SANATANI
Shri Vedavyasa · Stotra · 48 verses
प्रह्लाद उवाच
प्रह्लादजी बोले—जिनकी बुद्धि एकमात्र सत्त्वगुणमें ही स्थित है, वे ब्रह्मादि देवगण तथा मुनि और सिद्धगण भी अपने वचनोंके प्रवाहसे, अनन्त गुणोंके कारण अभीतक जिनकी आराधना नहीं कर सके, वे भगवान् हरि मुझ उग्रजातिमें उत्पन्न हुए दैत्यपर कैसे सन्तुष्ट हो सकते हैं ?
मेरा तो ऐसा विचार है कि धन, कुलीनता, रूप, तप, विद्या, ओज, तेज, प्रभाव, बल, पौरुष, बुद्धि और योग—ये सभी गुण परम पुरुष श्रीहरिकी आराधनाके साधक नहीं हो सकते; और भक्तिसे तो वे गजेन्द्रपर भी प्रसन्न हो गये थे
जो ब्राह्मण उपर्युक्त बारह गुणोंसे युक्त है, किन्तु भगवान् कमलनाभके चरणकमलोंसे विमुख है उससे तो मैं उस चाण्डालको श्रेष्ठ समझता हूँ जिसने अपने मन, वचन, कर्म, धन और प्राण श्रीहरिमें लगा रखे हैं; वह अपने कुलको पवित्र कर देता है किन्तु अधिक सम्मानशाली ब्राह्मण वैसा नहीं कर सकता
(इससे यह न समझना चाहिये कि भगवान्को पूजाकी आवश्यकता है) भगवान् तो आत्मलाभसे ही पूर्ण हैं, वे क्षुद्र पुरुषोंसे अपना मान कराना नहीं चाहते। केवल करुणावश ही वे अपने भक्तोंद्वारा की हुई परिचर्याको स्वीकार कर लेते हैं, (इससे भी उन उपासकोंका ही लाभ है) क्योंकि जिस प्रकार अपने मुखकी शोभा (दर्पणादिमें प्रतीत होनेवाली) प्रतिबिम्बको भी सुशोभित करती है, उसी प्रकार भक्त भगवान्के प्रति जो-जो मान प्रदर्शित करता है, वह (भगवत्प्रतिबिम्बरूप) उसे ही प्राप्त होता है
अतः यद्यपि मैं नीच हूँ तो भी निःशंक होकर अपने बुद्धिके अनुसार सब प्रकार उन ईश्वरकी महिमाका वर्णन करता हूँ जिसका वर्णन करनेसे, अविद्यावश संसारचक्रमें पड़ा हुआ जीव तत्काल पवित्र हो जाता है
हे ईश! ये ब्रह्मादिक समस्त देवगण सत्त्वस्वरूप आपकी आज्ञाका अनुवर्तन करनेवाले हैं; हम दैत्योंकी भाँति आपसे द्वेष करनेवाले नहीं हैं, और हे भगवन्! अपने मनोहर अवतारोंद्वारा आप जो-जो लीलाएँ करते हैं वे भी जगत्के कल्याण, उद्भव तथा आत्मानन्दके लिये ही होती हैं
अतः अब आप क्रोध शान्त कीजिये; क्योंकि असुरका संहार हो चुका। हे देव! सर्प और बिच्छू आदि दुःखदायी जीवोंके मारे जानेपर साधुजन भी आनन्द मानते हैं, अतः इस असुरके संहारसे आनन्दित हुए सब लोक आपका कोप शान्त होनेकी बाट देख रहे हैं। हे नृसिंह! भयसे मुक्त होनेके लिये मनुष्य आपके रूपका स्मरण करते हैं
हे अजित! जिसमें अति भयानक मुख और जिह्वा, सूर्यके समान देदीप्यमान नेत्र, भृकुटिका वेग एवं उग्र दाढ़ें हैं, जो आँतोंकी माला, रक्ताक्त सटाकलाप एवं सीधे खड़े हुए कानोंसे युक्त है, जिसके सिंहनादने दिग्गजोंको भी भयभीत कर दिया है तथा जिसके नखाग्र शत्रुको विदीर्ण करनेवाले हैं, आपके उस भयंकर स्वरूपसे मुझे कुछ भी भय नहीं है
