SANATANI
Brahmananda Paramahamsa Swami · Stotra · 9 verses
जो चिदानन्दस्वरूप है, श्रुतिका सुमधुर सार है, समरस है, निराश्रयोंका आश्रय है, संसारसागरका पार करानेवाला है, परगुणाश्रय है, श्रीलक्ष्मीजीके गलेका हार है, वृन्दावनविहारी है तथा भगवान् शंकरसे सम्पूजित है, अरे! उस परमानन्दकन्द गोविन्दका सदैव भजन कर
जिसका महासमुद्र आश्रय है, जो चराचरका आदिकारण है, देवोंका संरक्षक है, अमृतपान करानेवाला है, गरुड़ ही जिसका वाहन है, जो यमों (अहिंसा, सत्यादि) में बसा हुआ है, मनोज्ञ है, ज्ञानस्वरूप है, मुनिजनोंका आश्रय है, ध्रुवस्थान है, अरे! उस परमानन्दकन्द गोविन्दको सदैव भज
धीर पुरुषोंद्वारा बुद्धिसे जिनका ध्यान किया जाता है और कर्णपुटोंसे पान किया जाता है, योगिजन जिसे महावाक्योंद्वारा जान पाते हैं, जो त्रिलोकीका विधाता और विधिवाक्योंसे परे है, जिसे मन प्रमाणोंद्वारा नहीं जान सकता तथा जो हृदयमें शीघ्र ही धारण करनेयोग्य है एवं नूतन तनुधारी है, अरे! उस परमानन्दकन्द गोविन्दका सदैव भजन कर
जिसका मायारूपी महाजाल है, जिसने निर्मल वनमाला धारण किया है, जो मलका अपहरण करनेवाला है, जिसका सुन्दर भाल है, जो गोपाल है, शिशुपालवधकारी है, जिसका चाँद-सा मुखड़ा है, जो सम्पूर्ण कलातीत है, काल है, अपनी सुन्दर गतिसे हंसका भी विजय करनेवाला है, मुर दैत्यका शत्रु है, अरे! उस परमानन्दकन्द गोविन्दका सदैव भजन कर
जो आकाशबिम्बके समान व्यापक है, जिसका शास्त्र संकीर्तन करते हैं, जो सबकी समान गति है, देवताओंसे परम प्रसन्न तथा दैत्योंका विरोधी है, बुद्धिरूपी गुहामें स्थित है, वाणीकी गतिसे बाहर है, नवनीतका आस्वादन करनेवाला है तथा नीतिका संस्थापक है, अरे! उस परमानन्दकन्द गोविन्दका सदैव भजन कर
जो परमेश्वर है, लक्ष्मीपति है, शिव और ब्रह्माका भी स्वामी है, कल्याणकारी है, द्विज और देवोंका ईश्वर है, महीन और घुँघराले केशोंवाला है, कलिमलहारी है, आकाशसंचारी सूर्यका भी शासक है, धरातलधारी शेष है, सम्पूर्ण भुवनमण्डलका स्वामी है, गोवर्धनधारी है! अरे, उस परमानन्दकन्द गोविन्दका सदैव भजन कर
जो लक्ष्मीपति है, विमल द्युति है, भवभयहारी है, संसारका सुख है, दुराशाका काल है, शान्त है, सम्पूर्ण हृदयोंमें भासमान है, त्रिभुवनका प्रतिपालक है, विवादका जहाँ अन्त हो जाता है, दमशील है, दैत्य-दल-दलन है, सुन्दर चरित्रवाला है, अरे! उस परमानन्दकन्द गोविन्दका सदैव भजन कर
जो संसारमें सबसे बड़ा है, श्रेष्ठ है, सुरराज इन्द्रका अनुज (वामन) है, यज्ञपति है, बलिष्ठ है, भूयिष्ठ है, त्रिभुवनमें सर्वश्रेष्ठ है, वरदायक है, आत्मनिष्ठ है, धर्मिष्ठ है, महान् गुणोंसे गौरवयुक्त है, गुरुवर है, अरे! उस परमानन्दकन्द गोविन्दका सदैव भजन कर
जो विशुद्धात्मा पुरुष गदापाणि गोविन्दके इस पापनाशन, दुःखदलन स्तोत्रको निरन्तर पढ़ता है, वह चिरकालपर्यन्त नाना भोगोंको भोगकर, पापोंसे रहित होकर भगवान् विष्णुके परमपावन धाम वैकुण्ठलोकको अवश्यमेव जाता है
इति श्रीपरमहंसस्वामिब्रह्मानन्दविरचितं गोविन्दाष्टकं सम्पूर्णम्।
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