SANATANI
Indra · Ashtakam · 11 verses
इन्द्र उवाच
इन्द्र बोले—श्रीपीठपर स्थित और देवताओंसे पूजित होनेवाली हे महामाये। तुम्हें नमस्कार है। हाथमें शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाली हे महालक्ष्मि! तुम्हें प्रणाम है
गरुड़पर आरूढ़ हो कोलासुरको भय देनेवाली और समस्त पापोंको हरनेवाली हे भगवति महालक्ष्मि! तुम्हें प्रणाम है
सब कुछ जाननेवाली, सबको वर देनेवाली, समस्त दुष्टोंको भय देनेवाली और सबके दु:खोंको दूर करनेवाली, हे देवि महालक्ष्मि! तुम्हें नमस्कार है
सिद्धि, बुद्धि, भोग और मोक्ष देनेवाली हे मन्त्रपूत भगवति महालक्ष्मि! तुम्हें सदा प्रणाम है
हे देवि! हे आदि-अन्त-रहित आदिशक्ते! हे महेश्वरि! हे योगसे प्रकट हुई भगवति महालक्ष्मि! तुम्हें नमस्कार है
हे देवि! तुम स्थूल, सूक्ष्म एवं महारौद्ररूपिणी हो, महाशक्ति हो, महोदरा हो और बड़े-बड़े पापोंका नाश करनेवाली हो। हे देवि महालक्ष्मि! तुम्हें नमस्कार है
हे कमलके आसनपर विराजमान परब्रह्मस्वरूपिणी देवि! हे परमेश्वरि! हे जगदम्ब! हे महालक्ष्मि! तुम्हें मेरा प्रणाम है
हे देवि! तुम श्वेत वस्त्र धारण करनेवाली और नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषिता हो। सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त एवं अखिल लोकको जन्म देनेवाली हो। हे महालक्ष्मि! तुम्हें मेरा प्रणाम है
जो मनुष्य भक्तियुक्त होकर इस महालक्ष्म्यष्टक स्तोत्रका सदा पाठ करता है, वह सारी सिद्धियों और राज्यवैभवको प्राप्त कर सकता है
जो प्रतिदिन एक समय पाठ करता है, उसके बड़े-बड़े पापोंका नाश हो जाता है। जो दो समय पाठ करता है, वह धन-धान्यसे सम्पन्न होता है
जो प्रतिदिन तीन काल पाठ करता है उसके महान् शत्रुओंका नाश हो जाता है और उसके ऊपर कल्याणकारिणी वरदायिनी महालक्ष्मी सदा ही प्रसन्न होती हैं
इतीन्द्रकृतं महालक्ष्म्यष्टकं सम्पूर्णम्।
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