SANATANI
Adi Shankaracharya · Stotra · 9 verses
जो सत्य, ज्ञानस्वरूप, अनन्त एवं नित्य हैं, आकाशसे भिन्न होनेपर भी परम आकाशस्वरूप हैं, जो व्रजके प्रांगणमें चलते हुए चपल हो रहे हैं, परिश्रमसे रहित होकर भी बहुत थके-से हो जाते हैं, आकारहीन होनेपर भी मायानिर्मित नाना स्वरूप धारण किये विश्वरूपसे प्रकट हैं और पृथ्वीनाथ होकर भी अनाथ (बिना स्वामीके) हैं, उन परमानन्दमय गोविन्दकी वन्दना करो
‘क्या तू यहाँ मिट्टी खा रहा है?’ यह पूछती हुई यशोदाद्वारा मारे जानेका जिन्हें शैशवकालोचित भय हो रहा है, मिट्टी न खानेका प्रमाण देनेके लिये जो मुँह फैलाकर उसमें लोकालोक पर्वतसहित चौदह भुवन दिखला देते हैं, त्रिभुवनरूपी नगरके जो आधारस्तम्भ हैं, आलोकसे परे (अर्थात् दर्शनातीत) होनेपर भी जो विश्वके आलोक (प्रकाश)हैं, उन परमानन्दस्वरूप, लोकनाथ, परमेश्वर गोविन्दको नमस्कार करो
जो दैत्यवीरोंके नाशक, पृथ्वीका भार हरनेवाले और संसाररोगको मिटा देनेवाले कैवल्य (मोक्ष) पद हैं, आहाररहित होकर भी नवनीतभोजी एवं विश्वभक्षी हैं, आभाससे पृथक् होनेपर भी मलरहित होनेके कारण स्वच्छ चित्तकी वृत्तिमें जिनका विशेषरूपसे आभास मिलता है, जो अद्वितीय, शान्त एवं कल्याणस्वरूप हैं, उन परमानन्दमय गोविन्दको प्रणाम करो
जो गौओंके पालक हैं, जिन्होंने पृथ्वीपर लीला करनेके निमित्त गोपाल-शरीर धारण किया है, जो वंशद्वारा भी गोपाल (ग्वाला) हो चुके हैं, गोपियोंके साथ खेल करते हुए गोवर्धनधारणकी लीलासे जिन्होंने गोपजनोंका पालन किया था, गौओंने स्पष्टरूपसे जिनका गोविन्द नाम बतलाया था, जिनके अनेकों नाम हैं, उन गोप तथा गोचर (इन्द्रियोंके विषय) से पृथक् रहनेवाले परमानन्दरूप गोविन्दको प्रणाम करो
जो गोपीजनोंकी गोष्ठीके भीतर प्रवेश करनेवाले हैं, भेदावस्थामें रहकर भी अभिन्न भासित होते हैं, जिन्हें सदा गायोंके खुरसे ऊपर उड़ी हुई धूलिद्वारा धूसरित होनेका सौभाग्य प्राप्त है, जो श्रद्धा और भक्ति रखनेसे आनन्दित होते हैं, अचिन्त्य होनेपर भी जिनके सद्भावका चिन्तन किया गया है, उन चिन्तामणिके समान महिमावाले परमानन्दमय गोविन्दकी वन्दना करो
स्नानमें व्यग्र हुई गोपांगनाओंके वस्त्र लेकर जो वृक्षपर चढ़ गये थे और जब उन्होंने वस्त्र लेना चाहा तब देनेके लिये उन्हें पास बुलाने लगे, [ऐसा होनेपर भी] जो शोक-मोह दोनोंको ही मिटानेवाले ज्ञानस्वरूप एवं बुद्धिके भी परवर्ती हैं, सत्तामात्र ही जिनका शरीर है ऐसे परमानन्दस्वरूप गोविन्दको नमस्कार करो
जो कमनीय, कारणोंके भी आदिकारण, अनादि और आभासरहित कालस्वरूप होकर भी यमुनाजलमें रहनेवाले कालियनागके मस्तकपर बारंबार नृत्य कर रहे थे, जो कालरूप होनेपर भी कालकी कलाओंसे अतीत और सर्वज्ञ हैं, जो त्रिकालगतिके कारण और कलियुगीय दोषोंको नष्ट करनेवाले हैं, उन परमानन्दस्वरूप गोविन्दको प्रणाम करो
जो वृन्दावनकी भूमिपर देववृन्द तथा वृन्दा नामकी वनदेवताके आराध्य देव हैं, जिनकी कुन्दके समान निर्मल मन्द मुसकानमें सुधाका आनन्द भरा है, जो मित्रोंके आनन्ददायी हैं उन भगवान्की मैं वन्दना करता हूँ। जिनका आमोदमय चरणयुगल समस्त वन्दनीय महामुनियोंके भी हृदयका वन्दनीय है, उन सम्पूर्ण शुभ गुणोंके सागर परमानन्दमय गोविन्दको नमस्कार करो
जो भगवान् गोविन्दमें अपना चित्त लगा ‘गोविन्द! अच्युत! माधव! विष्णो! गोकुलनायक! कृष्ण!’ इत्यादि उच्चारणपूर्वक उनके चरणकमलोंके ध्यानरूपी सुधासलिलसे अपना समस्त पाप धोकर इस गोविन्दाष्टकका पाठ करता है, वह अपने अन्तःकरणमें विद्यमान परमानन्दामृतरूप गोविन्दको प्राप्त कर लेता है
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीगोविन्दाष्टकं सम्पूर्णम्।
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