SANATANI
Traditional · Stotra · 19 verses
त्रिपुरासुरको जीतनेके लिये शिवने, बलिको छलसे बाँधते समय विष्णुने, जगत्को रचनेके लिये ब्रह्माने, पृथ्वी धारण करनेके लिये शेषनागने, महिषासुरको मारनेके समय पार्वतीने, सिद्धि पानेके लिये सिद्धोंके अधिपतियों (सनकादि ऋषियों) ने और सब संसारको जीतनेके लिये कामदेवने जिन गणेशजीका ध्यान किया है, वे हमलोगोंका पालन करें
विघ्नरूप अन्धकारका नाश करनेवाले एकमात्र सूर्य, विघ्नरूप वनके जलानेवाले अग्नि, विघ्नरूप सर्पकुलका दर्प नष्ट करनेके लिये गरुड, विघ्नरूप हाथीको मारनेवाले सिंह, विघ्नरूप ऊँचे पहाड़के तोड़नेवाले वज्र, विघ्नरूप महासागरके वडवानल, विघ्नरूपी मेघ-समूहको उड़ा देनेवाले प्रचण्ड वायुसदृश गणेशजी हमलोगोंका पालन करें
जो नाटे और मोटे शरीरवाले हैं, जिनका गजराजके समान मुँह और लंबा उदर है, जो सुन्दर हैं तथा बहते हुए मदकी सुगन्धके लोभी भौंरोंके चाटनेसे जिनका गण्डस्थल चपल हो रहा है, दाँतोंकी चोटसे विदीर्ण हुए शत्रुओंके खूनसे जो सिन्दूरकी-सी शोभा धारण करते हैं, कामनाओंके दाता और सिद्धि देनेवाले उन पार्वतीके पुत्र, गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ
विघ्नरूप अन्धकारका नाश करनेवाले, अथाह करुणारूप जलराशिसे तरंगित नेत्रोंवाले, गणेश नामक ज्योतिको नमस्कार है
जो पार्वतीके मुखरूप कमलको प्रकाशित करनेमें सूर्यरूप हैं, जो भक्तोंको अनेक प्रकारके फल देते हैं, उन एक दाँतवाले गणेशजीकी मैं सदैव उपासना करता हूँ
जिनका शरीर श्वेत है, कपड़े श्वेत हैं, श्वेत फूल, चन्दन और रत्नदीपोंसे क्षीरसमुद्रके तटपर जिनकी पूजा हुई है; देवता और मनुष्य जिनको अपना प्रधान पूज्य समझते हैं, जो रत्नके सिंहासनपर बैठे हैं, जिनके हाथोंमें पाश (एक प्रकारकी डोरी), अंकुश और कमलके फूल हैं, जो अभयदान और वरदान देनेवाले हैं, जिनके सिरमें चन्द्रमा रहते हैं और जिनके तीन नेत्र हैं; निर्मल लक्ष्मीके साथ रहनेवाले, उन प्रसन्नप्रभु गणेशजीका अपनी शान्तिके लिये ध्यान करे
जो देवताओंके गणके राजा हैं, लाल कमलके समान जिनके देहकी आभा है, जो सबके वन्दनीय हैं, विघ्नके काल हैं, विघ्नके हरनेवाले हैं, शिवजीके पुत्र हैं; उन गणेशजीका मैं सिद्धिके साथ आवाहन और भजन करता हूँ
जिनको वेदान्ती लोग ब्रह्म कहते हैं और दूसरे लोग परम प्रधान पुरुष अथवा संसारकी सृष्टिके कारण या ईश्वर कहते हैं; उन विघ्नविनाशक गणेशजीको नमस्कार है
हे विघ्नेश! हे गजानन! मागध और वन्दीजनोंके मुखसे गाये जाते हुए अपने विचित्र पराक्रमोंको सुनकर, ब्राह्ममुहूर्तमें उठो और जगत्का कल्याण करो
‘हे गणेश! हे हेरम्ब! हे गजानन! हे लम्बोदर! हे अपने अनुभवसे प्रकाशित होनेवाले! हे श्रेष्ठ! हे सिद्धिके प्रियतम! हे बुद्धिनाथ!’ ऐसा कहते हुए हे मनुष्यो! अपना भय छोड़ दो
‘हे अनेक विघ्नोंका नाश करनेवाले! हे वक्रतुण्ड! गणेश आदि अपने नामवालोंमें भी निवास करनेवाले! हे चतुर्भुज! हे कवियोंके नाथ! हे दैत्योंका नाश करनेवाले!’ ऐसा कहते हुए हे मनुष्यो! अपने भयको भगा दो
जो गणेश अनन्त हैं, चेतनरूप हैं, अभेद और भेद आदिसे रहित और सृष्टिके आदि कारण हैं, अपने हृदयमें जो सदा प्रकाश धारण करते हैं तथा अपनी ही बुद्धिमें स्थित रहते हैं; उन एकदन्त गणेशजीकी शरणमें हम जाते हैं
जो संसारके आदि कारण हैं, योगियोंके हृदयमें अद्वितीय रूपसे साक्षात् प्रकाशित होते हैं और निरालम्ब समाधिके द्वारा ही जानने योग्य हैं, उन एकदन्त गणेशकी शरणमें हम जाते हैं
जिनके बलसे माया समर्थ हुई है और उसके द्वारा यह संसार रचा गया है, उन नागस्वरूप तथा आत्मारूपसे प्रतीत होनेवाले एकदन्त गणेशजीकी शरणमें हम जाते हैं
जो सब लोगोंके अन्तःकरणमें अकेले गूढ़भावसे स्थित रहते हैं, जिनकी आज्ञासे यह जगत् विराजमान है, जो अनन्तरूप हैं और हृदयमें ज्ञान देनेवाले हैं; उन एकदन्त गणेशकी शरणमें हम जाते हैं
जिनको योगीजन योगबलसे साध्य करते (जान पाते) हैं, स्तुतिसे उनका वर्णन कौन कर सकता है ? इसलिये हम उनको केवल प्रणाम करते हैं कि हमें सिद्धि दें; उन प्रसिद्ध एकदन्तकी शरणमें हम जाते हैं
जो इन्द्रके मुकुटमें गुँथे हुए मन्दारपुष्पोंके मकरन्दकणोंसे लाल हो रही है, वह गणेशजीके चरण-कमलोंकी रज विघ्नोंका हरण करे
एक दाँतवाले, बड़े शरीरवाले, स्थूल उदरवाले, हाथीके समान मुखवाले और विघ्नोंका नाश करनेवाले गणेशदेवको मैं प्रणाम करता हूँ
हे देव! जो अक्षर, पद अथवा मात्रा छूट गयी हो, उसके लिये क्षमा करो और हे परमेश्वर! प्रसन्न होओ
इति श्रीगणपतिस्तोत्रं सम्पूर्णम्।
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