SANATANI
Traditional · Stotra · 4 verses
एहि मुरारे कुञ्जविहारे एहि प्रणतजनबन्धो। हे माधव मधुमथन वरेण्य केशव करुणासिन्धो। (ध्रुवपदम्)
हे मुरारे! हे प्रणतजनोंके बन्धु! विहार-कुंजमें आइये, आइये। हे माधव! हे मधुमथन! हे पूजनीय! हे केशव! हे करुणासिन्धो! पधारिये। हे अद्वैतपथके पथिक! हे नाथ! रासनिकुंजमें सैकड़ों भ्रमर गूँज रहे हैं, पधारिये; हे शान्तिमय मधुसूदन! आपके दर्शनदानकी हम याचना करती हैं
हे नाथ! आपके इस क्रीडास्थल कुंजमें बिछा हुआ यह कुसुमासन और यह लीला-कदम्ब, सब आपके बिना सूना मालूम हो रहा है; मयूर आदि पक्षीगण दीन हो रहे हैं, मृदु कलरव करता हुआ श्रीयमुनाजीका निर्मल जल भी आपके वियोगमें शोकके साथ रोता-सा जान पड़ता है
हे नवीन कमल धारण करनेवाले! हे मेघकी-सी श्यामल सुन्दरतावाले! हे मोरपंख और पुष्पोंसे सुशोभित वेषधारी गोपीजनोंके हृदयेश! हे गोवर्धनधारी! वृन्दावन-विहारी! मुरलीधर! हे प्रभो! पधारिये
हे राधिकाजीको प्रसन्न करनेवाले! कंसको मारनेवाले! सभी निराश्रयोंको आश्रय देनेवाले आपके चरणोंमें हमारा प्रणाम है, हे जनार्दन! पीताम्बरधारी! हे प्रभो! इस मन्द-मन्द वायुवाले कुंजमें पधारिये! पधारिये!! पधारिये!!!
इति श्रीगोपिकाविरहगीतं सम्पूर्णम्।
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