SANATANI
Bilvamangala Acharya · Stotra · 71 verses
[जिस समय] कौरव और पाण्डवोंके सामने भरी सभामें दुःशासनने द्रौपदीके वस्त्र और बालोंको पकड़कर खींचा, उस समय जिसका कोई दूसरा नाथ नहीं है ऐसी द्रौपदीने रोकर पुकारा—‘हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव!’
‘हे श्रीकृष्ण! हे विष्णो! हे मधुकैटभको मारनेवाले! हे भक्तोंके ऊपर अनुकम्पा करनेवाले! हे भगवन्! हे मुरारे! हे केशव! हे लोकेश्वर! हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो’
जिनकी चित्तवृत्ति मुरारिके चरणकमलोंमें लगी हुई है, वे सभी गोपकन्याएँ दूध-दही बेचनेकी इच्छासे घरसे चलीं। उनका मन तो मुरारिके पास था; अतः प्रेमवश सुध-बुध भूल जानेके कारण ‘दही लो दही’ इसके स्थानपर जोर-जोरसे ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’ आदि पुकारने लगीं
ओखलीमें धान भरे हुए हैं, उन्हें मुग्धा गोपरमणियाँ मूसलोंसे कूट रही हैं और कूटते-कूटते कृष्णप्रेममें विभोर होकर ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’ इस प्रकार गायन करती जाती हैं
कोई कमलनयनी बाला मनोविनोदके लिये पाले हुए अपने करकमलपर बैठे किंशुककुसुमके समान रक्तवर्ण चोंचवाले सुग्गेको पढ़ा रही थी—पढ़ो तो तोता! ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’
प्रत्येक घरमें समूह-की-समूह गोपांगनाएँ पिंजरोंमें पाली हुई अपनी मैनाओंसे उनकी लड़खड़ाती हुई वाणीको क्षण-क्षणमें ‘हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव!’ इत्यादि रूपसे कहलानेमें लगी रहती थीं
पालनेमें पौढ़े हुए अपने नन्हें बच्चेको सुलाती हुई सभी गोपकन्याएँ ताल-स्वरके साथ ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’ इस पदको ही गाती जाती थीं
हाथमें माखनका गोला लेकर मैया यशोदाने आँख-मिचौनीकी क्रीडामें व्यस्त बलरामके छोटे भाई कृष्णको बालकोंके बीचसे पकड़कर पुकारा—‘अरे गोविन्द! अरे दामोदर! अरे माधव!’
विचित्र वर्णमय आभरणोंसे अत्यन्त सुन्दर प्रतीत होनेवाली हे मुखकमलकी राजहंसीरूपिणी मेरी रसने! तू सर्वप्रथम ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’ इस ध्वनिका ही विस्तार कर
अपनी गोदमें बैठकर दूध पीते हुए बाल-गोपालरूपधारी भगवान् लक्ष्मीकान्तको लक्ष्य करके प्रेमानन्दमें मग्न हुई यशोदामैया इस प्रकार बुलाया करती थीं—‘ऐ मेरे गोविन्द! ऐ मेरे दामोदर! ऐ मेरे माधव! जरा बोलो तो सही!’
अपने समवयस्क गोपबालकोंके साथ गोष्ठमें खेलते हुए अपने प्यारे पुत्र कृष्णको यशोदामैयाने अत्यन्त स्नेहके साथ पुकारा—‘अरे ओ गोविन्द! ओ दामोदर! अरे माधव! [कहाँ चला गया?]’
अधिक चपलता करनेके कारण यशोदामैयाने गौ बाँधनेकी रस्सीसे खूब कसकर ओखलीमें उन घनश्यामको बाँध दिया तब तो वे माखनभोगी कृष्ण धीरे-धीरे [आँखें मलते हुए] सिसक-सिसककर ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’ कहते हुए रोने लगे
श्रीनन्दनन्दन अपने ही घरके आँगनमें अपने हाथके कंकणसे खेलनेमें लगे हुए हैं, उसी समय मैयाने धीरेसे जाकर उनके दोनों कमलनयनोंको अपनी हथेलीसे मूँद लिया तथा दूसरे हाथमें नवनीतका गोला लेकर प्रेमपूर्वक कहने लगी—‘गोविन्द! दामोदर! माधव [लो देखो, यह माखन खा लो]’
व्रजके प्रत्येक घरमें गोपांगनाएँ एकत्र होनेका अवसर पानेपर झुंड-की-झुंड आपसमें मिलकर उन मनमोहन माधवके ‘गोविन्द, दामोदर, माधव’ इन पवित्र नामोंको पढ़ा करती हैं
जिनका मुखारविन्द बड़ा ही मनोहर है, जो अपने बिम्बके समान अरुण अधरोंपर रखकर वंशीकी मधुर ध्वनि कर रहे हैं तथा जो कदम्बके तले गौ, गोप और गोपियोंके मध्यमें विराजमान हैं, उन भगवान्का ‘हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव!’ इस प्रकार कहते हुए सदा स्मरण करना चाहिये
व्रजांगनाएँ ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर और उन यशुमतिनन्दनकी बालक्रीडाओंकी बातोंको याद करके दही मथते-मथते ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’ इन पदोंको उच्च स्वरसे गाया करती हैं
[दधि मथकर माखनका लौंदा रख दिया था। माखनभोगी कृष्णकी दृष्टि पड़ गयी, झट उसे धीरेसे उठा लाये] कुछ खाया, कुछ बाँट दिया। जब ढूँढ़ते-ढूँढ़ते न मिला तो यशोदामैयाने आपपर सन्देह करते हुए पूछा—‘हे मुरारे! हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! ठीक-ठीक बता, माखनका लौंदा क्या हुआ?’
