SANATANI
Adi Shankaracharya · Stotra · 13 verses
हे अति शोभायमान क्षीरसमुद्रमें निवास करनेवाले, हाथमें चक्र धारण करनेवाले, नागनाथ (शेषजी) के फणोंकी मणियोंसे देदीप्यमान मनोहर मूर्तिवाले! हे योगीश! हे सनातन! हे शरणागतवत्सल! हे संसारसागरके लिये नौकास्वरूप! श्रीलक्ष्मीनृसिंह! मुझे अपने करकमलका सहारा दीजिये
आपके अमल चरणकमल ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, मरुत् और सूर्य आदिके किरीटोंकी कोटियोंके समूहसे अति देदीप्यमान हो रहे हैं। हे श्रीलक्ष्मीजीके कुचकमलके राजहंस श्रीलक्ष्मीनृसिंह! मुझे अपने करकमलका सहारा दीजिये
हे मुरारे! संसाररूप गहन वनमें विचरते हुए कामदेवरूप अति उग्र और भयानक मृगराजसे पीड़ित तथा मत्सररूप घामसे सन्तप्त अति आर्तको हे लक्ष्मीनृसिंह! अपने करकमलका सहारा दीजिये
संसाररूप अति भयानक और अगाध कूपके मूलमें पहुँचकर जो सैकड़ों प्रकारके दुःखरूप सर्पोंसे व्याकुल और अत्यन्त दीन हो रहा है, उस अति कृपण और आपत्तिग्रस्त मुझको हे लक्ष्मीनृसिंहदेव! अपने करकमलका सहारा दीजिये
संसारसागरमें अति कराल और महान् कालरूप नक्रों और ग्राहोंके ग्रसनेसे जिसका शरीर निगृहीत हो रहा है तथा आसक्ति और रसनारूप तरंगमालासे जो अति पीड़ित है, ऐसे मुझको हे लक्ष्मीनृसिंह! अपने करकमलका सहारा दीजिये
हे दयालो! पाप जिसका बीज है, अनन्त कर्म सैकड़ों शाखाएँ हैं, इन्द्रियाँ पत्ते हैं, कामदेव पुष्प है तथा दुःख ही जिसका फल है, ऐसे संसाररूप वृक्षपर चढ़कर मैं नीचे गिर रहा हूँ, ऐसे मुझको हे लक्ष्मीनृसिंह! अपने करकमलका सहारा दीजिये
इस संसारसर्पके विकट मुखकी भयरूप उग्र दाढ़ोंके कराल विषसे दग्ध होकर नष्ट हुए मुझको हे गरुडवाहन, क्षीरसागरशायी, शौरि श्रीलक्ष्मीनृसिंह! आप अपने करकमलका सहारा दीजिये
संसाररूप दावानलके दाहसे अति आतुर और उसकी भयंकर तथा विशाल ज्वाला-मालाओंसे जिसके रोम-रोम दग्ध हो रहे हैं तथा जिसने आपके चरण-कमलरूप सरोवरकी शरण ली है, ऐसे मुझको हे लक्ष्मीनृसिंह! अपने करकमलका सहारा दीजिये
हे जगन्निवास! सकल इन्द्रियोंके विषयरूप बंसी [उसमें फँसने] के लिये मत्स्यके समान संसारपाशमें पड़कर जिसके तालु और मस्तक खण्डित हो गये हैं, ऐसे मुझको हे लक्ष्मीनृसिंह! अपने करकमलका सहारा दीजिये
हे सकलार्तिनाशन! संसाररूप भयानक गजराजकी सूँड़के आघातसे जिसके मर्मस्थान कुचल गये हैं तथा जो प्राणप्रयाणके सदृश संसार (जन्म-मरण)के भयसे अति व्याकुल है, ऐसे मुझको हे लक्ष्मीनृसिंह! अपने करकमलका सहारा दीजिये
हे प्रभो! इन्द्रिय नामक प्रबल चोरोंने जिसके विवेकरूप परम धनको हर लिया है तथा मोहरूप अन्धकूपके गड्ढेमें जो गिरा दिया गया है, ऐसे मुझ अन्धको हे लक्ष्मीनृसिंह! आप अपने करकमलका सहारा दीजिये
हे लक्ष्मीपते! हे कमलनाभ! हे देवेश्वर! हे विष्णो! हे वैकुण्ठ! हे कृष्ण! हे मधुसूदन! हे कमलनयन! हे ब्रह्मण्य! हे केशव! हे जनार्दन! हे वासुदेव! हे देवेश! मुझ दीनको आप अपने करकमलका सहारा दीजिये
जिसका स्वरूप मायासे ही प्रकट हुआ है उस प्रचुर संसारप्रवाहमें डूबे हुए पुरुषोंके लिये जो इस लोकमें अति बलवान् करावलम्बरूप है ऐसा यह सुखप्रद स्तोत्र इस पृथ्वीतलपर लक्ष्मीनृसिंहके चरणकमलके लिये मधुकररूप शंकर (शंकराचार्यजी) ने रचा है
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं श्रीलक्ष्मीनृसिंहस्तोत्रं सम्पूर्णम्।
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