SANATANI
Bhagavad Gita · Stotra · 7 verses
‘ओम्’ इस एक अक्षररूप ब्रह्मके नामका उच्चारण करता हुआ और ओंकारके अर्थस्वरूप मुझको स्मरण करता हुआ, जो मनुष्य शरीरको छोड़ता (मरता) है, वह परम गतिको प्राप्त हो जाता है
हे हृषीकेश! आपके गुणोंके कीर्तनसे जो जगत् प्रसन्न और प्रेमान्वित हो रहा है, यह उचित ही है, ये राक्षसलोग भयभीत होकर सब दिशाओंमें भाग रहे हैं और सब सिद्धगण आपको नमस्कार कर रहे हैं यह भी युक्त ही है
‘वह’ सब ओर रहनेवाले हाथों और चरणोंसे युक्त है तथा सब ओर रहनेवाले आँखों, सिरों और मुखोंसे युक्त है एवं सब ओर व्यापकरूपसे रहनेवाली श्रवणेन्द्रियोंसे भी युक्त है और समस्त जगत्को व्याप्त कर स्थित है
जो सर्वज्ञ है और सबसे प्राचीन, जगत्का शासन करनेवाला सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म है, सबका धाता (सब प्राणियोंको कर्मानुसार पृथक्-पृथक् फल देनेवाला) है, जिसके रूपका चिन्तन अशक्य है, जो सूर्यके समान प्रकाशमय वर्णवाला है और जो अज्ञानसे अतीत है, उसको जो स्मरण करता है [वह उस परमपुरुषको प्राप्त होता है]
जिसका ऊर्ध्व (ब्रह्म) ही मूल है और नीचे शाखाएँ (अहंकार तन्मात्रा आदि रूपवाली) हैं, ऐसे इस संसाररूप अश्वत्थवृक्षको अव्यय (अविनाशी) कहते हैं, ऋक्, यजु और सामवेद जिसके पत्र हैं; जो संसारवृक्षको इस रूपसे जानता है, वह वेदोंके अर्थोंका जाननेवाला है
मैं सम्पूर्ण प्राणियोंका आत्मा होकर उनके हृदयोंमें प्रविष्ट हूँ, उनके स्मृति, ज्ञान और इन दोनोंका लोप भी मुझसे ही हुआ करते हैं, सम्पूर्ण वेदोंसे मैं ही जाननेयोग्य हूँ और वेदान्तका कर्ता तथा वेदार्थको जाननेवाला भी मैं ही हूँ
तू मेरेमें ही मन लगानेवाला, मेरा ही भक्त, मेरी ही पूजा करनेवाला हो और मुझको ही नमस्कार कर। इस प्रकार चित्तको मुझमें युक्त कर मत्परायण हुआ मुझे ही प्राप्त करेगा
इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सप्तश्लोकी गीता सम्पूर्णा।
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