SANATANI
Adi Shankaracharya · Stotra · 10 verses
अखण्ड, सच्चिदानन्द और निर्विकल्पैकरूप अद्वितीय भावके स्थिर हो जानेपर, किस प्रकार पूजा की जाय?
जो पूर्ण है उसका आवाहन कहाँ किया जाय? जो सबका आधार है, उसे आसन किस वस्तुका दें? जो स्वच्छ है, उसको पाद्य और अर्घ्य कैसे दें? और जो नित्य शुद्ध है, उसको आचमनकी क्या अपेक्षा?
निर्मलको स्नान कैसा? सम्पूर्ण विश्व जिसके पेटमें है, उसे वस्त्र कैसा? और जो वर्ण तथा गोत्रसे रहित है, उसके लिये यज्ञोपवीत कैसा?
निर्लेपको गन्ध कैसी? निर्वासनिकको पुष्पोंसे क्या? निर्विशेषको शोभाकी क्या अपेक्षा और निराकारके लिये आभूषण क्या?
निरंजनको धूपसे क्या? सर्वसाक्षीको दीप कैसा तथा जो निजानन्दरूपी अमृतसे तृप्त है, उसे नैवेद्यसे क्या?
जो स्वयंप्रकाश, चित्स्वरूप, सूर्य-चन्द्रादिका भी अवभासक और विश्वको आनन्दित करनेवाला है, उसे ताम्बूल क्या समर्पण किया जाय?
अनन्तकी परिक्रमा कैसी ? अद्वितीयको नमस्कार कैसा ? और जो वेदवाक्योंसे भी जाना नहीं जा सकता, उसका स्तवन कैसे किया जाय ?
जो स्वयंप्रकाश और विभु है, उसकी आरती कैसे की जाय ? तथा जो बाहर-भीतर सब ओर परिपूर्ण है, उसका विसर्जन कैसे हो ?
ब्रह्मवेत्ताओंको सर्वदा, सब अवस्थाओंमें इसी प्रकार एक बुद्धिसे भगवान्की परापूजा करनी चाहिये
हे शम्भो! मेरी आत्मा ही तुम हो, बुद्धि श्रीपार्वतीजी हैं, प्राण आपके गण हैं, शरीर आपकी कुटिया है, नाना प्रकारकी भोगसामग्री आपका पूजोपचार है, निद्रा समाधि है, मेरे चरणोंका चलना आपकी प्रदक्षिणा है और मैं जो कुछ भी बोलता हूँ वह सब आपके स्तोत्र हैं, अधिक क्या ? मैं जो कुछ भी करता हूँ, वह सब आपकी आराधना ही है
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं परापूजास्तोत्रं सम्पूर्णम्।
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