हे दीनवत्सल! मैं तो अति उग्र और दुःसह संसारचक्रके दुःखसे भयभीत हो रहा हूँ, जहाँ मुझे कर्मोंने बाँधकर हिंस्र जीवोंके बीचमें डाल दिया है। हे श्रेष्ठतम! अब आप प्रसन्न होकर मुझे अपने मोक्षप्रद और शरणदायक चरणोंमें कब बुलायेंगे
हे भूमन्! मैं सभी योनियोंमें प्रियके वियोग और अप्रियके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले शोकानलसे सन्तप्त होता रहा हूँ; उस दुःखकी जो (इष्टप्राप्तिरूप) ओषधि है वह भी दुःख ही है; अतः मैं देहादि अनात्मामें आत्मबुद्धिकर चिरकालसे भटक रहा हूँ सो आप मुझे अपने दास्यभावका उपदेश दीजिये
हे नृसिंह! आप सबके प्रिय, सुहृद् और श्रेष्ठ देवतारूप हैं; आपके दासभावको प्राप्त होकर मैं, आपके चरणयुगलमें निवास करनेवाले ज्ञानियोंका सहवास करता हुआ गुणोंसे मुक्त हो ब्रह्माजीद्वारा कही हुई आपकी लीलाकथाओंको गाकर सुगमतासे ही संसारसे पार हो जाऊँगा
हे नृसिंह! इस लोकमें सन्तप्त पुरुषोंकी दुःखनिवृत्तिका जो उपाय माना जाता है, आपके उपेक्षा करनेपर वह एक क्षणके लिये ही होता है (कुछ स्थायी नहीं होता)। बालकके लिये माता-पिता, रोगीके लिये ओषधि और समुद्रमें डूबते हुएके लिये नौका सदा ही सहायक नहीं होते (उनके रहते हुए भी विपरीत फल होता देखा गया है)
हे भगवन्! (ब्रह्मादि) पुरातन अथवा (उनसे प्रेरित माता-पितादि) अर्वाचीन कर्ता जिसमें जिससे जब जिसके द्वारा जिसका जिससे जिसके लिये जिस प्रकार जो कुछ बनाते अथवा बिगाड़ते हैं, वह सब भिन्न-भिन्न स्वभाववाला आपहीका रूप है
हे प्रभो! पुरुषकी अनुमतिसे कालके द्वारा गुणोंमें क्षोभ होनेपर माया मनःप्रधान लिंगदेहकी रचना करती है जो अति बलवान्, कर्ममय, वैदिक कर्मकलापमें आसक्त तथा अविद्याद्वारा अर्पित (मन, दस इन्द्रिय और पंचतन्मात्रा—इन) सोलह विकारोंसे युक्त है; सो हे अजन्मा प्रभो! आपसे अलग रहनेवाला ऐसा कौन पुरुष है जो उस (मनरूप) संसारचक्रको पार कर सके
हे प्रभो! आप अपनी चैतन्यशक्तिसे बुद्धिके समस्त गुणोंपर नित्य विजय प्राप्तकर कालरूपसे सम्पूर्ण साध्य और साधनको अपने वशमें रखनेवाले हैं, हे ईश्वर! मैं मायाद्वारा इस सोलह अरोंवाले संसारचक्रमें डाला जाकर (इक्षुदण्डके समान) पेरा जा रहा हूँ कृपया आप मुझ शरणागतको अपने समीप खींच लें
हे विभो! संसारी लोग जिनकी इच्छा रखते हैं वे स्वर्गलोकमें मिलनेवाली सम्पूर्ण लोकपालोंकी आयु, लक्ष्मी और विभूतियाँ तो मैंने खूब देख लीं। वे तो हमारे पिताके क्रोधयुक्त हास्यद्वारा किये हुए भृकुटिविलाससे ही नष्ट हो गयी थीं और अब आपने उन्हें भी मार डाला