जिसके हृदयमें प्रेमकी बाढ़ आ रही है ऐसी माता यशोदा घरको लीपकर दही मथने लगी। तब और सब गोपांगनाएँ तथा सखियाँ मिलकर ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’ इस पदका गान करने लगीं
किसी दिन प्रातःकाल ज्यों ही माता यशोदा दहीभरे भाण्डमें मथानीको छोड़कर उठी त्यों ही उसकी दृष्टि शय्यापर बैठे हुए मनमोहन मुकुन्दपर पड़ी। सरकारको देखते ही वह प्रेमसे पगली हो गयी और ‘मेरा गोविन्द! मेरा दामोदर! मेरा माधव!’ ऐसा कहकर तरह-तरहसे गाने लगी
क्रीडाविहारी मुरारि बालकोंके साथ खेल रहे हैं [अभीतक न स्नान किया है न भोजन] अतः प्रेममें विह्वल हुई माता उन्हें स्नान और भोजनके लिये पुकारने लगी—‘अरे ओ गोविन्द! ओ दामोदर! ओ माधव! [आ बेटा! आ! पानी ठंडा हो रहा है जल्दीसे नहा ले और कुछ खा ले]’
नारद आदि ऋषि ‘हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव!’ इस प्रकार प्रार्थना करते हुए घरमें सुखपूर्वक सोये हुए उन पुराणपुरुष बालकृष्णकी शरणमें आये; अतः उन्होंने श्रीअच्युतमें तन्मयता प्राप्त कर ली
वेदज्ञ ब्राह्मण प्रातःकाल उठकर और अपने नित्य-नैमित्तिक कर्मोंको पूर्णकर वेदपाठके अन्तमें नित्य ही ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’ इन मंजुल नामोंका कीर्तन करते हैं
वृन्दावनमें श्रीवृषभानुकुमारीको वनवारीके वियोगसे विह्वल देख गोपगण और गोपियाँ अपने कमलनयनोंसे नीर बहाती हुई ‘हा गोविन्द! हा दामोदर! हा माधव!’ आदि कहकर पुकारने लगीं
प्रातःकाल होनेपर जब गौएँ वनमें चरने चली गयीं तब उनकी रक्षाके लिये यशोदामैया शय्यापर शयन करते हुए बालकृष्णको मीठी-मीठी थपकियोंसे जगाती हुई बोलीं—‘बेटा गोविन्द! मुन्ना माधव! लल्लू दामोदर! [उठ, जा गौओंको चरा ला]’
केवल वायु, जल और पत्तोंके खानेसे जिनके शरीर पवित्र हो गये हैं, ऐसे प्रवालके समान शोभायमान लंबी-लंबी एवं कुछ अरुण रंगकी जटाओंवाले मुनिगण पवित्र वृक्षोंकी छायामें विराजमान होकर निरन्तर ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’ इन नामोंका पाठ करते हैं
श्रीवनमालीके विरहमें विह्वल हुई व्रजांगनाएँ उनके विषयमें विविध प्रकारकी बातें कहती हुई लोक-लज्जाको तिलांजलि दे बड़े आर्त्त स्वरसे ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’ कहकर जोर-जोरसे रोने लगीं
गोपी श्रीराधिकाजी किसी दिन मणियोंके पिंजड़ेमें पले हुए तोतेसे बार-बार ‘आनन्दकन्द! व्रजचन्द्र! कृष्ण! गोविन्द! दामोदर! माधव!’ इन नामोंको बुलवाने लगीं
कमलनयन श्रीकृष्णचन्द्रको किसी गोपबालककी चोटी बछड़ेके पूँछके बालोंसे बाँधते देख मैया प्यारसे उनकी ठोढ़ीको पकड़कर कहने लगी—‘मेरा गोविन्द! मेरा दामोदर! मेरा माधव!’
