SANATANI
Adi Shankaracharya and traditional sources · Stotra · 29 verses
परब्रह्मणः प्रातःस्मरणम्
मैं प्रातःकाल, हृदयमें स्फुरित होते हुए आत्मतत्त्वका स्मरण करता हूँ, जो सत्, चित् और आनन्दरूप है, परमहंसोंका प्राप्य स्थान है और जाग्रदादि तीनों अवस्थाओंसे विलक्षण है, जो स्वप्न, सुषुप्ति और जाग्रत् अवस्थाको नित्य जानता है, वह स्फुरणारहित ब्रह्म ही मैं हूँ, पंचभूतोंका संघात (शरीर) मैं नहीं हूँ
जो मन और वाणीसे अगम्य है, जिसकी कृपासे समस्त वाणी भास रही हैं, जिसका शास्त्र ‘नेति-नेति’ कहकर निरूपण करते हैं, जिस अजन्मा देवदेवेश्वर अच्युतको अग्र्य (आदि) पुरुष कहते हैं, मैं उसका प्रातःकाल भजन करता हूँ
जिस सर्वस्वरूप परमेश्वरमें यह समस्त संसार रज्जुमें सर्पके समान प्रतिभासित हो रहा है, उस अज्ञानातीत, दिव्यतेजोमय, पूर्ण सनातन पुरुषोत्तमको मैं प्रातःकाल नमस्कार करता हूँ
ये तीनों श्लोक तीनों लोकोंके भूषण हैं, इन्हें जो कोई प्रातःकालके समय पढ़ता है, उसे परमपदकी प्राप्ति होती है
इति श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ परब्रह्मणः प्रातःस्मरणस्तोत्रं सम्पूर्णम्
श्रीविष्णोः प्रातःस्मरणम्
गरुडवाहन, कमलनाभ, ग्राहसे ग्रसित गजेन्द्रकी मुक्तिके कारण, सुदर्शनचक्रधारी नवविकसित कमलपत्र-से नेत्रवाले नारायणका भव-भयरूपी महान् दुःखकी शान्तिके लिये, मैं प्रातः स्मरण करता हूँ
वेदोंका स्वाध्याय करनेवाले विप्रोंके परम आश्रय, नरकरूप संसारसमुद्रसे तारनेवाले, उस परमपुरुषके चरणारविन्दयुगलमें सिर झुकाकर मैं मन-वचनसे प्रातःकाल नमस्कार करता हूँ
जिसने शंख-चक्र धारण करके ग्राहके मुखमें पड़े हुए चरणवाले गजेन्द्रके घोर संकटका नाश किया, भक्तको अभय करनेवाले उन भगवान्को मैं अपने पूर्वजन्मोंके सब पापोंका नाश करनेके लिये प्रातःकाल भजता हूँ
इति श्रीविष्णोः प्रातःस्मरणम्
श्रीरामस्य प्रातःस्मरणम्
जो मधुर मुसकानयुक्त, मधुरभाषी और विशाल भालसे सुशोभित हैं; कानोंमें लटके हुए चंचल कुण्डलोंसे जिनके दोनों कपोल शोभित हो रहे हैं तथा जो कर्णपर्यन्त विस्तृत बड़े-बड़े नेत्रोंसे शोभायमान और नेत्रोंको आनन्द देनेवाले हैं, श्रीरघुनाथजीके ऐसे मुखारविन्दका मैं प्रातःकाल स्मरण करता हूँ
मैं प्रातःकाल श्रीरघुनाथजीके करकमलोंका स्मरण करता हूँ, जो राक्षसोंको भय देनेवाले और भक्तोंके वरदायक हैं तथा जिन्होंने राजसभामें शंकरका धनुष तोड़कर शीघ्र ही सीताका मंगलमय पाणिग्रहण किया था
मैं प्रातःकाल श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंको नमस्कार करता हूँ, जो वज्र, अंकुश आदि शुभ रेखाओंसे युक्त, मेरे लिये सुखदायी, योगियोंके मन-मधुपद्वारा सेवित और गौतमपत्नी अहल्याके शापको दूर करनेवाले हैं