अतः जीवोंके इन भोगादिके परिणामको जाननेवाला मैं ब्रह्माके भी आयु, वैभव और इन्द्रियसम्बन्धी भोगोंकी इच्छा नहीं करता; क्योंकि वे सभी परम पराक्रमी कालरूप परमेश्वरसे ग्रस्त हैं। अतः मुझे आप अपने दासोंके समीप ले चलिये
अहो! कहाँ केवल सुननेमें सुखदायक मृगतृष्णारूप विषयभोग और कहाँ सम्पूर्ण रोगोंका उत्पत्ति-स्थान यह शरीर! किन्तु मनुष्य इनकी असारता और नाशवत्ताको जानकर भी, बड़ी कठिनतासे प्राप्त होनेवाले (भोगरूप) मधुकणोंसे अपनी भोगेच्छारूप अग्निको शान्त करनेकी चेष्टा करता है। इनसे विरक्त नहीं होता
हे ईश! कहाँ तो इस तमःप्रधान असुरकुलमें रजोगुणसे उत्पन्न हुआ मैं? और कहाँ आपकी कृपा? अहो! जो अपना प्रसादस्वरूप (और सकलसन्तापहारी) करकमल आपने कभी ब्रह्मा, महादेव और लक्ष्मीके सिरपर भी नहीं रखा वही मेरे मस्तकपर रखा
अन्य संसारी पुरुषोंके समान (ब्रह्मादिक और मेरे-जैसे प्राणियोंमें) आपकी उत्तम-अधम बुद्धि नहीं हो सकती; क्योंकि आप सम्पूर्ण जगत्के आत्मा और सुहृद् हैं। (फिर भी आपकी कृपामें जो अन्तर देखा जाता है उसका कारण यही है कि) कल्पवृक्षके समान आपकी कृपा भी सेवासे ही प्राप्त होती है—सेवाके अनुसार ही आप कृपा करते हैं—कुछ ऊँच-नीच दृष्टिसे नहीं
हे भगवन्! संसाररूप सर्पयुक्त कुएँमें पड़े हुए अन्य कामासक्त पुरुषोंके साथ मैं भी उसीमें गिरा जा रहा था। उस समय देवर्षि नारदने मुझे अपना मानकर अनुगृहीत किया था। (उन्हींकी कृपासे आज मुझे आपके दर्शनोंका सौभाग्य प्राप्त हुआ है) अतः मैं आपके दासोंकी सेवा किस प्रकार त्याग सकता हूँ ?
हे अनन्त! मेरे पिताने अन्याय करनेकी इच्छासे हाथमें खड्ग लेकर जो कहा कि ‘मुझसे अतिरिक्त यदि कोई ईश्वर है तो तेरी रक्षा करे—मैं तेरा सिर काटता हूँ’, उस समय आपने जो मेरे प्राणोंकी रक्षा की और मेरे पिताका वध किया, वह भी अपने दास देवर्षि नारदके वचनोंको सत्य करनेके लिये ही था—ऐसा मैं मानता हूँ
हे नाथ! यह सम्पूर्ण जगत् एकमात्र आप ही हैं, क्योंकि (सत्स्वरूप होनेके कारण) इसके आदि और अन्तमें (कारण और अवधिरूपसे) आप ही अवशिष्ट रहते हैं तथा मध्यमें (अधिष्ठानरूपसे) आप ही स्थित हैं। आप ही अपनी मायासे गुणोंके परिणामरूप इस जगत्को रचकर इसमें अनुप्रविष्ट हो उन गुणोंके (सृष्टि-प्रलय आदि) व्यापारोंसे जगत्के स्रष्टा, रक्षक और संहारक आदि भिन्न-भिन्न रूपोंसे प्रतीत होते हैं
