SANATANI
Sri Venkatanatha · Stotra · 10 verses
‘मैं, मेरी रक्षाका भार और उसका फल मेरा नहीं श्रीविष्णुभगवान्का ही है’—ऐसा विचारकर विद्वान् पुरुष अपनेको भगवान्पर छोड़ दे
हे भगवन्! मैं अपनी रक्षाका भार और अनुकूल () होकर विश्वास और प्रार्थनापूर्वक आपको सौंपता हूँ
मेरे स्वामी अपने शेष, और अपनी ही रक्षकतापर अवलम्बित हुए मुझको अपनी निजकी दी हुई बुद्धिसे स्वयं अपने लिये अपनेमें ही समर्पित करते हैं [अर्थात् परम पुरुषार्थको सिद्ध करनेके लिये स्वयं ही अपनी शरणमें ले लेते हैं]
हे अभीष्टवरदायक स्वामिन्! मैं आपकी शरण हूँ। इस देहका अन्त होनेपर आप मुझे स्वयं अपने चरणकमलोंतक पहुँचा दें
आपका शेष होनेमें स्थिरबुद्धिवाले, आपकी प्राप्तिका ही एकमात्र प्रयोजन रखनेवाले, निषिद्ध और कर्मोंसे रहित मुझको आप अपना नित्य सेवक बनाइये
देवी (श्रीलक्ष्मीजी), भूषण (कौस्तुभादि) और शस्त्रादि (गदा, शार्ङ्गादि) से युक्त अपनी निर्दोष सेवाओंमें, हे भगवन्! आप मुझे नित्य नियुक्त रखिये
हे वरदायक प्रभो! मुझको और चेतन-अचेतनरूप मेरी समस्त वस्तुओंको, अपनी सेवाकी सामग्रीके रूपमें स्वीकार कीजिये
हे प्रभो! मेरे एकमात्र आप ही रक्षक हैं, आप ही मुझपर दया करनेवाले हैं; अत: पापोंको मेरी ओर प्रवृत्त न कीजिये और प्रवृत्त हुए पापोंका निवारण कीजिये
हे देव! हे दीनदु:खहारी भगवन्! मेरा न करनेयोग्य कार्योंका करना और करने योग्योंको न करना आप क्षमा करें
श्रीमन्! आपने स्वयं ही मेरी पाँचों इन्द्रियोंको नियन्त्रित करके मेरी रक्षाका भार अपने ऊपर ले लिया; अत: अब मैं निर्भर हो गया
इति श्रीवेङ्कटनाथकृतं न्यासदशकं सम्पूर्णम् ।
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