SANATANI
Adi Shankaracharya · Stotra · 5 verses
हे दयानिधे! हे पशुपते! हे देव! यह रत्ननिर्मित सिंहासन, शीतल जलसे स्नान, नाना रत्नावलिविभूषित दिव्य वस्त्र, कस्तूरिकागन्धसमन्वित चन्दन, जुही, चम्पा और बिल्वपत्रसे रचित पुष्पांजलि तथा धूप और दीप यह सब मानसिक [पूजोपहार] ग्रहण कीजिये
मैंने नवीन रत्नखण्डोंसे सुवर्णपात्रमें खीर, दूध और पाँच प्रकारका व्यञ्जन, , शर्बत, अनेकों शाक, कपूरसे सुवासित और स्वच्छ किया हुआ मीठा जल और —ये सब मनके द्वारा ही बनाकर प्रस्तुत किये हैं; प्रभो! कृपया इन्हें स्वीकार कीजिये
छत्र, दो , पंखा, निर्मल दर्पण, वीणा, भेरी, मृदंग, दुन्दुभीके वाद्य, गान और नृत्य, साष्टांग प्रणाम, नानाविधि स्तुति—ये सब मैं संकल्पसे ही आपको समर्पण करता हूँ; प्रभो! मेरी यह पूजा ग्रहण कीजिये
हे शम्भो! मेरी आत्मा तुम हो, बुद्धि पार्वतीजी हैं, प्राण आपके गण हैं, शरीर आपका मन्दिर है, सम्पूर्ण विषय-भोगकी रचना आपकी पूजा है, निद्रा समाधि है, मेरा चलना-फिरना आपकी परिक्रमा है तथा सम्पूर्ण शब्द आपके स्तोत्र हैं; इस प्रकार मैं जो-जो भी कर्म करता हूँ, वह सब आपकी आराधना ही है
प्रभो! मैंने हाथ, पैर, वाणी, शरीर, कर्म, कर्ण, नेत्र अथवा मनसे जो भी अपराध किये हों; वे हों अथवा , उन सबको आप क्षमा कीजिये। हे करुणासागर श्रीमहादेव शंकर! आपकी जय हो
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचिता शिवमानसपूजा समाप्ता।
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