SANATANI
Adi Shankaracharya · Stotra · 20 verses
हे भवानि! प्रजापति ब्रह्माजी अपने चार मुखोंसे भी तुम्हारी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हैं, त्रिपुरविनाशक महादेवजी पाँच मुखोंसे भी तुम्हारा स्तवन नहीं कर सकते, कार्तिकेयजी तो छः मुखोंके रहते हुए भी असमर्थ हैं, इने-गिने मुखवालोंकी तो बात ही क्या है, नागराज शेष हजार मुखोंसे भी तुम्हारा गुणगान नहीं कर पाते, फिर तुम्हीं बताओ, जब इनकी यह दशा है तो दूसरे किसीको और किस प्रकार तुम्हारी स्तुतिका अवसर प्राप्त हो सकता है?
घी, दूध, दाख और मधुकी मधुरताको किसी भी शब्दसे विशेषरूपसे नहीं बताया जा सकता, उसे तो केवल रसना (जिह्वा) ही जानती है। इसी प्रकार तुम्हारा सौन्दर्य केवल महादेवजीके नेत्रोंका ही विषय है, उसे हम क्योंकर बतावें? हे देवि! तुम्हारे गुणोंका वर्णन तो सारे वेद भी नहीं कर सकते
तुम्हारे मुखमें पान है, नेत्रोंमें काजलकी पतली रेखा है, ललाटमें केसरकी बेंदी है, गलेमें मोतीका हार सुशोभित हो रहा है, कटिके निम्नभागमें सुनहली साड़ी है, जिसपर रत्नमयी मेखला (करधनी) चमक रही है, ऐसी वेष-भूषासे सजी हुई गिरिराज हिमालयकी गौरवर्णा कन्या तुमको मैं सदा ही भजता हूँ
जहाँ पारिजात-पुष्पकी माला सुशोभित हो रही है, उन उरोजोंके समीप बजती हुई वीणाका मधुर नाद श्रवण करते हुए जिनके कानोंमें कुण्डल शोभा पा रहे हैं, जिनका अंग झुका हुआ है, हथिनीकी भाँति जिनकी मन्द-मनोहर चाल है, जिनके नेत्र कमलके समान सुन्दर और चंचल हैं, वे शम्भुकी सती भार्या भगवती उमा सर्वत्र विजयिनी हो रही हैं
जिनका अंग नवोदित बाल रविके समान देदीप्यमान मणि और सोनेके आभूषणोंसे अलंकृत है, मृगीके समान जिनके विशाल एवं सुन्दर नेत्र हैं, जिन्होंने शिवको पतिरूपसे स्वीकार किया है, बिजलीके समान जिनकी पीत प्रभा है, जो पीत वस्त्रकी प्रभा पड़नेसे और अधिक सुन्दर प्रतीत होनेवाले मंजीरको चरणोंमें धारण करके सुशोभित हो रही हैं, वे निरतिशय आनन्दसे पूर्ण भगवती अपर्णा मुझपर सुप्रसन्न हों
समस्त रोगोंको नष्ट करनेवाली एक चलती-फिरती चिदानन्दमयी लता (उमा) सुशोभित हो रही है, वह हिमालयसे उत्पन्न हुई है, सुन्दर हाथ ही उसके पल्लव हैं, मुक्ताका हार ही सुन्दर फूल है, काली-काली अलकें भ्रमरोंकी भाँति उसे आच्छन्न किये हुई हैं, स्थाणु (शंकरजी अथवा ठूँठ वृक्ष) ही उसके रहनेका आश्रय है, उरोजरूपी फलोंके भारसे वह झुकी हुई है और सुन्दर वाणीरूपी रससे भरी है
दूसरे लोग कुछ ही गुणोंसे युक्त सपर्णा (पत्तेवाली) लताका आदरपूर्वक सेवन करते हैं, परन्तु हमारी बुद्धि तो इस प्रकार स्फुरित होती है कि इस जगत्में सभी लोगोंको एकमात्र अपर्णा (पार्वती या बिना पत्तेकी लता) का ही सेवन करना चाहिये, जिससे आवृत होकर पुराना स्थाणु (ठूँठ वृक्ष अथवा शिव) भी कैवल्यपदवी (मोक्ष) रूप फल देता है
सम्पूर्ण धर्मोंकी सृष्टि करनेवाली और समस्त आगमोंको जन्म देनेवाली तुम्हीं हो। हे देवि! कुबेर भी तुम्हारे चरणोंकी वन्दना करते हैं, तुम्हीं समस्त वैभवका मूल हो। हे कामदेवपर विजय पानेवाली माँ ! कामनाओंकी आदि कारण भी तुम्हीं हो। तुम परब्रह्मस्वरूप महेश्वरकी पटरानी हो। अतः तुम्हीं संतोंके मोक्षका बीज हो
मेरा मन चंचल है, इसलिये यद्यपि मैंने आपकी प्रचुर भक्ति नहीं की है तथापि आप श्रीमतीको इस समय मुझपर अवश्य ही दया-दृष्टि करनी चाहिये। चातक चाहे प्रेम करे या न करे, पर मेघ तो उसके मुखमें मधुर जल गिराता ही है अथवा मुझे बड़ी शंका हो रही है कि मेरी बुद्धि किन-किन विधियोंसे आपमें अनुनीत हो, आपकी ओर लगे
हे साधु चरित्रोंवाली मा! तुम बहुत शीघ्र अपनी कृपाकटाक्षयुक्त दृष्टिसे मुझे निहारो। मैं तुम्हारी शरणकी दीक्षा ले चुका हूँ, अब मेरी उपेक्षा करना उचित नहीं है। यदि कल्पलता पग-पगपर अभीष्ट कामनाओंकी पूर्ति न कर सके तो अन्य साधारण लताओंसे उसमें विशेषता ही कैसे रह सकती है?
