SANATANI
Adi Shankaracharya · Stotra · 17 verses
दिन और रात, सायंकाल और प्रातःकाल, शिशिर और वसन्त पुनः-पुनः आते हैं; इसी प्रकार कालकी लीला होती रहती है और आयु बीत जाती है, किन्तु आशारूपी वायु छोड़ती ही नहीं; अतः हे मूढ! निरन्तर गोविन्दको ही भज, क्योंकि मृत्युके समीप आनेपर ‘डुकृञ् करणे’ यह रटना रक्षा नहीं कर सकेगी
भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते। प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ् करणे॥
दिनमें आगे अग्नि और पीछे सूर्यसे शरीर तपाते हैं, रात्रिके समय जानुओंमें ठोड़ी दबाये पड़े रहते हैं, हाथमें ही भिक्षा माँग लाते हैं, वृक्षके तले ही पड़े रहते हैं, फिर भी आशाका जाल जकड़े ही रहता है; अतः हे मूढ! निरन्तर गोविन्दको ही भज, क्योंकि मृत्युके समीप आनेपर ‘डुकृञ् करणे’ यह रटना रक्षा नहीं कर सकेगी
अरे, जबतक तू धन कमानेमें लगा हुआ है तभीतक तेरा परिवार तुझसे प्रेम करता है, जब जराग्रस्त होगा तो घरमें कोई बात भी न पूछेगा; अतः हे मूढ! निरन्तर गोविन्दको ही भज, क्योंकि मृत्युके समीप आनेपर ‘डुकृञ् करणे’ यह रटना रक्षा न कर सकेगी
जटाजूटधारी होकर, मुण्डित होकर, लुंचितकेश होकर, काषायाम्बरधारी होकर, ऐसे नाना प्रकारके वेष धारण करके यह मनुष्य देखता हुआ भी नहीं देखता और पेटके लिये ही नाना प्रकारसे शोक किया करता है; अतः हे मूढ! निरन्तर गोविन्दको ही भज, क्योंकि मृत्युके समीप आनेपर यह ‘डुकृञ् करणे’ रटना रक्षा न कर सकेगी
जिसने भगवद्गीताको कुछ भी पढ़ा है, गंगाजलकी जिसने एक बूँद भी पी है, एक बार भी जिसने भगवान् कृष्णचन्द्रका अर्चन किया है, उसकी यमराज क्या चर्चा कर सकता है? अतः हे मूढ! निरन्तर गोविन्दको ही भज, क्योंकि मृत्युके समीप आनेपर ‘डुकृञ् करणे’ रटना रक्षा न कर सकेगी
अंग गलित हो गये, सिरके बाल पक गये, मुखमें दाँत नहीं रहे, बूढ़ा हो गया, लाठी लेकर चलने लगा, फिर भी आशा पिण्ड नहीं छोड़ती; अरे मूढ! निरन्तर गोविन्दको भज, क्योंकि मृत्युके समीप आनेपर ‘डुकृञ् करणे’ रटना रक्षा न कर सकेगी
बालक तो खेल-कूदमें आसक्त रहता है, तरुण तो स्त्रीमें आसक्त है और वृद्ध भी नाना प्रकारकी चिन्ताओंमें मग्न रहता है, परब्रह्ममें तो कोई संलग्न नहीं होता; अतः अरे मूढ! तू सदा गोविन्दका ही भजन कर, क्योंकि मृत्युके समीप आनेपर ‘डुकृञ् करणे’ यह रटना रक्षा न कर सकेगी
इस संसारमें पुनः-पुनः जन्म, पुनः-पुनः मरण और बारंबार माताके गर्भमें रहना पड़ता है, अतः हे मुरारे! मैं आपकी शरण हूँ, इस दुस्तर और अपार संसारसे कृपया पार कीजिये; इस प्रकार अरे मूढ! तू तो सदा गोविन्दका ही भजन कर, क्योंकि मृत्युके समीप आनेपर ‘डुकृञ् करणे’ यह रटना रक्षा न कर सकेगी