मैं प्रातःकाल अपनी वाणीसे श्रीरघुनाथजीके नामका जप करता हूँ, जो वाणीके दोषोंको नाश करनेवाला और सर्व पापोंको हरनेवाला है तथा जिसे पार्वतीजीने अपने पति (शंकर)के साथ भोजन करनेकी इच्छासे भगवान्के सहस्रनामके सदृश प्रीतिसहित जपा था
मैं प्रातःकाल श्रीरघुनाथजीकी वेदवन्दित मूर्तिका आश्रय लेता हूँ, जो नीलकमल और नीलमणिके समान नीलवर्ण, लटकते हुए मोतियोंकी मालासे विभूषित, समस्त मुनियोंकी ध्येय तथा भक्तोंको मोक्ष प्रदान करनेवाली है
जो पुरुष प्रातःकाल नींदसे जगकर जितेन्द्रियभावसे इन पाँचों श्लोकोंका नित्य पाठ करता है, वह श्रीरामजीके सेवकोंमें मुख्य होकर श्रीहरिके लोकको, जो दूसरोंके लिये दुर्लभ है, प्राप्त होता है
इति श्रीरामस्य प्रातःस्मरणम्
श्रीशिवस्य प्रातःस्मरणम्
जो सांसारिक भयको हरनेवाले और देवताओंके स्वामी हैं, जो गंगाजीको धारण करते हैं, जिनका वृषभ वाहन है, जो अम्बिकाके ईश हैं तथा जिनके हाथमें खट्वाङ्ग, त्रिशूल और वरद तथा अभयमुद्रा है, उन संसाररोगको हरनेके निमित्त अद्वितीय औषधरूप ‘ईश’ (महादेवजी) को मैं प्रातःसमयमें स्मरण करता हूँ
भगवती पार्वती जिनका आधा अंग हैं, जो संसारकी सृष्टि, स्थिति और प्रलयके कारण हैं, आदिदेव हैं, विश्वनाथ हैं, विश्व-विजयी और मनोहर हैं, सांसारिक रोगको नष्ट करनेके लिये अद्वितीय औषधरूप उन गिरीश (शिव)-को मैं प्रातःकाल नमस्कार करता हूँ
जो अन्तसे रहित आदिदेव हैं, वेदान्तसे जाननेयोग्य, पापरहित एवं महान् पुरुष हैं तथा जो नाम आदि भेदोंसे रहित, छः भाव-विकारों (जन्म, वृद्धि, स्थिरता, परिणमन, अपक्षय और विनाश)-से शून्य, संसाररोगको हरनेके निमित्त अद्वितीय औषध हैं, उन एक शिवजीको मैं प्रातःकाल भजता हूँ
जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर शिवका ध्यान कर प्रतिदिन इन तीनों श्लोकोंका पाठ करते हैं, वे लोग अनेक जन्मोंके संचित दुःखसमूहसे मुक्त होकर शिवजीके उसी कल्याणमय पदको पाते हैं
इति श्रीशिवस्य प्रातःस्मरणम्
श्रीदेव्याः प्रातःस्मरणम्
जिनके चंचल और अरुण नेत्रोंसे करुणा प्रकट हो रही है, चन्द्रमा और सूर्य जिनके मस्तकके आभूषण हैं, जिनका मुख सुन्दर मुसकानसे सुशोभित है, जो चराचर जगत्की रक्षिका हैं, सत्पुरुष जिनके विश्रामस्थान हैं, शोभायमान चम्पाके समान सुन्दर नासिकाके अग्रभागमें मोतीकी बुलाक जिनकी शोभा बढ़ा रही है, उन श्रीशैलपर निवास करनेवाली भगवती श्रीमाताका मैं स्मरण करता हूँ
जिनका ललाट कस्तूरीकी बेंदीसे विभूषित और चन्द्रमाके समान प्रकाशमान है, जिनके मुखमें कपूरके रससे युक्त चूना और खैरकी सुगन्धसे पूर्ण पानका बीड़ा शोभा दे रहा है, जो अपने चंचल कटाक्षोंसे तरंगायमान करुणाकी धारावाहिनी वृष्टिसे प्रणत भक्तोंको आनन्द देनेवाली हैं, श्रीशैलपर निवास करनेवाली उन भगवती श्रीमाताका मैं स्मरण करता हूँ
