SANATANI
Brahmananda Swami · Stotra · 15 verses
हे शरण देनेवाले परमात्मन्! तुम एक और शुद्ध हो, किंतु वेदके विरुद्ध बुद्धि रखनेवाले भ्रान्त और पापपरायणजन तुम्हारे ऐसे स्वरूपमें भी विकाररूप प्रपंच (संसार) देखते हैं। हे सर्वव्यापी भगवन्! मुझे उन लोगोंसे अलग करके अपने चरणोंकी शरणमें ले लो। [अपनी शरणमें लेनेकी] तुम्हारी उदारता गजेन्द्रके विषयमें देखी गयी है कि तुमने उसकी रक्षा करके उसे अपना धाम दे दिया
हे भगवन्! यदि तुम कृपा करके मेरी रक्षा करते हो तो इससे तुम्हारी सृष्टिमर्यादाकी कोई हानि नहीं है। तुमने अनेकोंकी रक्षा की है, हमारे कानोंमें यह बात पड़ चुकी है कि तुम्हें शरणागतोंकी रक्षा करनेका व्यसन है, अतः मेरा उद्धार करनेके लिये तुम मुझपर भी अपनी निर्मल दृष्टि डालो। अपने भक्तजनोंकी रक्षामें तत्पर रहनेवाले हे भगवन्! मेरी प्रार्थनाको असफल न करो
हे प्रभो! मैं कब तुमको अपने हृदयमें संयतमनसे भजता हुआ अमंगलमय एवं सर्वदा दुःखयुक्त इस संसारसे विरक्त होकर उस शान्तिको प्राप्त करूँगा जिसको कि महामुनियोंने पाया है। हे भव-बन्धनसे मुक्त करनेवाले भगवन्! तुम दया करके मुझे वही पराशान्ति दो
हे भगवन्! ब्रह्मा यदि संसारकी सृष्टि करते हैं तो मेरे शुभकर्मोंकी सृष्टि करें, विष्णुभगवान् यदि संसारकी रक्षा करते हैं तो जन्म-मरणके दुःखरूपी सागरसे मेरी रक्षा करें और शिवजी यदि संसारका संहार करते हैं तो मेरे शोकोंका उनके कारणभूत अशुभ कर्मोंसहित संहार करें। जिस प्रकार मेरी मुक्ति हो सके वैसा कोई उपाय वे लोग करें
हे भगवन्! मेरा नाम ब्रह्मानन्द है और तुम्हारा भी यही नाम प्रसिद्ध है। इसलिये श्रुतिदृष्ट्या (सुननेमें) मैं तुमसे किसी प्रकार भिन्न नहीं हूँ। ऐसी स्थितिमें तुम इस समय अपने और मेरेमें भेदको प्रकट करनेवाली अपनी माया दूर कर मेरी भिन्नताको निकाल दो
हे प्रभो! मैं कब जन्म-मरणमय घोर दुःखवाले संसारको छोड़कर निरन्तर आनन्दमय सत्य आत्मस्वरूपमें नित्य रमण करूँगा, जिसमें कि ब्रह्मास्वादके रसिक तथा कृतकृत्य योगीश्वर महामुनि रमण करते हैं
हे भगवन्! तुमको प्रसन्न करनेके लिये कोई शास्त्र पढ़ते हैं और कोई तत्पर होकर वेद पढ़ते हैं तथा दूसरे लोग यज्ञके द्वारा तुम्हारी आराधना करते हैं और तुम्हें रुचिकर वस्तु अर्पण करते हैं; किन्तु हे प्रभो! मैं तो संसारके दुःखोंके डरसे तुम्हारी शरणमें आया हूँ। हे हित करनेवाले व्यापक परमात्मन्! जिस प्रकार मुझपर तुम्हारी प्रसन्नता हो सके वैसा करो
हे भगवन्! मैं प्रकाशरूप, नित्य, आकाशके समान व्यापक, पूर्णकाम, आनन्दमय और श्रुतिसिद्ध अद्वैतरूप हूँ; किसी प्रकार ब्रह्मसे भिन्न नहीं हूँ, इस प्रकार तत्त्वज्ञान हो जानेपर विवेक-दृष्टिसे जगत्का लय हो जानेके कारण ज्ञानी ब्रह्मरूप हो जाता है; इसलिये तुम कृपा करके मुझमें तत्त्वज्ञान भर दो
