SANATANI
Shrimad Bhagavatam · Stotra · 7 verses
श्रीभगवानुवाच
श्रीभगवानुवाच
श्रीभगवान् बोले—[हे चतुरानन!] मेरा जो ज्ञान परम गोप्य है, विज्ञान (अनुभव) से युक्त है और भक्तिके सहित है उसको और उसके साधनको मैं कहता हूँ सुनो
मेरे जितने स्वरूप हैं, जिस प्रकार मेरी सत्ता है और जो मेरे रूप, गुण, कर्म हैं, मेरी कृपासे तुमको उसी प्रकार तत्त्वका विज्ञान हो
सृष्टिके पूर्व केवल मैं ही था, मेरे अतिरिक्त जो स्थूल, सूक्ष्म या प्रकृति हैं—इनमेंसे कुछ भी न था, सृष्टिके पश्चात् भी मैं ही था, जो यह जगत् (दृश्यमान) है, यह भी मैं ही हूँ और प्रलयकालमें जो शेष रहता है वह मैं ही हूँ
जिसके कारण आत्मामें वास्तविक अर्थके न रहते हुए भी उसकी प्रतीति हो और अर्थके रहते हुए भी उसकी प्रतीति न हो, उसीको मेरी माया जानो; जैसे आभास (एक चन्द्रमामें दो चन्द्रमाका भ्रमात्मक ज्ञान) और जैसे राहु (राहु जैसे ग्रहमण्डलोंमें स्थित होकर भी नहीं दीख पड़ता)
जैसे पाँच महाभूत उच्चावच भौतिक पदार्थोंमें कार्य और कारणभावसे प्रविष्ट और अप्रविष्ट रहते हैं, उसी प्रकार मैं इन भौतिक पदार्थोंमें प्रविष्ट और अप्रविष्ट भी रहता हूँ। [इस प्रकार मेरी सत्ता है]
आत्माके तत्त्व जिज्ञासुके लिये इतना ही जिज्ञास्य है, जो अन्वयव्यतिरेकसे सर्वत्र और सर्वदा रहे वही आत्मा है
चित्तकी परम एकाग्रतासे इस मतका अनुष्ठान करें, कल्पकी विविध सृष्टियोंमें आपको कभी भी कर्तापनका अभिमान न होगा
इति श्रीमद्भागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां वैयासिक्यां द्वितीयस्कन्धे भगवद्ब्रह्मसंवादे चतुःश्लोकी भागवतं समाप्तम्।
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