इति श्रीदेव्याः प्रातःस्मरणम्
श्रीगणेशप्रातःस्मरणम्
जो इन्द्र आदि देवेश्वरोंके समूहसे वन्दनीय हैं, अनाथोंके बन्धु हैं, जिनके युगल कपोल सिन्दूरराशिसे अनुरंजित हैं, जो उद्दण्ड (प्रबल) विघ्नोंका खण्डन करनेके लिये प्रचण्ड दण्डस्वरूप हैं; उन श्रीगणेशजीको मैं प्रातःकाल स्मरण करता हूँ
जो ब्रह्मासे वन्दनीय हैं, अपने सेवकको उसकी इच्छाके अनुकूल पूर्ण वरदान देनेवाले हैं, तुन्दिल हैं, सर्प ही जिनका यज्ञोपवीत है, उन क्रीडाकुशल शिव-पार्वतीके पुत्र (श्रीगणेशजी) को मैं कल्याण-प्राप्तिके लिये प्रातःकाल नमस्कार करता हूँ
जो अपने जनको अभय प्रदान करनेवाले हैं, भक्तोंके शोकरूप वनके लिये दावानल (वनाग्नि) हैं, गणोंके नायक हैं, जिनका मुख हाथीके समान और सुन्दर है और जो अज्ञानरूप वनको नष्ट करने (जलाने) के लिये अग्नि हैं; उन उत्साह बढ़ानेवाले शिवसुत (श्रीगणेशजी)को मैं प्रातःकाल भजता हूँ
जो पुरुष प्रातःसमय उठकर संयतचित्तसे इन तीनों पवित्र श्लोकोंका नित्य पाठ करता है, उसको यह स्तोत्र सर्वदा साम्राज्यके समान सुख देता है
इति श्रीगणेशप्रातःस्मरणम्
श्रीसूर्यप्रातःस्मरणम्
मैं सूर्यभगवान्के उस श्रेष्ठरूपको प्रातःसमय स्मरण करता हूँ; जिसका मण्डल ऋग्वेद है, तनु यजुर्वेद है और किरणें सामवेद हैं और जो ब्रह्माका दिन है, जगत्की उत्पत्ति, रक्षा और नाशका कारण है तथा लक्ष्य और अचिन्त्यस्वरूप है
मैं प्रातःसमय शरीर, वाणी और मनके द्वारा ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवताओंसे स्तुत और पूजित, वृष्टिके कारण एवं अवृष्टिके हेतु, तीनों लोकोंके पालनमें तत्पर और सत्त्व आदि त्रिगुणरूप धारण करनेवाले तरणि (सूर्यभगवान्)को नमस्कार करता हूँ
जो पापोंके समूह तथा शत्रुजनित भय एवं रोगोंका नाश करनेवाले हैं, सबसे उत्कृष्ट हैं, सम्पूर्ण लोकोंके समयकी गणनाके निमित्तभूत कालस्वरूप हैं और गौओंके कण्ठबन्धन छुड़ानेवाले हैं, उन अनन्तशक्तिसम्पन्न आदिदेव सविता (सूर्यभगवान्) को मैं प्रातःकाल भजता हूँ
जो मनुष्य प्रातःकाल सूर्यके स्मरणरूप इन तीनों श्लोकोंका पाठ करता है; वह सब रोगोंसे मुक्त होकर परम सुख प्राप्त कर सकता है
इति श्रीसूर्यप्रातःस्मरणम्
श्रीभगवद्भक्तानाम्
प्रह्लाद, नारद, पराशर, पुण्डरीक, व्यास, अम्बरीष, शुक, शौनक, भीष्म, दाल्भ्य, रुक्मांगद, अर्जुन, वसिष्ठ और विभीषण आदि इन परम पवित्र वैष्णवोंका मैं (प्रातःकाल) स्मरण करता हूँ
वाल्मीकि, सनक, सनन्दन, तरु, व्यास, वसिष्ठ, भृगु, जाबालि, जमदग्नि, कच्छ, जनक, गर्ग, अंगिरा, गौतम, मान्धाता, ऋतुपर्ण, पृथु, सगर, धन्यवाद देनेयोग्य दिलीप और नल, पुण्यात्मा युधिष्ठिर, ययाति और नहुष—ये सब हमारा मंगल करें
इति प्रातःस्मरणम्
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