SANATANI
Shri Vedavyasa · Stotra · 12 verses
ध्रुव उवाच
ध्रुवजी बोले—जो सर्वशक्तिसम्पन्न श्रीहरि मेरे अन्तःकरणमें प्रवेशकर अपने तेजसे मेरी इस सोयी हुई वाणीको सजीव करते हैं तथा हाथ, पैर, कान और त्वचा आदि अन्य इन्द्रियोंको भी चैतन्य प्रदान करते हैं, वे अन्तर्यामी भगवान् आप ही हैं, आपको प्रणाम है
भगवन्! आप अकेले ही अपनी अनन्त गुणमयी मायाशक्तिसे इस महदादि सम्पूर्ण जगत्को रचकर उसके इन्द्रियादि असत् गुणोंमें जीवरूपसे अनुप्रविष्ट हो इस प्रकार अनेकवत् भासते हैं, जैसे नाना प्रकारके काष्ठोंमें प्रकट हुई आग अपनी उपाधिजाके अनुसार भिन्न-भिन्न रूपसे भासती है
हे नाथ! ब्रह्माजीने भी आपकी शरणमें आकर आपके दिये हुए ज्ञानके प्रभावसे इस जगत्को सोकर उठे हुए पुरुषके समान देखा था। हे दीनबन्धो! मुक्त पुरुषोंके भी आश्रय करनेयोग्य आपके चरणोंको कृतज्ञ पुरुष कैसे भूल सकता है?
जिनके संसर्गसे होनेवाला सुख नरकतुल्य योनिमें भी प्राप्त हो सकता है, उन शवतुल्य शरीरसे भोगे जानेयोग्य विषयोंकी जो पुरुष इच्छा करते हैं और जो जन्म-मरणरूप संसारसे छुड़ानेवाले कल्पवृक्षरूप आपकी मोक्षके सिवा किसी और हेतुसे उपासना करते हैं, अवश्य ही उनकी बुद्धिको आपकी मायाने ठग लिया है
आपके चरणकमलोंका ध्यान करनेसे अथवा आपके भक्तोंकी कथाएँ सुननेसे प्राणियोंको जो आनन्द प्राप्त होता है, वह अपने स्वरूपभूत ब्रह्ममें भी नहीं मिल सकता है; फिर जिनको कालकी तलवार खण्डित कर डालती है, उन स्वर्गके विमानोंसे गिरनेवाले पुरुषोंको तो वह मिल ही कैसे सकता है
अतः हे अनन्त! आपमें निरन्तर भक्तिभाव रखनेवाले शुद्धचित्त महापुरुषोंसे ही मेरा बारंबार समागम हो, जिससे मैं आपके गुणोंके कथामृतका पान करनेसे उन्मत्त होकर अति उग्र और नाना प्रकारके दुःखोंसे पूर्ण इस संसार-सागरको सुगमतासे ही पार कर लूँ
हे कमलनाभ! आपके चरणकमलोंकी सुगन्धमें जिनका चित्त लुभाया हुआ है, उन महापुरुषोंका जो लोग समागम करते हैं, हे ईश! वे अपने इस अत्यन्त प्रिय शरीर और इसके सम्बन्धी पुत्र, मित्र, गृह और स्त्री आदिका स्मरण भी नहीं करते
हे अज! मैं तो पशु आदि तिर्यग्योनि, पर्वत, पक्षी, सर्प, देवता, दैत्य और मनुष्य आदिसे परिपूर्ण तथा महत्तत्त्वादि अनेकों कारणोंसे सम्पादित आपके इस सदसत्स्वरूप स्थूल शरीरको ही जानता हूँ। इसके परे जो आपका परम स्वरूप है, जिसमें वाणीकी गति नहीं है, उसको मैं नहीं जानता
हे नाथ! कल्पके अन्तमें जो स्वयंप्रकाश परमपुरुष भगवान् इस सम्पूर्ण जगत्को अपने उदरमें लीन करके शेषनागका सहारा ले उनकी गोदमें शयन करते हैं तथा जिनके नाभिसिन्धुसे प्रकट हुए सकल लोकोंके उत्पत्तिस्थान सुवर्णमय कमलसे परम तेजोमय ब्रह्माजी उत्पन्न हुए हैं, उन्हीं आप परमेश्वरको मैं प्रणाम करता हूँ
हे प्रभो! आप जीवात्मासे भिन्न अर्थात् पुरुषोत्तम हैं; क्योंकि आप नित्यमुक्त, नित्यशुद्ध, चेतन, आत्मा, निर्विकार, आदिपुरुष, षडैश्वर्यसम्पन्न, तीनों लोकोंके स्वामी और अपनी दृष्टिसे बुद्धिकी अवस्थाओंको अखण्डरूपसे देखनेवाले हैं। संसारकी स्थितिके लिये ही आप यज्ञपुरुष श्रीविष्णुभगवान्के रूपसे स्थित हैं
जिनसे विद्या, अविद्या आदि विरुद्ध गतियोंवाली अनेक शक्तियाँ क्रमशः अहर्निश प्रकट होती हैं, उन विश्वकी उत्पत्ति करनेवाले एक, अनन्त, आद्य, आनन्दमात्र एवं निर्विकार ब्रह्मकी मैं शरण लेता हूँ
हे भगवन्! ‘आप परम पुरुषार्थस्वरूप हैं’ ऐसा समझकर जो निष्काम-भावसे निरन्तर आपका भजन करते हैं, उन श्रेष्ठ भक्तोंके लिये राज्यादि भोगोंकी अपेक्षा पुरुषार्थस्वरूप आपके चरणकमलोंकी प्राप्ति ही भजनका यथार्थ फल है। यद्यपि यही ठीक है तो भी गौ जैसे अपने तुरंतके जन्मे हुए बछड़ेको दूध पिलाती और व्याघ्रादिसे बचाती है, उसी प्रकार भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये सदा विकल रहनेवाले आप हम-जैसे सकाम भक्तोंको भी हमारी कामना पूर्ण करके संसारसागरसे बचाते हैं
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे चतुर्थस्कन्धे नवमेऽध्याये ध्रुवकृत भगवत्स्तुतिः सम्पूर्णा।
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