SANATANI
Adi Shankaracharya · Stotra · 13 verses
हे मूढ! धनसंचयकी लालसाको छोड़, सुबुद्धि धारण कर, मनसे तृष्णाहीन हो, अपने प्रारब्धानुसार तुझे जो कुछ वित्त मिल जाय, उसीसे चित्तको प्रसन्न रख और हे मूढमते! निरन्तर गोविन्दको भज
भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढमते॥
अर्थको नित्य अनर्थरूप जान, उसमें सचमुच ही सुखका लेश भी नहीं है, अरे! सभी जगह ऐसी नीति देखी है कि धनवान्को तो अपने पुत्रसे भी भय रहता है; इसलिये सदा गोविन्दको भज
कौन तेरी स्त्री है ? कौन तेरा पुत्र! अरे ? यह संसार बड़ा विचित्र है, भाई! इसी तत्त्वका निरन्तर विचार कर कि, ‘तू कौन है ? किसका है ? और कहाँसे आया है ?’ और गोविन्दको भज
धन, जन और यौवनका गर्व मत कर, काल पलक मारते ही इन सबको नष्ट कर देता है, इस सम्पूर्ण मायामय प्रपंचको छोड़कर, ब्रह्मपदको जानकर उसीमें प्रवेश कर; और हे मूढ! सदा! गोविन्दको भज
काम, क्रोध, लोभ, मोहको त्यागकर अपने लिये विचार कर कि ‘मैं कौन हूँ’ जो मूढ़ आत्मज्ञानसे रहित हैं, वे नरकमें पड़े हुए सन्तप्त होते रहते हैं; अतः सदा गोविन्दको भज
देवमन्दिर अथवा वृक्षतलका निवास, पृथ्वीकी ही शय्या, मृगचर्मका वस्त्र और सब प्रकारके परिग्रह और भोगोंका त्याग है, ऐसा वैराग्य किसको सुख नहीं पहुँचाता ? अतः सदा गोविन्दको भज
यदि तू शीघ्र विष्णुत्वकी प्राप्तिका अभिलाषी है तो शत्रु, मित्र, पुत्र और बन्धुओंसे मेल अथवा अनमेलका प्रयत्न मत कर और सर्वत्र समभाव रख तथा निरन्तर गोविन्दको भज
तुझमें, मुझमें और अन्यत्र भी सबमें एक ही वासुदेव हैं, इसलिये कोप करना व्यर्थ है, सबको सहन करनेवाला हो, आत्माको ही सबमें देख, भेदरूपी अज्ञानको सर्वत्र त्याग दे और सर्वदा गोविन्दका भजन कर
प्राणायाम, प्रत्याहार और नित्यानित्य वस्तुका विवेकपूर्वक विचार कर, विधिपूर्वक भगवन्नामस्मरणके सहित ध्यान करनेका निश्चय कर; क्योंकि यही महान् निश्चय है और सदा गोविन्दका भजन कर
कमलपत्रपर पड़ी हुई बूँद जैसे स्थिर नहीं होती है वैसा ही अति चंचल यह जीवन है; इसे खूब समझ ले, व्याधि और अभिमानसे ग्रस्त हुआ यह सारा संसार अति शोकाकुल है, अतः तू सदा गोविन्दका भजन कर
रे पागल जीव! तू अठारह जगहकी चिन्ता क्यों कर रहा है, क्या तुम्हारा कोई नियन्ता नहीं है? जो तुम्हारे दोनों हाथ खूब कसके बाँधकर तुम्हें जन्म-मरणादि विकारोंसे रहित आत्मतत्त्वका बोध करा दे; अरे मूढ! सर्वदा गोविन्दका भजन कर
गुरुदेवके चरणकमलोंका अनन्य भक्त होकर संसारसे शीघ्र ही मुक्त हो जा, इस प्रकार इन्द्रियोंके सहित मनका संयम करनेसे तू शीघ्र ही अपने हृदयस्थ देवको देखेगा; अतः निरन्तर गोविन्दका भजन कर
यह द्वादशपंजरिकास्तोत्र शिष्योंके उपदेशके लिये कहा गया है, जिनके हृदयमें विवेक नहीं है, वे दीर्घकालतक नरकयातना भोगते हैं; अतः हे मूढमते! तू निरन्तर गोविन्दका भजन कर
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं द्वादशपञ्जरिकास्तोत्रं सम्पूर्णम्।
More scriptures