हे ईश! यह सत् (कार्य), असत् (कारण) रूप सम्पूर्ण जगत् आप ही हैं, किन्तु आप (इसके आदि और अन्तमें भी वर्तमान रहनेके कारण) इससे भिन्न हैं। अतः ‘यह मेरा है—यह पराया है’ ऐसी निरर्थक बुद्धि माया ही है; क्योंकि जिसका जिससे जन्म, स्थिति, लय और प्रकाश होता है, वह तद्रूप ही होता है; अतः जिस प्रकार (कार्यरूप) वृक्ष और (कारणरूप) बीज दोनों ही गन्धतन्मात्रारूप हैं उसी प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् आप ही हैं
हे प्रभो! आप इस निखिल प्रपंचको अपनेमें समेटकर आत्मसुखका अनुभव करते हुए निरीह होकर प्रलयकालीन जलमें शयन करते हैं। उस समय योगद्वारा बाह्य दृष्टि मूँदकर और आत्मस्वरूपके प्रकाशसे निद्राको जीतकर आप तुरीयपदमें स्थित रहते हैं—न तो तमोयुक्त ही होते हैं और न विषयोंके भोक्ता ही
यह ब्रह्माण्ड, अपनी कालशक्तिसे प्रकृतिके गुणोंको प्रेरित करनेवाले उन्हीं आपका रूप है। पहले यह आपहीमें निहित था; जब प्रलयकालीन जलके भीतर शेषशय्यापर शयन करनेवाले आपने योगनिद्रारूप समाधिको त्यागा तो वटके बीजसे उत्पन्न हुए महावृक्षके समान आपकी नाभिसे अति विशाल ब्रह्माण्डकमल उत्पन्न हुआ
उससे उत्पन्न हुए सूक्ष्मदर्शी ब्रह्माजीको जब उस कमलके अतिरिक्त और कुछ भी दिखायी न दिया तो अपनेमें व्याप्त बीजरूप आपको अपनेसे बाहर समझकर वे सौ वर्षतक जलके भीतर घुसकर ढूँढ़ते रहे, किन्तु उन्हें कुछ भी न मिला—सो ठीक ही है, क्योंकि अंकुर उत्पन्न हो जानेपर (उसमें व्याप्त हुए) बीजको कोई पुरुष पृथक् कैसे देख सकता है
इससे आत्मयोनि श्रीब्रह्माजी अति विस्मित हो उस कमलपर बैठ गये। हे ईश! फिर बहुत समयतक तीव्र तपस्याद्वारा अन्तःकरण शुद्ध हो जानेपर उन्हें, पृथ्वीमें व्याप्त अति सूक्ष्म गन्धतन्मात्राके समान भूत, इन्द्रिय और अन्तःकरणरूप अपने शरीरमें व्याप्त हुए आपका साक्षात्कार हुआ
इस प्रकार सहस्रों वदन, चरण, सिर, हाथ, ऊरु, नासिका, मुख, कर्ण, नयन, आभूषण और आयुधोंसे सम्पन्न चौदह लोकरूप अवयवोंसे विभूषित आप मायामय विराट् पुरुषका दर्शनकर ब्रह्माजीको परमानन्द प्राप्त हुआ
तब आपने हयग्रीवरूप धारणकर अति प्रबल और वेदद्रोही रजोगुण-तमोगुणरूप मधु और कैटभ नामक दो दैत्योंको मारकर उन ब्रह्माजीको सत्त्वगुणरूप समस्त वेद समर्पण किये। अतः सत्त्वगुणको ही आपका प्रियतम रूप कहा जाता है
हे परमपुरुष! इस प्रकार आप मनुष्य, तिर्यक्, ऋषि, देवता और मत्स्यादि अवतार लेकर सम्पूर्ण लोकोंका पालन और जगद्विद्रोहियोंका संहार करते हैं। उन अवतारोंद्वारा आप प्रत्येक युगके धर्मोंकी रक्षा करते हैं, किन्तु कलियुगमें (अवतार न लेकर) गुप्तरूपसे ही रहते हैं; इसीलिये आप ‘त्रियुग’ नामसे भी प्रसिद्ध हैं
