SANATANI
Adi Shankaracharya · Stotra · 5 verses
सदैव उपनिषद्-वाक्योंमें रमते हुए, भिक्षाके अन्नमात्रमें ही सन्तोष रखते हुए, शोकरहित तथा दयावान्, कौपीन धारण करनेवाले ही भाग्यवान् हैं
केवल वृक्षतलोंमें रहनेवाले, दोनों हाथोंको ही भोजनपात्र बनानेवाले, गुदड़ीको भी स्त्रीकी भाँति तुच्छ बुद्धिसे देखनेवाले कौपीनधारी ही भाग्यवान् हैं
देहाभिमानको दूरसे ही छोड़कर, अपनी आत्माको अपनेमें ही देखते हुए रात-दिन ब्रह्ममें रमण करनेवाले कौपीनधारी ही भाग्यवान् हैं
आत्मानन्दमें ही सन्तुष्ट रहनेवाले, अपने भीतर ही सारी इन्द्रियोंकी वृत्तियाँ शान्त कर लेनेवाले, अन्त, मध्य और बाहरकी स्मृतिसे शून्य रहनेवाले कौपीनधारी ही भाग्यवान् हैं
पवित्र पञ्चाक्षरमन्त्र (नमः शिवाय) का जप करते हुए, हृदयमें परमेश्वरकी भावना करते तथा भिक्षाका भोजन करते हुए सब दिशाओंमें विचरनेवाले कौपीनधारी ही भाग्यवान् हैं
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं कौपीनपञ्चकं सम्पूर्णम्
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