हे लम्बोदर गणेशको जन्म देनेवाली उमे! मैंने तुम्हारे युगल चरणारविन्दोंमें बहुत बड़ा विश्वास रखकर किसी अन्य देवताका आश्रय नहीं लिया, तथापि यदि तुम्हारा चित्त मुझपर सदय न हो तो अब मैं किसकी शरण जाऊँगा ?
जिस प्रकार लोहा पारससे छू जानेपर तत्काल सोना बन जाता है और गलियों [के नाले] का जल गंगाजीमें पड़कर पवित्र हो जाता है उसी प्रकार भिन्न-भिन्न पापोंसे मलिन हुआ मेरा अन्तःकरण यदि प्रेमपूर्वक तुममें आसक्त हो गया तो वह कैसे निर्मल नहीं होगा?
हे ईशानि! तुमसे अन्य किसी देवतासे मनोवांछित फल प्राप्त हो ही जाय, ऐसा नियम नहीं है, परन्तु तुम तो पुरुषोंको उनकी इच्छासे अधिक वस्तु भी देनेमें समर्थ हो—इस प्रकार ब्रह्मादि प्राचीन पुरुष कहा करते हैं। इसलिये अब मेरा मन रात-दिन तुममें ही लगा रहता है, अब तुम जो उचित समझो करो
हे त्रिभुवनमहाराज शिवकी गृहिणी शिवे! जहाँ नाना प्रकारके रत्न और स्फटिकमणिकी भीतपर तुम्हारा आकार प्रतिबिम्बित हो रहा है, जिसकी अट्टालिकाके शिखरपर प्रतिबिम्बित होकर चन्द्रमाकी कला सुशोभित हो रही है, विष्णु, ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवता जिसे घेरकर खड़े रहते हैं, वह तुम्हारा रमणीय भवन विजयी हो रहा है
हे गिरिराजनन्दिनि! तुम्हारा कैलासमें निवास है, ब्रह्मा और इन्द्र आदि तुम्हारी स्तुति किया करते हैं, समस्त त्रिभुवन ही तुम्हारा कुटुम्ब है, आठों सिद्धियोंका समुदाय तुम्हारे सामने हाथ जोड़कर खड़ा रहता है और महेश्वर तुम्हारे प्राणनाथ हैं; तुम्हारे सौभाग्यकी कहीं अल्प भी तुलना नहीं हो सकती
हे जननि! कामारि शिवका बूढ़ा बैल ही वाहन है, विष ही भोजन है, दिशाएँ ही वस्त्र हैं; श्मशान ही रंगभूमि है और साँप ही आभूषणका काम देते हैं; उनकी यह सारी सामग्री संसारमें प्रसिद्ध ही है, फिर भी जो उनके पास ऐश्वर्य है, वह तुम्हारे ही सौभाग्यकी महिमा है
हे कल्याणि! जिनकी बुद्धि स्वभावतः समस्त ब्रह्माण्डका संहार करनेमें ही प्रवृत्त होती है, जो अंगोंमें राख पोतकर श्मशानमें बैठे रहते हैं, [ऐसे निठुर स्वभाववाले] पशुपतिने जो समस्त भूमण्डलपर दया करके कण्ठमें हालाहल विष धारण कर लिया, उसे मैं आपके सत्संगका ही फल समझता हूँ
हे शैलनन्दिनि! आपके सर्वोत्कृष्ट सौन्दर्यको देखकर अत्यन्त भयके कारण ही गंगाजीने जलमय शरीर धारण कर लिया, इससे गंगाजीके दीन मुखकमलको देखकर दयावश शंकरजी उन्हें अपने सिरपर निवास देकर उनकी प्रतिष्ठा बढ़ाते हैं
हे भगवति! जिसमें विशाल चन्दनके रस, कस्तूरी और केसरके फूल मिले हुए हैं ऐसे तुम्हारे अनुलेपनके जलको और चलते हुए तुम्हारे चरणोंकी धूलिको ही लेकर ब्रह्माजी सुरपुरकी कमलनयनी वनिताओं (अप्सराओं) की सृष्टि करते हैं
हे देवि! वसन्त ऋतुमें खिली हुई लताओंसे मण्डित, नाना कमलोंसे सुशोभित एवं हंसोंकी मण्डलीसे अलंकृत सरोवरके भीतर, जहाँका जल मलयानिलसे आन्दोलित हो रहा है, [उसमें] सखियोंके साथ क्रीडा करती हुई आपका जो पुरुष ध्यान करता है, उसकी ज्वर-रोगजनित पीड़ा दूर हो जाती है
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचिता आनन्दलहरी सम्पूर्णा।
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