SANATANI
Adi Shankaracharya · Stotra · 6 verses
सर्वदा वेदाध्ययन करो, इसके बताये हुए कर्मोंका भलीभाँति अनुष्ठान करो, उनके द्वारा भगवान्की पूजा करो और काम्यकर्मोंमें चित्तको मत जाने दो, पापसमूहका परिमार्जन करो, संसारसुखमें दोषानुसन्धान करो, आत्मजिज्ञासाके लिये प्रयत्न करो और शीघ्र ही गृहका त्याग कर दो
सज्जनोंका संग करो, भगवान्की दृढ़ भक्तिका आश्रय लो, शम-दमादिका भलीभाँति संचय करो और कर्मोंका शीघ्र ही दृढ़तापूर्वक त्याग कर दो, सच्चे (परमार्थ जाननेवाले) विद्वान्के पास नित्य जाओ और उनकी चरणपादुकाका सेवन करो, उनसे एकाक्षरब्रह्मकी जिज्ञासा करो और वेदोंके महावाक्योंका श्रवण करो
महावाक्यके अर्थका विचार करो, महावाक्यका आश्रय लो, कुतर्कसे दूर रहो और श्रुति-सम्मत तर्कका अनुसन्धान करो; ‘मैं भी ब्रह्म ही हूँ’—नित्य ऐसी भावना करो, अभिमानको त्याग दो, देहमें अहंबुद्धि छोड़ दो और विचारवान् पुरुषोंके साथ वाद-विवाद मत करो
क्षुधारूप व्याधिकी प्रतिदिन चिकित्सा करो, भिक्षारूप औषधका सेवन करो, स्वादु अन्नकी याचना मत करो, दैवयोगसे जो मिल जाय उसीसे सन्तोष करो, सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंको सहन करो और व्यर्थ वाक्य मत उच्चारण करो, उदासीनता धारण करो, अन्य मनुष्योंकी कृपाकी इच्छा तथा निष्ठुरताको त्याग दो
एकान्तमें सुखसे बैठो, परब्रह्ममें चित्त लगा दो, पूर्णात्माको अच्छी तरह देखो, और इस जगत्को उसके द्वारा बाधित देखो, संचित कर्मोंका नाश कर दो, ज्ञानके बलसे क्रियमाण कर्मोंसे लिप्त मत होओ; प्रारब्ध कर्मको यहीं भोग लो, इसके बाद परब्रह्मरूपसे (एकीभाव होकर) स्थित हो जाओ
जो मनुष्य इन पाँचों श्लोकोंको पढ़ता है और स्थिरचित्तसे प्रतिदिन इनका मनन करता है, उसके संसारदावानलके तीव्र घोर ताप, आत्मप्रसादके होनेसे शीघ्र ही शान्त हो जाते हैं
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं साधनपंचकं सम्पूर्णम्।
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