SANATANI
Adi Shankaracharya · Stotra · 9 verses
जो श्रीलक्ष्मीजीद्वारा आलिंगित हैं, व्यापक हैं, सम्पूर्ण चराचर जिनका शरीर है, श्रुति-संवेद्य हैं, समस्त बुद्धियोंके साक्षी हैं, शुद्ध हैं, हरि हैं, दैत्यदलन हैं, कमलनयन हैं, शंख, चक्र, गदा और विमल वनमाला धारण किये हुए हैं और स्थिरकान्तिमय हैं, वे शरणागतवत्सल, निखिल भुवनेश्वर श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रोंके विषय हों
(सृष्टिकालमें) आकाश और पवनादिसे लेकर यह सम्पूर्ण जगत् जिनसे उत्पन्न हुआ है, स्थितिके समय भी जो मधुसूदन अपने आनन्दांशसे उसकी सर्वथा रक्षा करते हैं तथा लयके समय जो लीलामात्रसे उसे अपनेहीमें लीन कर लेते हैं वे विभु, शरणागतवत्सल निखिल भुवनेश्वर श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रोंके विषय हों
जिस स्तवनीय मायापतिको बुधजन, यम-नियमादि उपायोंसे पहले प्राणोंको अपने अधीनकर फिर चित्तनिरोधद्वारा इस सम्पूर्ण जगत्को लीन करके अपने अन्तःकरणमें देखते हैं वे ही शरणागतवत्सल, निखिल भुवनेश्वर श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रोंके विषय हों
पृथ्वीमें रहकर जो पृथ्वीका नियमन करते हैं परन्तु पृथ्वी जिन्हें नहीं जानती (यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिवीं यमयति यं पृथिवी न वेद) आदि श्रुतियोंसे वेद जिन अमलस्वरूपको जगत्का स्वामी, नियामक, ध्येय और देवता, मनुष्य तथा मुनिजनोंको मोक्ष देनेवाला बतलाता है, वे शरणागतपालक, निखिल भुवनेश्वर श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रोंके विषय हों
जिनके बलसे इन्द्रादि देवगण दैत्योंको जीतते हैं, जिनकी कृतिके बिना किसी कार्यमें कोई भी स्वतन्त्र नहीं है तथा जो कवियोंके कवित्वाभिमानको और विजयियोंके विजयाभिमानको हर लेते हैं, वे शरणागतवत्सल निखिल भुवनेश्वर श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रोंके विषय हों
जिनका ध्यान किये बिना मनुष्य सूकरादि पशु-योनियोंमें पड़ते हैं, जिनके ज्ञान बिना जनता जन्म-मरणके भयको प्राप्त होती है तथा जिनका स्मरण किये बिना सैकड़ों कीट-पतंगादि योनियोंमें गिरना पड़ता है, वे शरणागतवत्सल, निखिल भुवनेश्वर श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रोंके विषय हों
जो प्राणियोंके भयको दूर करनेवाले हैं, शरणागतोंको शरण देनेवाले तथा भ्रमको दूर करनेवाले हैं, मेघश्याम हैं, सुन्दर हैं, व्रजबालकोंके समवयस्क साथी और अर्जुनके सखा हैं, स्वयम्भू हैं, समस्त प्राणियोंके पिता हैं तथा उचित आचरणोंद्वारा सुख देनेवाले हैं, वे शरणागतवत्सल, निखिल भुवनेश्वर श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रोंके विषय हों
शरीर धारण करते हैं, वे ही शरणागतवत्सल, निखिल भुवनेश्वर व्रजराज श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रोंके विषय हों
इस प्रकार अपनी माताकी मुक्तिके लिये श्रीशंकराचार्यजीने श्रुतिकथित गुणोंवाले, निखिलात्मा आदि नारायण हरिकी आराधना की तो अपने उदार गुणोंसे युक्त श्रीभगवान् लक्ष्मीजीसहित उनके निकट शंख, चक्र, पद्मादि लिये प्रकट हो गये
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं कृष्णाष्टकं सम्पूर्णम्॥
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