SANATANI
Jatayu · Stotra · 13 verses
जटायुरुवाच
जटायु बोला—जो अगणित गुणशाली हैं, अप्रमेय हैं, जगत्के आदिकारण हैं तथा उसकी स्थिति और लय आदिके हेतु हैं, उन परम शान्तस्वरूप परमात्मा श्रीरामचन्द्रजीकी मैं निरन्तर वन्दना करता हूँ
जो असीम आनन्दमय और श्रीकमलादेवीके कटाक्षके आश्रय हैं तथा जो ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवगणोंका दुःख दूर करनेवाले हैं, उन धनुष-बाणधारी वरदायक नरश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीको मैं अहर्निश प्रणाम करता हूँ
जो त्रिलोकीमें सबसे अधिक रूपवान् हैं, सबके स्तुत्य हैं, सैकड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी हैं तथा वांछित फल देनेवाले हैं, उन शरणप्रद और रागाश्रित हृदयमें रहनेवाले श्रीरघुनाथजीको मैं अहर्निश प्रणाम करता हूँ
जिनका नाम संसाररूप वनके लिये दावानलके समान है, जो महादेव आदि देवताओंके भी पूज्य देव हैं तथा जो सहस्रों करोड़ दानवेन्द्रोंका दलन करनेवाले और श्रीयमुनाजीके समान श्यामवर्ण हैं, उन दयामय श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ
जो संसारमें निरन्तर वासना रखनेवालोंसे अत्यन्त दूर हैं और संसारसे उपराम मुनिजनोंके सदैव दृष्टिगोचर रहते हैं तथा जिनके चरणरूप पोत (जहाज) संसारसागरसे पार करनेवाले हैं, उन रघुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ
जो श्रीमहादेव और पार्वतीजीके मन-मन्दिरमें निवास करते हैं, जिनकी लीलाएँ अति मनोहारिणी हैं तथा देव और असुरपतिगण जिनके चरणकमलोंकी सेवा करते हैं, उन गिरिवरधारी सुखदायक रघुनायककी मैं शरण लेता हूँ
जो परधन और परस्त्रीसे सदा दूर रहते हैं तथा पराये गुण और परायी विभूतिको देखकर प्रसन्न होते हैं, उन निरन्तर परोपकारपरायण महात्माओंसे सुसेवित कमलनयन श्रीरघुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ
जिनका मुखकमल मनोहर मुसकानसे विकसित हो रहा है, जो भक्तोंके लिये अति सुलभ हैं, जिनके शरीरकी कान्ति इन्द्रनीलमणिके समान सुन्दर नीलवर्ण है तथा जिनके मनोहर नेत्र श्वेत कमलकी-सी शोभावाले हैं, उन श्रीगुरु महादेवजीके परम गुरु श्रीरघुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ
हे प्रभो! जलसे भरे हुए पात्रोंमें जैसे एक ही सूर्य प्रतिबिम्बित होता है वैसे ही सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंकी वृत्तिके कारण आप ही विष्णु, ब्रह्मा और महादेवरूपसे भासित होते हैं। हे ईश! आप देवराज इन्द्रकी भी स्तुतिके पात्र हैं, मैं आपकी स्तुति करता हूँ
आपका दिव्य शरीर सैकड़ों करोड़ कामदेवोंसे भी सुन्दर है, सैकड़ों मार्गोंमें फँसे हुए लोगोंसे आप अत्यन्त दूर हैं और यतीश्वरोंके हृदयमें आप सदा ही भासमान हैं। ऐसे आप आर्त्तिहर प्रभु रघुपतिकी मैं शरण लेता हूँ
जटायुके इस प्रकार स्तुति करनेपर श्रीरघुनाथजी उसपर प्रसन्न होकर बोले—‘जटायो! तुम्हारा कल्याण हो, तुम मेरे परमधाम विष्णुलोकको जाओ’
जो पुरुष मेरे इस स्तोत्रको एकाग्रचित्तसे सुने, लिखे अथवा पढ़े, वह मेरा सारूप्य-पद प्राप्त करता है और मरते समय उसे मेरा स्मरण होगा
पक्षिराज जटायुने रघुनाथजीका यह कथन बड़े हर्षसे सुना और उन्हींके समान रूप धारणकर ब्रह्मा आदि लोकपालोंसे पूजित परमधामको चला गया
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे अरण्यकाण्डेऽष्टमे सर्गे जटायुकृतश्रीरामस्तोत्रं सम्पूर्णम्।
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