प्रातःकाल हुआ, ग्वाल-बालोंकी मित्रमण्डली हाथोंमें बेतकी छड़ी और लाठी ले गौओंको चरानेके लिये निकली। तब वे अपने प्यारे सखा अनन्त आदिपुरुष श्रीकृष्णको ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’ कह-कहकर बुलाने लगे
जिस समय कालियनागका मर्दन करनेके लिये कन्हैया कदम्बके वृक्षसे कूदे, उस समय गोपांगनाएँ और गोपगण वहाँ आकर ‘हा गोविन्द! हा दामोदर! हा माधव!’ कहकर बड़े जोरसे रोने लगे
जिस समय श्रीकृष्णचन्द्रने कंसके धनुर्यज्ञोत्सवमें सम्मिलित होनेके लिये अक्रूरजीके साथ मथुरामें प्रवेश किया, उस समय पुरवासीजन ‘हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! तुम्हारी जय हो, जय हो’ ऐसा कहने लगे
जब कंसके दूत अक्रूरजी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण और बलरामको वृन्दावनसे दूर ले गये तब अपने घरमें बैठी हुई यशोदाजी ‘हा गोविन्द! हा दामोदर! हा माधव!’ कह-कहकर रुदन करने लगीं
यशोदानन्दन बालक श्रीकृष्णको कालियहृदमें कालियनागसे जकड़ा हुआ सुनकर गोपबालाएँ रास्तेमें लोटती हुई ‘हा गोविन्द! हा दामोदर! हा माधव!’ कहकर जोरोंसे रुदन करने लगीं
अक्रूरके रथपर चढ़कर मथुरा जाते हुए श्रीकृष्णको देख समस्त गोपबालाएँ वियोगके कारण अधीर होकर कहने लगीं—‘हा गोविन्द! हा दामोदर! हा माधव! [हमें छोड़कर तुम कहाँ जाते हो?]’
श्रीराधिकाजी श्रीकृष्णके अलग हो जानेपर कमलवनमें कुसुम-शय्यापर सोकर अपने विकसित कमलसदृश लोचनोंसे आँसू बहाती हुई ‘हा गोविन्द! हा दामोदर! हा माधव!’ कहकर क्रन्दन करने लगीं
माता-पिता आदिसे घिरी हुई श्रीराधिकाजी घरके भीतर प्रवेश कर विलाप करने लगीं कि ‘हे विश्वनाथ! हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! तुम आकर मेरी रक्षा करो! रक्षा करो!!’
रात्रिका समय था, किसी गोपीको भ्रम हो गया कि वृन्दावन-विहारी इस समय वनमें विराजमान हैं। बस, फिर क्या था, झट उसी ओर चल दी, किन्तु जब उसने निर्जन वनमें वनमालीको न देखा तो डरसे काँपती हुई ‘हा गोविन्द! हा दामोदर! हा माधव!’ कहने लगी
[वनमें न भी जायँ] अपने घरमें ही सुखसे शय्यापर शयन करते हुए भी जो लोग ‘हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव!’ इन विष्णुभगवान्के पवित्र नामोंको निरन्तर कहते रहते हैं, वे निश्चय ही भगवान्की तन्मयता प्राप्त कर लेते हैं
कमललोचना राधाको श्रीगोविन्दकी विरहव्यथासे पीडि़त देख कोई सखी अपने प्रफुल्ल कमलसदृश नयनोंसे नीर बहाती हुई ‘हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव!’ कहकर रुदन करने लगी
हे रसोंको चखनेवाली जिह्वे! तुझे मीठी चीज बहुत अधिक प्यारी लगती है, इसलिये मैं तेरे हितकी एक बहुत ही सुन्दर और सच्ची बात बताता हूँ। तू निरन्तर ‘हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव!’ इन मधुर मंजुल नामोंकी आवृत्ति किया कर
वेदवेत्ता विद्वान् ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’ इन नामोंको ही लोगोंकी बड़ी-से-बड़ी विकट व्याधिको विच्छेद करनेवाला वैद्य और संसारके आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक—तीनों तापोंके नाशका बढि़या बीज बतलाते हैं
अपने पिता दशरथकी आज्ञासे भाई लक्ष्मण और जनकनन्दिनी सीताके साथ श्रीरामचन्द्रजी बीहड़ वनोंके लिये चलने लगे, तब उनकी माता श्रीकौसल्याजी ‘हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! [ हे राम! हे रघुनन्दन! हे राघव!]’ ऐसा कहकर जोरोंसे विलाप करने लगीं
