्दर कमलके समान मुख है, जो अपनी कान्तिसे कामदेवको भी जीत चुके हैं, जो आनन्दके आगार, मुकुटधारी, गुंजाकी माला पहननेवाले, वृन्दावनविहारी परम उदार और गोपियोंके चीर हरण करनेवाले हैं, जिनको पीताम्बर प्रिय है, जो सुन्दर यज्ञोपवीत धारण किये हुए और हाथमें माखन लिये हुए हैं, उन समस्त सुखोंके सारभूत, परब्रह्मस्वरूप, देवेश्वर नन्दनन्दन, श्रीकृष्णको तत्त्वरूप जानकर भजो
जो यमुनातटपर मुँहमें धूल लपेटे शोभा पा रहे हैं, जिनकी कहीं तुलना नहीं है, जो परम सुखद हैं, जो धूलिधूसरित-मुख हो, धेनु चराते और मधुर स्वरसे वेणु बजाते हैं, जो सबके प्रिय तथा अत्यन्त विमल हैं, जिनके चरणकमल सुन्दर हैं, नखोंकी कान्ति निर्मल है, जो अज्ञानान्धकारको दूर करते हैं, उन समस्त सुखोंके सारभूत, परब्रह्मस्वरूप, नन्दनन्दन श्रीकृष्णको तत्त्वरूप जानकर भजो
जिनके सुन्दर मस्तकपर मुकुट है, बाल घुँघराले हैं, नटवर वेष है, जो कामसे भी अधिक सुन्दर हैं, मायासे मनुष्य-अवतार धारण करते हैं, बलरामजीके छोटे भाई हैं, दानवोंको मारकर पृथ्वीका भार हरण करते हैं; जो व्रजके रक्षक, प्रियतम, सुन्दर गतिशील, प्रतिक्षण हित चाहनेवाले और उत्तम भाववाले हैं; उन सब सुखोंके सारभूत परब्रह्मस्वरूप, नन्दनन्दन श्रीकृष्णको तत्त्वरूप जानकर भजो
जिनकी नीलकमलके समान कान्ति है, जिन्होंने पवित्र रास-रसको प्रकट किया है, जो कुसुमोंके समान विकसित रहते हैं, वंशी धारण करते हैं; जिन्होंने कन्दर्पके दर्पको चूर कर दिया है, जो रूपकी राशि हैं, मधुर गायनके द्वारा मन मोह लेते हैं, जिनका मधुर हास प्रिय लगता है, जो निकुंजोंमें रहकर नाना प्रकारकी लीलाएँ किया करते हैं, उन सब सुखोंके सारभूत, परब्रह्मस्वरूप, नन्दनन्दन श्रीकृष्णको तत्त्वरूप जानकर भजो
जो परम प्रवीण हैं, दीनोंके पालक और भक्तोंके अधीन कर्म करनेवाले, जो अत्यन्त धीर मनमोहन, शेषके अवतार बलभद्ररूप, शत्रुवीरोंके नाशक, अतिशय चपल, प्रेममय व्रजमें रमनेवाले, कमल-वदन गोवर्धनधारी और हलधरजीको शान्त करनेवाले हैं; उन सब सुखोंके सारभूत, परब्रह्मस्वरूप, नन्दनन्दन श्रीकृष्णको तत्त्वरूप जानकर भजो
जिनके अंगकी कान्ति मेघके सदृश श्याम है, उसमें ललित त्रिभंग शोभा पाता है, जो नाना रंगोंमें रहते हैं, परम रसिक हैं, गोकुल ही जिनका परिवार है, मदनके समान सुन्दर आकृति है, जो कुंजमें विहार करते हैं, सर्वत्र अत्यन्त गूढ़भावसे छिपे हैं, जो प्यारे व्रजचन्द्र, बड़भागी और दिव्य लीलामय हैं, सदा आनन्द करनेवाले और भ्रान्तिको भगानेवाले हैं, उन सब सुखोंके सारभूत, परब्रह्मस्वरूप, नन्दनन्दन श्रीकृष्णको तत्त्वरूप जानकर भजो
जिनके दोनों चरण (भक्तोंद्वारा) वन्दित हैं, जो सबको पवित्र करते हैं और जगत्का उद्धार करनेवाले हैं, निर्मल भक्तोंको हृदयमें धारण करनेवाले तथा कालियनागके मस्तकपर नृत्य करनेवाले हैं, जिनकी शेषनाग भी स्तुति करते हैं, जो कालयवनके घातक और अति कोमल हैं, जो अपने प्रियजनोंके शोकहारी, निर्मल चरणोंवाले, अशरणोंकी शरण और मोक्ष देनेवाले हैं, उन सब सुखोंके सारभूत, परब्रह्मस्वरूप, नन्दनन्दन श्रीकृष्णका तत्त्वरूपसे भजन करो
इति श्रीमहाप्रभुवल्लभाचार्यविरचितं श्रीनन्दकुमाराष्टकं सम्पूर्णम्।
More scriptures