SANATANI
Krishnalalji Dvija · Stotra · 5 verses
श्रीकृष्ण एव शरणं मम श्रीकृष्ण एव शरणम्॥ (ध्रुवपदम्)
मेरे लिये श्रीकृष्ण ही शरण है, एकमात्र कृष्ण ही शरण है। जहाँ यह त्रिगुणमयी माया और जन्म-मृत्यु नहीं हैं तथा योगीलोग समाधिमें जिस आनन्दमयका यहीं दर्शन करते हैं
जिनकी प्राप्तिके लिये विद्वान् लोग संसारमें अनेक धर्माचरण करते हैं और जिन्होंने सभी आपत्तियोंसे महात्माओंका उद्धार किया है
जो भगवान्में सद्बुद्धि रखनेवालोंके हृदयका अज्ञानान्धकार नष्ट कर देते हैं और भगवद्भक्तजन गुरुचरणोंकी सेवा करके जिनका सदा भजन करते हैं
असुरोंके विनाशके लिये देवताओंने जिनका सदा आदर किया है और जो अनेक विषयरूपी पत्रोंवाले इस संसार-वृक्षको धारण किये हुए हैं
जिनको प्राप्त करके भगवद्भक्त फिर आवागमनके चक्रमें नहीं फँसते, उन्हींकी पापनाशक स्मृति कृष्णलालजी द्विजके हृदयमें बनी रहे
इति श्रीकृष्णलालजीद्विजविरचितं ‘श्रीकृष्णः शरणं मम’ नामकं स्तोत्रं समाप्तम्।
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