जब राक्षसराज रावण पंचवटीमें जानकीजीको अकेली देख उन्हें हरकर ले जाने लगा, तब रामचन्द्रजीके सिवा जिनका दूसरा कोई स्वामी नहीं है ऐसी सीताजी ‘हा गोविन्द! हा दामोदर! हा माधव! [हे राम! हे रघुनन्दन! हे राघव!]’ कहकर जोरोंसे रुदन करने लगीं
रथमें बिठाकर ले जाते हुए रावणके साथ, रामवियोगिनी सीता हृदयमें अपने स्वामी श्रीरामचन्द्रजीका ध्यान करती हुई ‘हा रघुनाथ! हा गोविन्द! हा दामोदर! हा माधव! [हे राम! हे रघुनन्दन! हे राघव! मेरी रक्षा करो]’ इस प्रकार रोती हुई जाने लगीं
जब रावणके साथ सीताजी समुद्रके मध्यमें पहुँचीं, तब यह कहकर जोर-जोरसे रुदन करने लगीं—‘हे विष्णो! हे रघुकुलपते! हे देवताओंको सुख और असुरोंको दुःख देनेवाले! हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! [हे राम! हे रघुनन्दन! हे राघव!] प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये।’
पानी पीते समय जलके भीतरसे जब ग्राहने गजका पैर पकड़ लिया और उसका समस्त दुःखी बन्धुओंसे साथ छूट गया, तब वह गजराज अधीर होकर अनन्यभावसे निरन्तर ‘हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव!’ ऐसा कहने लगा
अपने पुरोहित शंखमुनिके साथ राजा हंसध्वजने अपने पुत्र सुधन्वाको तप्त तैलकी कड़ाहीमें कूदते और ‘हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव!’ इन भगवान्के परमपावन नामोंका जप करते हुए देखा
[एक दिन द्रौपदीके भोजन कर लेनेपर असमयमें दुर्वासा ऋषिने शिष्योंसहित आकर भोजन माँगा तब] वनवासिनी द्रौपदीने भोजन देना स्वीकार कर अपने अन्तःकरणमें स्थित श्रीश्यामसुन्दरको ‘हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव!’ कहकर बुलाया
योगी भी जिन्हें ठीक-ठीक नहीं जान पाते, जो सभी प्रकारकी चिन्ताओंको हरनेवाले और मनोवांछित वस्तुओंको देनेके लिये कल्पवृक्षके समान हैं तथा जिनके शरीरका वर्ण कस्तूरीके समान नीला है, उन्हें सदा ही ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’ इन नामोंसे स्मरण करना चाहिये
जो मोहरूपी अन्धकारसे व्याप्त और विषयोंकी ज्वालासे सन्तप्त है, ऐसे अथाह संसाररूपी कूपमें मैं पड़ा हुआ हूँ। ‘हे मेरे मधुसूदन! हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव!’ मुझे अपने हाथका सहारा दीजिये
हे जिह्वे! मैं तुझीसे एक भिक्षा माँगता हूँ, तू ही मुझे दे। वह यह कि जब दण्डपाणि यमराज इस शरीरका अन्त करने आवें तो बड़े ही प्रेमसे गद्गद स्वरमें ‘हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव!’ इन मंजुल नामोंका उच्चारण करती रहना
हे जिह्वे! हे रसज्ञे! संसाररूपी बन्धनको काटनेके लिये तू सर्वदा ‘हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव!’ इस नामरूपी मन्त्रका जप किया कर, जो सुलभ एवं सुन्दर है और जिसे व्यास, वसिष्ठादि ऋषियोंने भी जपा है
रे जिह्वे! तू निरन्तर ‘गोपाल! वंशीधर! रूपसिन्धो! लोकेश! नारायण! दीनबन्धो! गोविद! दामोदर! माधव!’ इन नामोंका उच्च स्वरसे कीर्तन किया कर
हे जिह्वे! तू सदा ही श्रीकृष्णचन्द्रके ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’ इन मनोहर मंजुल नामोंको, जो भक्तोंके समस्त संकटोंकी निवृत्ति करनेवाले हैं, भजती रह
हे जिह्वे! ‘गोविन्द! गोविन्द! हरे! मुरारे! गोविन्द! गोविन्द! मुकुन्द! कृष्ण! गोविन्द! गोविन्द! रथांगपाणे! गोविन्द! दामोदर! माधव!’ इन नामोंको तू सदा जपती रह
सुखके अन्तमें यही सार है, दुःखके अन्तमें यही गाने योग्य है और शरीरका अन्त होनेके समय भी यही मन्त्र जपने योग्य है, कौन-सा मन्त्र? यही कि ‘हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव!’
