SANATANI
Adi Shankaracharya · Stotra · 6 verses
मैं प्रात:काल श्रीललितादेवीके उस मनोहर मुखकमलका स्मरण करता हूँ, जिनके बिम्बसमान रक्तवर्ण अधर, विशाल मौक्तिक (मोतीके बुलाक) से सुशोभित नासिका और कर्णपर्यन्त फैले हुए विस्तीर्ण नयन हैं, जो मणिमय कुण्डल और मन्द मुसकानसे युक्त हैं तथा जिनका ललाट कस्तूरिकातिलकसे सुशोभित है
मैं श्रीललितादेवीकी भुजारूपिणी कल्पलताका प्रात:काल स्मरण करता हूँ जो लाल अँगूठीसे सुशोभित सुकोमल अंगुलिरूप पल्लवोंवाली तथा रत्नखचित सुवर्णकंकण और अंगदादिसे भूषित है एवं जिसने पुण्ड्र-ईखके धनुष, पुष्पमय बाण और अंकुश धारण किये हैं
मैं श्रीललितादेवीके चरणकमलोंको, जो भक्तोंको अभीष्ट फल देनेवाले और संसारसागरके लिये सुदृढ़ जहाजरूप हैं तथा कमलासन श्रीब्रह्माजी आदि देवेश्वरोंसे पूजित और पद्म, अंकुश, ध्वज एवं सुदर्शनादि मंगलमय चिह्नोंसे युक्त हैं, प्रात:काल नमस्कार करता हूँ
मैं प्रात:काल परमकल्याणरूपिणी श्रीललिता भवानीकी स्तुति करता हूँ जिनका वैभव वेदान्तवेद्य है, जो करुणामयी होनेसे शुद्धस्वरूपा हैं, विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और लयकी मुख्य हेतु हैं, विद्याकी अधिष्ठात्री देवी हैं तथा वेद, वाणी और मनकी गतिसे अति दूर हैं
हे ललिते! मैं तेरे पुण्यनाम कामेश्वरी, कमला, महेश्वरी, शाम्भवी, जगज्जननी, परा, वाग्देवी तथा त्रिपुरेश्वरी आदिका प्रात:काल अपनी वाणीद्वारा उच्चारण करता हूँ
माता ललिताके अति सौभाग्यप्रद और सुललित इन पाँच श्लोकोंको जो पुरुष प्रात:काल पढ़ता है, उसे शीघ्र ही प्रसन्न होकर ललितादेवी विद्या, धन, निर्मल सुख और अनन्त कीर्ति देती हैं
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं ललितापञ्चकं सम्पूर्णम्।
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