SANATANI
Adi Shankaracharya · Stotra · 10 verses
जो इन्द्रियोंको शान्त करनेवाला है, वही ज्ञान है। जो उपनिषदोंका निश्चितार्थ है, वही ज्ञेय है। जिनकी समस्त चेष्टाएँ परमार्थदृष्टिसे ही होती हैं, वे ही पृथ्वीतलमें धन्य हैं और सब तो भूलभुलैयेमें ही भटकते रहते हैं
प्रथम विषयसमूह तथा मद, मोह, राग और द्वेष आदि शत्रुओंको जीतकर, योगसाम्राज्यको पाकर, अमृतपदका ज्ञान प्राप्तकर, ब्रह्मविद्यारूपिणी कान्ताका सुखानुभव करते हुए, मानो घरमें ही विचरण करते हैं, वे योगीजन धन्य हैं
अधोगतिके हेतुभूत घरके मोहको छोड़कर, आत्मजिज्ञासासे उपनिषदर्थभूत ब्रह्मानन्दका पान करते हुए, निःस्पृह होकर, विषय-भोगोंसे विरक्त हो, जो निःसंगभावसे जनशून्य स्थानोंमें विचरते हैं, वे धन्य हैं
जो मैं और मेरा रूप दोनों बन्धनकारी भावोंको छोड़कर, मानापमानको समान समझते हुए, समदर्शी होकर तथा अपनेसे पृथग्भूत कर्ताको जानकर सम्पूर्ण कर्मफल उसको समर्पण करते हैं, वे पुरुष धन्य हैं
लोकैषणा, पुत्रैषणा तथा वित्तैषणा—तीनोंको छोड़कर मुक्तिमार्गका अनुशीलन करके भिक्षामृतसे शरीरयात्राका निर्वाह करते हुए; जो परमात्मसंज्ञक परात्पर ज्योतिको एकान्तदेशमें अपने हृदयमें अवलोकन करते हैं, वे द्विज धन्य हैं
जो न असत् है, न सत् है और न सदसत् है; न महान् है, न अणु है; न स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक है; संसारका एकमात्र कारण है, उस ब्रह्मकी जिन्होंने उपासना की है, एकाग्रचित्त वे ही धन्य पुरुष सुशोभित होते हैं, और तो सब संसारबन्धनमें बँधे हुए हैं
जो पंकमें सने हुए, अज्ञान, निःसार, दुःखरूप, जन्मजरामरणादिसमन्वित, संसारबन्धनको अनित्य देखकर उसको ज्ञानरूपी खड्गसे काटकर आत्मतत्त्वका निश्चय करते हैं, वे पुरुष धन्य हैं
जिन्होंने मनके द्वारा एकत्वका निश्चय किया है और मोहको त्याग दिया है ऐसे शान्त, अनन्यमति और कोमलचित्त महात्माओंके साथ जो लोग वनमें शास्त्रोंद्वारा आत्मतत्त्वका निरन्तर विचार करते हैं, वे धन्य हैं
जो जनसमूहको सदा सर्प-सहवासके समान त्यागता है, सुन्दर स्त्रीकी वैराग्यभावसे शवके समान उपेक्षा करता है, दुस्त्यज विषयोंको विषके समान छोड़ता है, उस परमहंसकी जय हो, जय हो। वही मुक्तिको प्राप्त होता है
जिसने परब्रह्मका साक्षात्कार कर लिया है, उसके लिये सारा संसार नन्दनवन है, समस्त वृक्ष कल्पवृक्ष हैं, सम्पूर्ण जल गंगाजल है, उसकी सारी क्रियाएँ पवित्र हैं, उसकी वाणी प्राकृत हो अथवा संस्कृत हो वेदकी सारभूत है, उसके लिये सम्पूर्ण भूमण्डल काशी (मुक्तिक्षेत्र) ही है तथा और भी उसकी जो-जो चेष्टाएँ हैं, सब परमार्थमयी ही हैं
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं धन्याष्टकं सम्पूर्णम्।
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