हे विकुण्ठनाथ! यह मेरा मन अति असाधु, दोषदूषित, कामातुर तथा हर्ष, शोक, भय और त्रिविध एषणाओंसे व्याकुल है, आपकी कथाओंमें इसकी प्रीति ही नहीं है। मैं दीन ऐसे कलुषित चित्तमें किस प्रकार आपके स्वरूपका चिन्तन करूँ
हे अच्युत! जिस प्रकार बहुत-सी सपत्नियाँ (सौतें) अपने स्वामीको अपनी-अपनी ओर खींचती हैं उसी प्रकार मुझे अतृप्त रसना एक ओर, उपस्थ दूसरी ओर, त्वचा, उदर एवं कर्ण किसी तीसरी ओर, घ्राण और चंचल नयन किसी और तरफ तथा कर्मेन्द्रियाँ और ही स्थानकी ओर खींचती हैं
इस संसाररूप वैतरणीमें अपने कर्मोंके कारण पड़कर एक-दूसरेके जन्म, मरण एवं खान-पानादिसे अत्यन्त भयभीत तथा अपने और पराये पुरुषोंसे मित्रता एवं द्वेष करनेवाले मूढ़ जनसमुदायका हे पार लगानेवाले! आप अब पालन कीजिये
हे अखिलगुरो! आप सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और पालन करनेवाले हैं। हे भगवन्! इन सबको पार लगाना आपके लिये ऐसी क्या प्रयासकी बात है? हे दीनबन्धो! महापुरुषोंकी कृपा तो मूढ़ोंपर ही होनी चाहिये; आपके प्रिय दासोंकी सेवा करनेवाले हमलोगोंके लिये उसका ऐसा क्या प्रयोजन है? (हम तो उनकी सेवासे ही तर जायँगे)
हे प्रभो! जिसका पार करना दूसरोंके लिये अत्यन्त कठिन है उस संसाररूप वैतरणीसे मुझे कुछ भी भय नहीं है, क्योंकि मेरा चित्त आपके पौरुषगानरूप परमामृतका पान करके मग्न रहता है, मुझे तो उन्हींकी चिन्ता है जो मूढ़ उससे विमुख रहकर इन्द्रियोंके विषयोंसे प्राप्त होनेवाले मायिक सुखके लिये कुटुम्बपोषणादिका भार वहन करते रहते हैं
हे देव! मुनिजन प्रायः अपनी ही मुक्तिकी इच्छासे एकान्तमें रहकर मौनव्रत धारण कर लेते हैं, वे दूसरेके हितमें तत्पर नहीं होते। किन्तु मुझे इन गरीबोंको छोड़कर अकेले ही मुक्त होनेकी इच्छा नहीं है और संसारमें भटकनेवाले इन लोगोंके लिये आपके सिवा और कोई मुझे उद्धार करनेवाला भी दिखायी नहीं देता
हे प्रभो! मैथुनादि जो गृहस्थीके सुख हैं वे खुजलीके समान हैं। जिस प्रकार हाथोंसे खुजलानेपर खुजलीमें (पहले कुछ चैन पड़नेपर भी फिर) अधिकाधिक दुःख ही बढ़ता है, उसी प्रकार ये भोग भी अत्यन्त तुच्छ हैं। किन्तु अनेकों दुःख उठानेपर भी ये दीनजन इनसे तृप्त नहीं होते। कोई धीर पुरुष ही खुजलीके समान कामादि वेगोंको सहन करता है
हे परमपुरुष! मौन, ब्रह्मचर्य, शास्त्रश्रवण, तप, वेदाध्ययन, स्वधर्मपालन, शास्त्रोंकी व्याख्या करना, एकान्तसेवन, जप और समाधि—ये जो मोक्षके दस साधन हैं वे भी प्रायः अजितेन्द्रिय पुरुषोंकी जीविकाके साधन बन जाते हैं; तथा दाम्भिकोंके लिये तो वे कभी जीविकाके साधन रहते भी हैं और कभी (दम्भ खुल जानेपर) नहीं भी रहते