दुःशासनके दुर्निवार्य वचनोंको स्वीकार कर मृगीके समान भयभीत हुई द्रौपदी किसी-किसी तरह सभामें प्रवेश कर मन-ही-मन ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’ इस प्रकार भगवान्का स्मरण करने लगी
हे जिह्वे! तू ‘श्रीकृष्ण! राधारमण! व्रजराज! गोपाल! गोवर्धन! नाथ! विष्णो! गोविन्द! दामोदर! माधव!’—इस नामामृतका निरन्तर पान करती रह
हे जिह्वे! तू ‘श्रीनाथ! सर्वेश्वर! श्रीविष्णुस्वरूप! श्रीदेवकीनन्दन! असुरनिकन्दन! गोविन्द! दामोदर! माधव!’—इस नामामृतका निरन्तर पान करती रह
हे जिह्वे! तू ‘गोपीपते! कंसरिपो! मुकुन्द! लक्ष्मीपते! केशव! वासुदेव! गोविन्द! दामोदर! माधव!’—इस नामामृतका निरन्तर पान करती रह
जो व्रजराज व्रजांगनाओंको आनन्दित करनेवाले हैं, जिन्होंने गौओंको चरानेके लिये वनमें प्रवेश किया है; हे जिह्वे! तुम उन्हीं मुरारिके ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’—इस नामामृतका निरन्तर पान करती रह
हे जिह्वे! तू ‘प्राणेश! विश्वम्भर! कैटभारे! वैकुण्ठ! नारायण! चक्रपाणे! गोविन्द! दामोदर! माधव!’—इस नामामृतका निरन्तर पान करती रह
‘हे हरे! हे मुरारे! हे मधुसूदन! हे पुराणपुरुषोत्तम! हे रावणारे! हे सीतापते श्रीराम! हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव!’—इस नामामृतका हे जिह्वे! तू निरन्तर पान करती रह
हे जिह्वे! ‘श्रीयदुकुलनाथ! गिरिधर! कमलनयन! गौ, गोप और गोपियोंको सुख देनेमें कुशल श्रीगोविन्द! दामोदर! माधव!’—इस नामामृतका निरन्तर पान करती रह
जिन्होंने पृथ्वीका भार उतारनेके लिये सुन्दर ग्वालका रूप धारण किया है और आनन्दमयी लीला करनेके निमित्त ही शेषजीको अपना भाई बनाया है, ऐसे उन नटनागरके ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’—इस नामामृतका हे जिह्वे! तू निरन्तर पान करती रह
जो पूतना, बकासुर, अघासुर और धेनुकासुर आदि राक्षसोंके शत्रु हैं और केशी तथा तृणावर्तको पछाड़नेवाले हैं, हे जिह्वे! उन असुरारि मुरारिके ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’—इस नामामृतका तू निरन्तर पान करती रह
‘हे जानकीजीवन भगवान् राम! हे दैत्यदलन भरताग्रज! हे ईश! हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव!’—इस नामामृतका हे जिह्वे! तू निरन्तर पान करती रह
‘हे प्रह्लादकी बाधा हरनेवाले दयामय नृसिंह! नारायण! अनन्त! हरे! गोविन्द! दामोदर! माधव!’—इस नामामृतका हे जिह्वे! तू निरन्तर पान करती रह
हे जिह्वे! जिन्होंने लीलाहीसे मनुष्योंकी-सी आकृति बनाकर रामरूप प्रकट किया है और अपने प्रबल पराक्रमसे सभी भूपोंको दास बना लिया है, तू उन नीलाम्बुज श्यामसुन्दर श्रीरामके ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’—इस नामामृतका ही निरन्तर पान करती रह
हे जिह्वे! तू ‘श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे! मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! तथा गोविन्द! दामोदर! माधव!’—इस नामामृतका ही निरन्तर प्रेमपूर्वक पान करती रह
अहो! मनुष्योंकी विषयलोलुपता कैसी आश्चर्यजनक है! कोई-कोई तो बोलनेमें समर्थ होनेपर भी भगवन्नामका उच्चारण नहीं करते; किन्तु हे जिह्वे! मैं तुमसे कहता हूँ, तू ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!’—इस नामामृतका ही निरन्तर प्रेमपूर्वक पान करती रह
इति श्रीबिल्वमङ्गलाचार्यविरचितं श्रीगोविन्ददामोदरस्तोत्रं सम्पूर्णम्।
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