जन्ममरणरूप भयसे युक्त इस अनादि संसारमें मन-ही-मन सदा दुःखी रहनेवाला कोई पुरुष इससे मुक्त होनेकी इच्छासे परम ज्ञानी गुरुकी सेवा करता है और उससे जिस भगवान्को जानकर फिर सांसारिक क्लेशसमूहोंसे पीड़ित नहीं होता उस देवको मैं भजता हूँ, जिसके भजनसे भक्त परब्रह्मस्वरूप हो जाता है
हे भगवन्! मुझमें न विवेक है, न वैराग्य और न शम, दम आदि ज्ञानके अन्य छः साधन ही हैं; मुझमें मुक्त होनेकी सुदृढ़ इच्छा भी नहीं है; फिर कैसे निर्मल ज्ञान प्राप्त हो सकता है ? इसलिये संसारसागरको पार करनेके मार्गका उपदेश देते हुए तुम कृपाकर मुझको अपनी वैदिक बुद्धि (ब्रह्मविद्या) प्रदान करो
हे स्वामिन्! श्रुतिने जिनके त्रिविध परिच्छेद (इयत्ता) का बाध किया है; जो वैदिक बुद्धिसे ही जाननेयोग्य हैं, जो नित्य चिदानन्दघन एवं कल्याण स्वरूप हैं तथा जो ‘त्वम्’ पदके अर्थभूत जीवात्मासे अभिन्न हैं ऐसे आपका निरन्तर अपने हृदय-देशमें मैं कब ध्यान करूँगा, हे उदार परमेश्वर! आप अपनी कृपासे इस विचारको सफल करें
हे भगवन्! जिसके लिये प्रिय होनेके कारण ही ये प्राण, धन आदि समस्त वस्तु प्रिय प्रतीत होते हैं; और जो किसी दूसरेके लिये प्रिय होनेके कारण प्रिय नहीं है अपितु स्वतः प्रिय है; यह बात वेदमें प्रसिद्ध है, वही जन्मने-मरनेवाले समस्त प्राणियोंका आत्मा है और उसीका वेदोंमें वर्णन किया गया है, अतः मैं उसी जाननेके योग्य निर्मल आत्मदेवकी सदा ही शरण लेता हूँ
हे नाथ! मेरी मति किसी प्रकार आत्मस्वरूप तुममें लगी रहे, इसी उद्देश्यसे मैंने अपना सब कुछ परित्याग कर दिया, किन्तु तुम्हारी मायाने तो मेरे प्रति विपरीत ही कार्य किया, अतः अब मैं क्या करूँ, मेरी बुद्धि कुछ काम नहीं करती, अब तुम्हीं दया करके मुझे कल्याण देनेवाले अपने चरणोंकी शरण दो
हे प्रभो! तुमने पर्वत-वृक्षादि स्थावरों, दैत्यों, वानरों और दूसरोंको भी संसारसागरके पार कर दिया। इस समय क्यों सो गये? हे अन्तर्यामिन्! तुम्हारे विराट् स्वरूपमें समस्त संसार है, इसलिये तुम मेरा अनादर न करो, तुमको छोड़कर मैंने दूसरेकी शरण नहीं ली
हे भगवन्! विशेष ज्ञान रखनेवाले शेष, शारदा आदि भी यदि तुम्हारे गुणरूपी सागरके पार न जा सके, तो मुझ-जैसा साधारण जन तुम्हारे गुणसमूहका पार कैसे पा सकता है; परन्तु जन्म-मरणरूप कष्टको हरनेवाले तुझ परमेश्वरका जितना ही हो सके उतना ही गुणगान करके मनुष्य योगिजनोंके प्राप्त होनेयोग्य परमगतिको प्राप्त कर लेता है, ऐसा मनमें जानकर मैंने आपकी स्तुति की है
इति श्रीमन्मौक्तिकरामोदासीनशिष्यब्रह्मानन्दविरचितं परमेश्वरस्तुतिसारस्तोत्रं सम्पूर्णम्।
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