SANATANI
Shri Jayadeva · Stotra · 11 verses
हे मीनावतारधारी केशव! हे जगदीश्वर! हे हरे! प्रलयकालमें बढ़े हुए समुद्रजलमें बिना क्लेश नौका चलानेकी लीला करते हुए आपने वेदोंकी रक्षा की थी, आपकी जय हो
हे केशव! पृथ्वीके धारण करनेके चिह्नसे कठोर और अत्यन्त विशाल तुम्हारी पीठपर पृथ्वी स्थित है, ऐसे कच्छपरूपधारी जगत्पति आप हरिकी जय हो
चन्द्रमामें निमग्न हुई कलंकरेखाके समान यह पृथ्वी आपके दाँतकी नोकपर अटकी हुई सुशोभित हो रही है, ऐसे सूकररूपधारी जगत्पति हरि केशवकी जय हो
हिरण्यकशिपुरूपी तुच्छ भृंगको चीर डालनेवाले विचित्र नुकीले नख आपके करकमलमें हैं, ऐसे नृसिंहरूपधारी जगत्पति हरि केशवकी जय हो
हे आश्चर्यमय वामनरूपधारी केशव! आपने पैर बढ़ाकर राजा बलिको छला तथा अपने चरण-नखोंके जलसे लोगोंको पवित्र किया, ऐसे आप जगत्पति हरिकी जय हो
हे केशव! आप जगत्के ताप और पापोंका नाश करते हुए उसे क्षत्रियोंके रुधिररूप जलसे स्नान कराते हैं, ऐसे आप परशुरामरूपधारी जगत्पति हरिकी जय हो
जो युद्धमें सब दिशाओंमें लोकपालोंको प्रसन्न करनेवाली, रावणके सिरकी सुन्दर बलि देते हैं, ऐसे श्रीरामावतारधारी आप जगत्पति भगवान् केशवकी जय हो
जो अपने गौर शरीरमें हलके भयसे आकर मिली हुई यमुना और मेघके सदृश नीलाम्बर धारण किये रहते हैं, ऐसे आप बलरामरूपधारी जगत्पति भगवान् केशवकी जय हो
सदय हृदयसे पशुहत्याकी कठोरता दिखाते हुए यज्ञविधानसम्बन्धी श्रुतियोंकी निन्दा करनेवाले आप बुद्धरूपधारी जगत्पति भगवान् केशवकी जय हो
जो म्लेच्छसमूहका नाश करनेके लिये धूमकेतुके समान अत्यन्त भयंकर तलवार चलाते हैं, ऐसे कल्किरूपधारी आप जगत्पति भगवान् केशवकी जय हो
[हे भक्तो!] इस जयदेव कविकी कही हुई मनोहर, आनन्ददायक, कल्याणमय तत्त्वरूप स्तुतिको सुनो, हे दशावतारधारी! जगत्पति, हरि केशव! आपकी जय हो
इति श्रीजयदेवविरचितं श्रीदशावतारस्तोत्रं सम्पूर्णम्।
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