SANATANI
Narada Purana · Stotra · 8 verses
नारद उवाच
नारदजी बोले—पार्वतीनन्दन देवदेव श्रीगणेशजीको सिर झुकाकर प्रणाम करे और फिर अपनी आयु, कामना और अर्थकी सिद्धिके लिये उन भक्तनिवासका नित्यप्रति स्मरण करे
पहला वक्रतुण्ड (टेढ़े मुखवाले), दूसरा एकदन्त (एक दाँतवाले), तीसरा कृष्णपिंगाक्ष (काली और भूरी आँखोंवाले), चौथा गजवक्त्र (हाथीके-से मुखवाले)
पाँचवाँ लम्बोदर (बड़े पेटवाले), छठा विकट (विकराल), सातवाँ विघ्नराजेन्द्र (विघ्नोंका शासन करनेवाले राजाधिराज) तथा आठवाँ धूम्रवर्ण (धूसर वर्णवाले)
नवाँ भालचन्द्र (जिसके ललाटपर चन्द्रमा सुशोभित है), दसवाँ विनायक, ग्यारहवाँ गणपति और बारहवाँ गजानन
इन बारह नामोंका जो पुरुष (प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल) तीनों सन्ध्याओंमें पाठ करता है, हे प्रभो! उसे किसी प्रकारके विघ्नका भय नहीं रहता; इस प्रकारका स्मरण सब प्रकारकी सिद्धियाँ देनेवाला है
इससे विद्याभिलाषी विद्या, धनाभिलाषी धन, पुत्रेच्छु पुत्र तथा मुमुक्षु मोक्षगति प्राप्त कर लेता है
इस गणपतिस्तोत्रका जप करे तो छः मासमें इच्छित फल प्राप्त हो जाता है तथा एक वर्षमें पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो जाती है—इसमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं है
जो पुरुष इसे लिखकर आठ ब्राह्मणोंको समर्पण करता है, गणेशजीकी कृपासे उसे सब प्रकारकी विद्या प्राप्त हो जाती है
इति श्रीनारदपुराणे सङ्कटनाशनगणेशस्तोत्रं सम्पूर्णम्।
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