वेदने बीज और अंकुरके समान कार्य और कारण—ये आपके दो रूप बतलाये हैं। वास्तवमें आप रूपरहित हैं; परन्तु इन्हें छोड़कर आपके ज्ञानका और कोई साधन भी नहीं है। योगीजन काष्ठमें निहित अग्निके समान भक्तियोगद्वारा इन (कार्य और कारण) दोनोंहीमें आपका साक्षात्कार करते हैं; क्योंकि आपके सिवा इनकी पृथक् कोई सत्ता नहीं है
हे भूमन्! वायु, अग्नि, पृथ्वी, आकाश, जल, पंचतन्मात्रा, प्राण, इन्द्रिय, मन, चित्त, अहंकार तथा स्थूल-सूक्ष्म सम्पूर्ण जगत् एकमात्र आप ही हैं। अधिक क्या, जितने भी पदार्थ मन या वाणीके विषय हैं उनमेंसे कोई भी आपसे पृथक् नहीं हैं
किन्तु हे महाकीर्ते! ये सत्त्वादि गुण, गुणोंके परिणाम महत्तत्त्वादि तथा देवता और मनुष्योंके सहित मन-बुद्धि आदि कोई भी आपको नहीं जानते; क्योंकि सभी आदि-अन्तयुक्त हैं। आप ऐसे हैं—यह जानकर पण्डितजन शब्दतः आपका प्रतिपादन करनेसे उपरत हो जाते हैं
हे पूज्यतम! प्रणाम, स्तुति, सर्वकर्मार्पण, उपासना, चरणोंका ध्यान तथा कथाश्रवण—इन छः अंगोंके सहित आपकी भली प्रकार सेवा किये बिना मनुष्यको केवल परमहंसोंको ही प्राप्त होनेवाले आपमें किस प्रकार भक्ति हो सकती है? (अतः आपकी भक्ति प्राप्त हो—इसलिये मुझे अपना दास्यभाव ही प्रदान कीजिये)
नारद उवाच
श्रीनारदजी बोले—हे राजन्! भक्त प्रह्लादद्वारा इस प्रकार भक्तिपूर्वक गुणोंका वर्णन किये जानेपर उन निर्गुण भगवान्का क्रोध शान्त हो गया और वे विनयसम्पन्न प्रह्लादजीसे प्रसन्न होकर बोले
श्रीभगवानुवाच
श्रीभगवान्ने कहा—भद्र प्रह्लाद! तुम्हारा शुभ हो। हे असुरश्रेष्ठ! मैं तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम मुझसे इच्छित वर माँगो, मैं मनुष्योंकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण कर देता हूँ
हे आयुष्मन्! जो व्यक्ति मुझे प्रसन्न नहीं कर पाता उसे मेरा दर्शन मिलना अत्यन्त कठिन है। किन्तु जब मेरा दर्शन हो गया तब उसे किसी तरहका संताप नहीं करना पड़ता
मैं सकल शुभ इच्छाओंको पूर्ण करनेवाला हूँ, इसलिये जितेन्द्रिय और अपना कल्याण चाहनेवाले महाभाग साधुजन सब प्रकार मुझे प्रसन्न करनेका प्रयत्न करते हैं
इस प्रकार सम्पूर्ण लोकोंको प्रलोभित करनेवाले वरोंका लोभ दिखानेपर भी असुरश्रेष्ठ प्रह्लादने उनकी इच्छा नहीं की, क्योंकि वे भगवान्के अनन्य भक्त थे
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे सप्तमस्कन्धे नवमेऽध्याये प्रह्लादकृतनृसिंहस्तोत्रं सम्पूर्णम्।
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