SANATANI
Lord Brahma · Stotra · 9 verses
ब्रह्माजी बोले—जो सम्पूर्ण प्राणियोंकी स्थितिके कारण, आत्मज्ञानियोंद्वारा हृदयमें ध्यान किये जानेवाले, त्याज्य और ग्राह्यरूप द्वन्द्वसे रहित, सबसे परे, अद्वितीय, सत्तामात्र, सबके हृदयमें विराजमान और साक्षीस्वरूप हैं उन आप भगवान् विष्णुदेवको मैं प्रणाम करता हूँ
मोहहीन संन्यासीगण निश्चित बुद्धिके द्वारा प्राण और अपानको हृदयमें रोककर तथा अपने सम्पूर्ण संशयबन्धन और विषय-वासनाओंका छेदनकर जिस ईश्वरका दर्शन करते हैं, उन रत्नकिरीटधारी, सूर्यके समान तेजस्वी भगवान् रामको मैं प्रणाम करता हूँ
जो मायासे परे, लक्ष्मीके पति, सबके आदिकारण, जगत्के उत्पत्तिस्थान, प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे परे, मोहका नाश करनेवाले, मुनिजनोंसे वन्दनीय, योगियोंसे ध्यान किये जानेयोग्य, योगमार्गके प्रवर्तक, सर्वत्र परिपूर्ण और सम्पूर्ण संसारको आनन्दित करनेवाले हैं, उन परम सुन्दर भगवान् रामको मैं प्रणाम करता हूँ
जो भाव और अभावरूप दोनों प्रकारकी प्रतीतियोंसे रहित हैं तथा जिनके युगलचरणकमलोंका योगपरायण शंकर आदि पूजन करते हैं और जो नित्य, शुद्ध, बुद्ध और अनन्त हैं, सम्पूर्ण दानवोंके लिये दावानलके समान उन ओंकार नामक वीरवर रामको मैं प्रणाम करता हूँ
हे राम! आप मेरे प्रभु हैं और मेरे सम्पूर्ण प्रार्थित कार्योंको पूर्ण करनेवाले हैं, आप देश-कालादि मान (परिमाण) से रहित, नारायणस्वरूप, अखिल विश्वको धारण करनेवाले, भक्तिसे प्राप्य, अपने स्वरूपका ध्यान किये जानेपर संसार-भयको दूर करनेवाले और योगाभ्याससे शुद्ध हुए चित्तमें विहार करनेवाले हैं
आप इस लोक-परम्पराके आदि और अन्त (अर्थात् उत्पत्ति और प्रलयके स्थान) हैं, सम्पूर्ण लोकोंके महेश्वर हैं,आप किसी भी लौकिक प्रमाणसे जाने नहीं जा सकते, आप भक्ति और श्रद्धासम्पन्न पुरुषोंद्वारा भजन किये जानेयोग्य हैं, ऐसे नीलकमलके समान श्यामसुन्दर आप श्रीरामचन्द्रजीको मैं प्रणाम करता हूँ
हे लक्ष्मीपते! आप प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे परे तथा सर्वथा निर्मान हैं। मायामें आसक्त कौन प्राणी आपको जाननेमें समर्थ हो सकता है ? आप अनुपम और महर्षियोंके माननीय हैं तथा (कृष्णावतारके समय) वृन्दावनमें अखिल देवसमूहकी वन्दना करनेवाले और रामरूपसे शिव आदि देवताओंके स्वयं वन्दनीय हैं; ऐसे आप आनन्दघन भगवान् रामको मैं प्रणाम करता हूँ
जो नाना शास्त्र और वेदसमूहसे प्रतिपादित, नित्य आनन्दस्वरूप, निर्विकल्प, ज्ञानस्वरूप और अनादि हैं तथा जिन्होंने मेरा कार्य करनेके लिये मनुष्यरूप धारण किया है उन मरकतमणिके समान नीलवर्ण मथुरानाथ भगवान् रामको प्रणाम करता हूँ
इस पृथ्वीपर जो मनुष्य इच्छित कामनाओंको पूर्ण करनेवाले श्याममूर्ति भगवान् रामका ध्यान करते हुए ब्रह्माजीके कहे हुए इस ब्रह्मज्ञानविधायक आद्य स्तोत्रका श्रद्धापूर्वक पाठ करेगा, वह ध्यानशील पुरुष सम्पूर्ण पापजालसे मुक्त हो जायगा
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे युद्धकाण्डे त्रयोदशसर्गे श्रीब्रह्मदेवकृता श्रीरामस्तुतिः सम्पूर्णा।
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