SANATANI
Bhishma · Stotra · 11 verses
भीष्म उवाच
भीष्मजी बोले—जो निजानन्दमें मग्न है और कभी विहार (लीला) करनेकी इच्छासे प्रकृतिको स्वीकार करता है तब उससे संसारका प्रवाह चलता है ऐसे भूमास्वरूप, यदुश्रेष्ठ भगवान् कृष्णमें मैंने अपनी तृष्णारहित बुद्धि समर्पित कर दी है
त्रिभुवनसुन्दर तमालवर्ण सूर्यकिरणोंके समान उज्ज्वल और पवित्र वस्त्र धारण करनेवाले तथा जिनका मुखकमल अलकावलीसे आवृत है, उन अर्जुन-सखामें मेरी निष्काम प्रीति हो
युद्धमें घोड़ोंकी टापसे उड़ी हुई रजसे धूसरित तथा चारों ओर छिटकी हुई अलकोंवाले, परिश्रमजन्य पसीनेकी बूँदोंसे सुशोभित मुखवाले और मेरे तीक्ष्ण बाणोंसे विदीर्ण हुई त्वचावाले, सुन्दर कवचधारी कृष्णमें मेरी आत्मा प्रवेश करे
सखाके वचनोंको सुनकर शीघ्र ही अपनी और विपक्षियोंकी सेनाओंके बीचमें रथको खड़ा करके अपने भृकुटि-विलाससे विपक्षी सैनिकोंकी आयुको हरनेवाले पार्थ-सखामें मेरी प्रीति हो
दूर खड़ी सेनाके मुखका निरीक्षण करके स्वजन-वधमें दोषबुद्धिसे निवृत्त हुए अर्जुनकी कुमतिको जिसने आत्मविद्या (गीता-ज्ञान) द्वारा हर लिया था, उस परमपुरुष (कृष्ण)के चरणोंमें मेरी प्रीति हो
मेरी प्रतिज्ञाको सत्य करनेके लिये, अपनी प्रतिज्ञा छोड़कर रथसे उतर पड़े और सिंह जैसे हाथीको मारने दौड़ता है उसी तरह चक्रको लेकर पृथ्वी कँपाते हुए कृष्ण (मेरी ओर) दौड़े, उस समय शीघ्रताके कारण उनका दुपट्टा (पृथ्वीको सान्त्वना देनेके लिये) गिर पड़ा था
मुझ आततायीके तीक्ष्ण बाणोंसे विदीर्ण होकर, फटे हुए कवचवाले, घाव और रुधिरसे सने हुए, जो भगवान् मुकुन्द मुझे हठपूर्वक मारनेको दौड़े, वे मेरी गति हों
अर्जुनके रथमें—चाबुक लेकर और घोड़ोंकी लगाम पकड़कर बैठे हुए (अहा!) ऐसी शोभासे दर्शनीय भगवान्में मुझ मरणाकांक्षीकी प्रीति हो; जिनका दर्शन करके इस युद्धमें मरे हुए वीर भगवत्-स्वरूपको प्राप्त हो गये हैं
ललित गति, विलास, मनोहर हास्य और प्रेमपूर्ण निरीक्षणके समय बहुत मान धारण करनेवाली तथा (कृष्णके अन्तर्धान हो जानेपर) उन्मत्त होकर भगवत्-चरित्रोंका अनुकरण करनेवाली गोपवधुएँ जिनके स्वरूपको निश्चय ही प्राप्त हो गयीं
युधिष्ठिरके राजसूययज्ञमें, मुनिगण और नृपतियोंके समक्ष जिनकी अग्रपूजा हुई, अहो! ऐसे दर्शनीय भगवान् ही ये मेरी दृष्टिके सामने प्रकट हुए हैं
मैं भेद और मोहसे रहित होकर अपने ही रचे हुए प्रत्येक शरीरधारीके हृदयमें स्थित सूर्यकी तरह एक होते हुए भी नाना दृष्टिसे अनेक रूप दीखनेवाले और जन्मरहित इस परमात्मा (कृष्ण) की शरणमें जाता हूँ।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे प्रथमस्कन्धे नवमेऽध्याये भीष्मकृता भगवत्स्तुतिः सम्पूर्णा।
More scriptures