SANATANI
Brahmananda Swami · Stotra · 22 verses
भक्तोंपर दया करनेवाले और मायासे संसारकी रचना करानेवाले सच्चिदानन्दरूप महेश्वरको बारम्बार नमस्कार है
हे भगवन्! इस संसारमें प्रबल रोग सर्वदा शरीरको क्षीण करते रहते हैं, काम आदि भी प्रतिदिन हृदयको जलाते रहते हैं और मृत्यु भी दिनोंको गिनती हुई पास ही नृत्य करती रहती है। इसलिये हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं
सदा ही परिवर्तनशील यह शरीर नष्ट होता जा रहा है और विषयोंमें आसक्त रहनेवाला चित्त सदा ही खिन्न रहा करता है। मेरी बुद्धि भी सदा विषयोंमें ही रमती है, अन्तरात्मामें नहीं। इसलिये हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं
कष्टकी बात है कि कच्चे घड़ेमें रखे हुए जलकी तरह आयुका नाश हो रहा है, यौवनकी शोभा बिजलीकी चमक-सी क्षणभंगुर है और वृद्धावस्था सिंहनीकी भाँति (खानेके लिये) दौड़ी चली आ रही है, इस कारण हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं
हे भगवन्! मेरे पास आयसे व्यय ही अधिक है, क्योंकि मुझ अविनीतपर कामादि ही बली होते हैं [उन्हींका मुझपर प्रभाव है] और शम आदि निर्बल रहते हैं [इनका मुझपर वश नहीं चलता]। खेद है कि जब मुझे मृत्यु पीड़ित करेगी, उस समय मैं क्या कह सकूँगा? इसलिये हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं
हे भगवन्! मैंने इस जीवनमें कभी शरीरसे तप नहीं किया, सदा असत्य भाषणमें लगे रहकर कभी वाणीसे भी तप नहीं किया और मानस तप तो कभी किया ही नहीं, अतः हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं
हे भगवन्! मेरा मन सदा ही स्तब्ध—जडवत् ज्ञानशून्य रहा है, इस कारण सौम्य (विशुद्ध एवं विनम्र) नहीं हो रहा है और मेरी आँखें आपके विश्वरूपका दर्शन नहीं कर पातीं, इसी प्रकार मेरी जिह्वा भी कोमल वाणी नहीं बोलती। अतः हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं
रजोगुण और तमोगुणसे विद्ध हुए मेरे हृदयमें सत्त्वगुण नहीं आने पाता। अहो! ऐसी स्थितिमें शुभ कर्मोंका करना तो दूर रहा उनकी बात भी कैसे की जा सकती है और साक्षात् अथवा परम्परासे वह (शुभ कर्म) ही सुखका साधन है, [सो मुझमें नहीं है ] इसलिये हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं
हे भगवन्! मैंने कभी भी आपकी पूजा नहीं की, मेरी जिह्वा आपके मन्त्रको भी नहीं जपती और न मेरा चित्त आपके चरणोंको पाकर उनका चिन्तन ही करता है; इसलिये हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं
हे भगवन्! मैंने हवन, दान, दया आदिसे युक्त यज्ञ नहीं किया और न ज्ञानके साधनसमूह विवेक आदिको ही प्राप्त किया। साधनसमूहके बिना ज्ञान कैसे हो सकता है? और बिना ज्ञानके मोक्ष कैसे हो सकता है ? इसलिये हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं
हे भगवन्! यह प्रसिद्ध है कि आपकी भक्तिका कारण सत्संग है, पर खेद है कि अपनेको पण्डित माननेवाले मुझमें वह (सत्संग) भी नहीं है। सत्संगके बिना भगवद्भक्ति नहीं होती; फिर ज्ञानकी तो बात ही कहाँ हो सकती है? इसलिये हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं
हे भगवन्! मेरी दृष्टि प्राणियोंमें समान नहीं रहती है, अपितु यह प्राणियोंमें विषम भावनाको ही अपनाती है। यदि मेरी दृष्टिमें समता नहीं हुई तो मुझमें शान्ति कैसे प्राप्त हो सकती है ? इसलिये हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं
हे नाथ! अपने बराबरवालोंमें मेरी मित्रता नहीं है और मैंने न तो कभी दीनोंपर दया दिखायी और न कभी पुण्यके विषयमें प्रसन्नता ही प्रकट की। जब मैंने पापमें उपेक्षा नहीं दिखायी तो मुझे प्रसन्नता कैसे मिले ? इसलिये हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं
हे भगवन्! मेरी नेत्रादि इन्द्रियाँ बाह्य-विषयोंमें ही आसक्त हैं, इनकी वृत्ति अन्तर्मुखी नहीं होती, भला विषयोंको त्यागे बिना ही इन्द्रियोंमें अन्तर्मुखता कहाँसे होगी? और इन्द्रियोंके अन्तर्मुख हुए बिना सुखकी वार्ता कहाँ ? इसलिये हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं
हे भगवन्! मैंने सांसारिक दुःखोंकी शान्तिके लिये स्त्री-गृह आदि सबका परित्याग कर दिया, किन्तु आपकी मायाने मेरे मनको हर लिया, इससे दुःखोंकी शान्ति नहीं हुई। अब समझमें नहीं आता इस समय आपकी माया और क्या-क्या करेगी ? इसलिये हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं
हे प्रभो! प्राप्त हुए धन, गृह, परिवार, हाथी एवं घोड़े, स्त्री आदि तथा इस पृथ्वी अथवा इन्द्रपुरीका राज्य—ये सब वस्तुएँ नश्वर हैं, किसी भी अच्छे फलको देनेवाली नहीं हैं; इस कारण हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं
हे भगवन्! मैंने प्राणायामके द्वारा योग (ध्यान) नहीं किया; बिना योगके मेरा मन स्थिर कैसे हो सकता है और स्थिरताके बिना चित्तमें शान्ति कथनमात्रके लिये भी नहीं हो सकती, इस कारण हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं
हे भगवन्! मैंने गुरुजनोंकी ऐसी सेवा भी कभी नहीं की, जिससे उनकी कृपा प्राप्त होकर उसके द्वारा मुझमें यथावत् ज्ञान होता, गुरुजनोंकी सेवा भी ज्ञानका साधन है ऐसा मैंने कभी मनमें जाना ही नहीं, इस कारण हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं
हे नाथ! यह दुःखकी बात है कि मैंने विधिसे तीर्थ आदिका सेवन नहीं किया, जिससे मेरे मनकी शुद्धि हो, मनकी शुद्धिके बिना ज्ञान और मोक्ष नहीं होते; इस कारण हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं
हे प्रभो! आत्मा ही ब्रह्म है, इसके यथार्थ ज्ञानके साधनमें लगे हुए पुरुषको वेदान्त ब्रह्मतत्त्वका यथावत् ज्ञान करा देता है, परन्तु मुझमें तो उस सत्य ज्ञानके साधनका अंशमात्र भी नहीं है, इस कारण हे दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं
हे गोविन्द! हे शंकर! हे हरे! हे गिरिजापते! हे लक्ष्मीपते! हे शम्भो! हे जनार्दन! हे पार्वती माताके सहित गिरीश! हे मुकुन्द! मेरे लिये आप दोनों (इष्टदेवों) के अतिरिक्त किसी प्रकार कोई भी दूसरा सहारा नहीं है, इसलिये हे प्रभो! कृपा करके मुझे सद्गति प्रदान कीजिये
जो मनुष्य विनीतभावसे इस भगवच्छरण नामक स्तोत्रका प्रतिदिन पाठ करेंगे वे संसारकी आसक्ति त्यागकर परमशान्ति और परमात्माकी साक्षात् भक्ति प्राप्त करेंगे
इति श्रीब्रह्मानन्दविरचितं भगवच्छरणस्तोत्रं सम्पूर्णम्।
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