रात्रि, दिन, पक्ष, मास, अयन और वर्ष कितनी ही बार आये और गये तो भी लोग ईर्ष्या और आशाको नहीं छोड़ते, अतः अरे मूढ! तू सदा गोविन्दका भजन कर, क्योंकि मृत्युके समीप आनेपर यह ‘डुकृञ् करणे’ रटना रक्षा न कर सकेगी
अवस्था ढलनेपर काम-विकार कैसा ? जल सूखनेपर जलाशय क्या ? तथा धन नष्ट होनेपर परिवार ही क्या ? इसी प्रकार तत्त्वज्ञान होनेपर संसार ही कहाँ रह सकता है ? अतः हे मूढ! सदा गोविन्दको भज, क्योंकि मृत्युके समीप आनेपर यह ‘डुकृञ् करणे’ रटना रक्षा न कर सकेगी
नारीके स्तनों और नाभिनिवेशमें मिथ्या माया और मोहका ही आवेश है, ये मांस और मेदके ही विकार हैं—ऐसा बार-बार मनमें विचार, हे मूढ! सदा गोविन्दका भजन कर, क्योंकि मृत्युके समीप आनेपर यह ‘डुकृञ् करणे’ रटना रक्षा न कर सकेगी
स्वप्नवत् मिथ्या संसारकी आस्था छोड़कर ‘तू कौन है, मैं कौन हूँ कहाँसे आया हूँ, मेरी माता कौन है और पिता कौन है ?’—इस प्रकार सबको असार समझ तथा हे मूढ! निरन्तर गोविन्दका भजन कर, क्योंकि मृत्युके निकट आनेपर ‘डुकृञ् करणे’ यह रटना रक्षा न कर सकेगी
गीता और विष्णुसहस्रनामका नित्य पाठ करना चाहिये, भगवान् विष्णुके स्वरूपका निरन्तर ध्यान करना चाहिये, चित्तको संतजनोंके संगमें लगाना चाहिये और दीनजनोंको धन दान करना चाहिये और हे मूढ! नित्य गोविन्दका ही भजन कर, क्योंकि मृत्युके निकट आनेपर ‘डुकृञ् करणे’ यह रटना रक्षा न कर सकेगी
जबतक प्राण शरीरमें है तबतक ही लोग घरमें कुशल पूछते हैं, प्राण निकलनेपर शरीरका पतन हुआ कि फिर अपनी स्त्री भी उससे भय मानती है; अतः हे मूढ! नित्य गोविन्दको ही भज, क्योंकि मृत्युके निकट आनेपर ‘डुकृञ् करणे’ यह रटना रक्षा न कर सकेगी
पहले तो सुखसे स्त्री-सम्भोग किया जाता है, किन्तु पीछे शरीरमें रोग घर कर लेते हैं, यद्यपि संसारमें मरना अवश्य है तथापि लोग पापाचरणको नहीं छोड़ते; अतः हे मूढ! सदा गोविन्दका भजन कर, क्योंकि मृत्युके निकट आनेपर ‘डुकृञ् करणे’ यह रटना रक्षा न कर सकेगी
गलीमें पड़े चिथड़ोंकी कन्था बना ली, पुण्यापुण्यसे निराला मार्ग अवलम्बन कर लिया, ‘न मैं हूँ, न तू है और न यह संसार है’—(ऐसा भी जान लिया), फिर भी किस लिये शोक किया जाता है? अतः हे मूढ! सदा गोविन्दका भजन कर, क्योंकि मृत्युके निकट आनेपर ‘डुकृञ् करणे’ यह रटना रक्षा न कर सकेगी
चाहे गंगा-सागरको जाय, चाहे नाना व्रतोपवासोंका पालन अथवा दान करे तथापि बिना ज्ञानके इन सबसे सौ जन्ममें भी मुक्ति नहीं हो सकती; अतः हे मूढ! सर्वदा गोविन्दका भजन कर, क्योंकि मृत्युके निकट आनेपर ‘डुकृञ् करणे’ (अथवा हा धन! हा कुटुम्ब!! हा संसार!!!) यह रटना रक्षा न कर सकेगी
इति श्रीशङ्कराचार्यविरचितं चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रं सम्पूर्णम्।
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